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January 25, 2015

इटैलियन बेनेली की इंडियन एंट्री


इटैलियन गाड़ियों का ज़िक्र आते ही हमारे ज़ेहन में एक से एक दमदार और ख़ूबसूरत कारों, मोटरसाइकिलों और स्कूटरों की तस्वीर आती है। चाहे तेज़ तर्रार ख़बूससूरती हो फ़ेरारी या लैंबोर्गिनी जैसी सुपर कारों की, डुकाटी जैसी मोटरसाइकिल हों या फिर कूल दिखने वाले स्कूटर हों, चाहे वेस्पा हो या लैंब्रेटा, जिस ना सिर्फ़ आज के रफ़्तार प्रेमी पसंद करते हैं बल्कि पुराने ज़माने के हिंदुस्तानी भी। लेकिन इस फ़ेहरिस्त में बेनेली ऐसा नाम नहीं रहा है। ये भी एक मोटरसाइकिल ब्रांड है और और इस बीच में अगर बेनेली का नाम हम ले रहे हैं तो इसकी यही वजह है कि इस कंपनी ने भी दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मोटरसाइकिल बाज़ार में आख़िरकार एंट्री मार ली है। 

सबसे पुरानी इटैलियन मोटरसाइकिल कंपनी ने ऐलान किया है कि वो भारत में अपनी पांच मोटरसाइकिल उतारने वाली है। TNT 302, TNT 600 GT, TNT 600i, TNT 899, TNT 1130 R 
यहां पर TNT का मतलब है Tornado Naked Tre । इनकी क़ीमतों का अभी ऐलान नहीं हुआ है, अभी औपचारिक लौंच का इंतज़ार है। कंपनी फ़िलहाल अपने डीलरशिप को अंतिम रूप देने में लगी है।

कंपनी की योजना है कि वो भारत में अगले 6-8 महीने में 20 डीलरशिप बनाएगी, जिनमें से आठ बड़े शहरों में तीन-चार महीनों में सबसे पहले डीलरशिप शुरू होंगे, जिनमें मौजूदा मेट्रो शहर शामिल हैं। ख़बर ये भी है कि कंपनी इन स्पोर्ट्स बाइक्स के साथ छोटी मोटरसाइकिलें उतारने की भी सोच रही है। 

सौ साल से पुरानी इस इटैलियन कंपनी फ़िलहाल चाइनीज़ कियानजियांग ग्रुप का हिस्सा है। अब वो भारत में डीएसके मोटोव्हील्स के साथ आई है। जो इन मोटरसाइकिलों को फ़िलहाल पुणे में असेंबल करेगी, बेचेगी और सर्विस-स्पेयर पार्ट का ज़िम्मा उठाएगी। 



* पुरानी छपी हुई है

January 23, 2015

मॉडर्न भी क्लासिक भी Continental GT

मोटरसाइकिलों का ये ऐसा सेगमेंट है जिससे बहुत से हिंदुस्तानी मोटरसाइकिल प्रेमी परिचित नहीं है। कैफ़े रेसर । कुछ सालों से एनफ़ील्ड अपनी इस मोटरसाइकिल को ऑटो एक्स्पो में पेश कर रही थी। लोगों में उत्सुकता तो थी लेकिन बहुत चुनिंदा बाइकप्रमियों में इस पर चर्चा देखने को मिल रही थी। लेकिन अब वक्त आ गया है कि इस नए तरीके की मोटरसाइकिल को नज़दीक से देखने का मौक़ा आ गया है। क्योंकि रॉयल एनफ़ील्ड ने अपनी कैफ़े रेसर बाइक कांटिनेंटल जीटी को लौंच कर दिया है। कंपनी का कहना है कि ये उसकी अब तक की सबसे हल्की, सबसे तेज़ और सबसे ताक़तवर बाइक है। क्लासिक स्पोर्ट्स बाइक कैटगरी में आने वाली कांटिनेंटल जीटी की दिल्ली में ऑन रोड क़ीमत 2 लाख 5 हज़ार रु रखी गई है। मुंबई में इसकी ऑन रोड क़ीमत 2 लाख 14 हज़ार रु रखी गई है। 
दरअसल 60 के दशक में बाइकप्रेमी अक़्सर वीकेंड पर छोटी रेस किया करते थे। जैसे अपने कॉफ़ी हाउस तक या एक से दूसरे कैफ़े तक। भले ही ये आम सड़कों पर या छोटी दूरी की रेस हों लेकिन सभी बाइकप्रेमी अपनी मोटरसाइकिलों को काफ़ी स्पोर्टी बनाते थे, वज़न कम रखते थे और बाइक को ज़्यादा से ज़्यादा तेज़ बनाने की कोशिश करते थे। तो रेस भी करे, अच्छी हैंडलिंग भी हो। अब इन्हें क्लासिक कह सकते हैं। तो उसी क्लासिक ट्रेंड को नए ज़माने के ग्राहकों के लिए तैयार किया गया है और नए ज़माने की इस क्लासिक बाइक की नई चैसी तैयार करने के लिए यूके की कंपनी से भी मदद ली है। इसमें लगा हुआ है सिंगल सिलिंडर 535 सीसी का इंजिन। कंपनी ने इसे ज़्यादा तेज़ बनाने के लिए बाइक की ईसीयू में तब्दीलियां की हैं। 
 हल्की, ताक़तवर और तेज़ होने के साथ कुछ और चीज़ेों होती थीं जो कैफ़े रेसर की पहचान होती थीं। वो थे इसके नीचे हैंडिलबार। जिससे स्पोर्ट्स बाइक की तरह बाइकर आगे झुककर राइड करते थे। टैंक थोड़ा छोटा होता था, सीट सपाट होती थी। आमतौर पर मोटरसाइकिलों के जो भी हिस्से ग़ैरज़रूरी हैं उन्हें हटा दिया जाता था। यही सब कुछ इस कांटिनेंटल जीटी में भी देखने को मिलेगा। 

January 19, 2015

Indian Bikes in India


-कौन सी बाइक ?
-इंडियन बाइक
-कितने की ?
-साढ़े छब्बीस से तैंतीस लाख रु 
-क्या ? कौन सी इंडियन बाइक कंपनी ऐसी महंगी बाइक लेकर आई है ? 
-इंडियन नाम है, लेकिन कंपनी अमेरिकन है । 
-अमेरिकन कंपनी और नाम इंडियन ?

तो ये बातचीत कई बार दुहराई गई, जब कुछ लोगों ने इस मोटरसाइकिल की शूटिंग करते हाइवे पर देखा या फिर इसे चलाने के बाद मेरे सहयोगियों ने जब मुझे अपने राइडिंग जैकेट और हेलमेट के साथ देख । और लगभग सभी बातचीत में इस बाइक का नाम काफ़ी पेचीदा मसला रहा। लेकिन इंडियन चीफ़ कहते ही बात सलट गई। ख़ैर दिलचस्प बाइक रही और इसकी सवारी भी। वैसे कहानी भी कम दिलचस्प नहीं रही है। इंडियन चीफ़ सौ साल से पुरानी कंपनी है। दरअसल एक वक्त था जब इंडियन चीफ़ का जलवा था। आते ही इस मोटरसाइकिल ने अपनी काबिलियत से सबको चकित कर दिया था। वैसे भी अंतर्राष्ट्ीय बाज़ार में उन गाड़ियों की इज़्ज़त तुरंत होती है जिसका प्रदर्शन मोटरस्पोर्ट में अच्छा हो। इंडियन के साथ ऐसा ही हुआ। शुरू होने के दस साल में कंपनी ने अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया। जब १९११ में आइल ऑफ़ मैन के नामी रेस में पहले तीन स्थान पर कब्ज़ा किया । और आने वाले पंद्रह बीस साल इस कंपनी के नाम रहे। जहां इसकी बाइक स्काउट काफ़ी नामी रही। लेकिन १९५३ में जाकर कंपनी का दिवाला निकल गया और फिर ये वापसी नहीं कर पाई। कई कंपनियों ने कोशिश की लेकिन कुछ नतीजा नहीं निकला। लेकिन इस ब्रांड का नाम शायद ऐसा था जो ख़त्म होने वाला नहीं था। इसीलिए बंद होने के आधी शताब्दी के बाद भी कोशिशें चालू रहीं इसे वापस ज़िंदा करने की। और उसी का नतीजा दिखा २०११ में जब पोलारिस कंपनी ने इंडियन को ख़रीदा, फिर से तैयार करना शुरू किया और तीन मोटरसाइकिलों को लौंच भी कर दिया।
इंडियन चीफ़ क्लासिक, इंडियन चीफ़ विंटेज और चीफ़टन। 
और ये तीनों भारत में भी लौंच हो गई हैं। लेकिन इस अमेरिकी विरासत क ेलिए पैसे भी काफ़ी मांगे जा रहे हैं। क्लासिक जहां साढ़े छब्बीस लाख रु में सबसे सस्ती इंडियन है वहीं ३३ लाख रु में चीफ़टन सबसे महंगी। ये क़ीमत रेंज किसी भी मोटरसाइकिल के लिए भारत में तो महंगा माना ही जाएगा। हालांकि कंपनी अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में अपनी मोटरसाइकिलों के साथ अच्छा प्रदर्शन कर रही है। 
तो इनमें से एक को चलाने का मौक़ा मिला मुझे और उसे लेकर मेैं छोटे सफ़र पर निकला भी। लगभग पौने चार सौ किलो वज़न वाली मोटरसाइकिल इतने स्मूद तरीके से चलेगी इसका अंदाज़ा इसे चलाने का बाद ही मिल सकता है। इसमें लगे १८११ सीसी के इंजिन से निकलने वाला टॉर्क इतना ज़ोरदार होता है कि खुली सड़कों पर आप बस लंबी राइड पर जाना चाहेंगे। इसमें एबीएस जैसे फ़ीचर्स तो हैं ही, क्रूज़ कंट्रोल भी है। कारों की तरह आप इसके स्पीड को सेट करके आराम से लंबी राइड कर सकते हैं। हालांकि भारत में इसका मज़ा लेना मुमकिन नहीं जहां सड़कों पर सामने से कुछ भी आ सकता है। हैंडलिंग और राइड बहुत मज़ेदार लगेगी। ढेर सारा क्रोम इसे काफ़ी ठोस और स्टाइलिश लुक देता है। इसकी आवाज़ भी दमदार लगेगी और जापनी बाइक्स से बिल्कुल अलग। वैसे भारत में भी इस ब्रांड को जानने वाले कुछ बाइक प्रेमी हैं। लेकिन कंपनी फिलहाल कोशिश कर रही है यहां अपनी पैठ बनाने की। आने वाले वक्त में हम इसे भी हार्ली की तरह कुछ सस्ती बाइक्स लाते देख सकते हैं। कमसेकम भारत में प्रोडक्शन करके, जिससे इस पर लगने वाली ड्यूटी ख़त्म हो। 
इंडियन के बंद होने में और रीलौंच होने के बीच जो वक्त गुज़रा है उस दौरान मोटरसाइकिलों की दुनिया बहुत बदल चुकी है और इंडियन को अपनी पहचान वापस पाने के लिए काफ़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। इंडियन ख़ुद को पहली अमेरिकन बाइक कहती है। ज़ाहिर सी बात है कि इस दावे के निशाने पर हार्ली है, जिसने दुनिया भर में अमेरिकन बाइक के तौर पर नाम कमाया है। ऐसे में इंडियन को सबसे पहले उसी को चैलेंज करना था अगर उसे इस सेगमेंट में वापसी करनी है। कंपनी कह भी रही है अपने प्रचार में कि अब लोगों के पास विकल्प आ गया है। हालांकि भारत में ये बात कितनी सच होगी पता नहीं क्योंकि इसकी क़ीमत काफ़ी ज़्यादा है हिंदुस्तानी मार्केट के हिसाब से। 

January 13, 2015

KTM 390 की राइड BIC पर

एक राइड रेसट्रैक पर 

मोटरसाइकिलों को लेकर रेस ट्रैक पर गए काफ़ी दिन हो गए थे और ऐसे में जब कार्यक्रम बना तो फिर उत्सुकता बेचैनी में बदल गई । जहां पर इंतज़ार करने लगा कि कब मैं पहुंचू और चलाना शुरू करुं इस रेसट्रैक पर। और ये उत्सुकता इसलिए भी क्योंकि मुझे केटीएम की ड्यूक ३९० मोटरसाइकिल को चलाना था। इस मोटरसाइकिल को मैंने अभी तक ना के बराबर चलाया था। ख़ास मीडिया के लिए टेस्ट राइड वाली केटीएम ३९० को दिल्ली पहुंचते पहुंचते युग बीत गए थे इस वजह  से । अब जब मौक़ा मिला था तो उत्सुकता डबल थी क्योंकि इसे रेस ट्रैक पर चलाने का मौक़ा मिल रहा था। आमतौर पर गाड़ियों और मोटरसाइकिलों को ऐसे ट्रैक पर टेस्ट करने का मौक़ा कहां मिल पाता है। कुछ चुनिंदा अच्छी सड़कों पर इन्हें चला कर इनके प्रदर्शन को बहुत हद तक बारीकी से पढ़ा जा सकता है, लेकिन रेसट्रैक पर ही असल फ़र्क पता चलता है हैंडलिंग के मामले में। जहां पर देखते हैं कि ये प्रो़डक्ट कितनी बढ़िया पकड़ के साथ बेहतरीन हैंडलिंग दिखाती है और तेज़ से तेज़ जा सकती है। क्योंकि आम सड़कों पर बिना फ़िक्र मोटरसाइकिल से पूरी ताक़त निकालने की कोशिश नहीं कर सकते हैं। साथ में रेस ट्रैक की तरह मोड़ और कॉर्नर भी नहीं मिलते हैं जो हमारी राइडिंग क्षमता औऱ मोटरसाइकिल की काबिलियत को पूरा परख सके। तो इस राइड को देखें तो ऐसा ही कुछ आईडिया था इस ३९० को लेकर भी। 
दरअसल केटीएम भारत में मोटरसाइकिल राइडिंग के कल्चर को बढ़ावा देना चाहती है। कंपनी की पहचान अलग है और इसकी मोटरसाइकिलें भी थोड़ी अलग हैं। ये स्पोर्ट्स और सिटी के बीच की मोटरसाइकिलें भारतीय माहौल में काफ़ी फ़िट बैठती हैं, जहां पर आम सड़कों पर चलाना अपने आप में एडवेंचर से कम नहीं और शुद्ध स्पोर्ट्स बाइक को चलाना तो और भी चुनौती का काम है। ऐसे में केटीएम एक अच्छा कांबिनेशन देती है, रफ़्तार और व्यावहारिकता का। अपनी नेकेड लुक के साथ ये पावर और हैंडलिंग का अच्छा पैकेज दे रही है। इसी लिए ड्यूक २०० के बाद ३९० को लेकर भी ग्राहकों ने काफ़ी रुचि दिखाई। तो उन्हीं ग्राहकों के लिए कपनी ने इस राइड को आयोजित किया। ट्रैक डे। और यहां पर आने वाले राइडरों ने काफ़ी ख़ुशी भी दिखाई इसे लेकर। देश के कई शहरों से राइडर ग्रेटर नौएडा के रेस ट्रैक पर पहुंचे और बाइक भगाई। दिल्ली एनसीआर से साथ चंडीगढ़ और जम्मू से, यहां तक कि मुंबई से भी। तो इन्हीं राइडरों के बीच हमें भी मौक़ा मिला थोड़ी देर के लिए। मीडिया के लिए एक छोटा सा सेशन। 
मोटरसाइकिल को लेकर हम भी निकले, तेज़ भगाने की कोशिश की, गए भी। तेज़ तर्रार मोटरसाइकिल को लेकर रेसट्रैक के कोनों पर मुड़े भी। साथ में इंस्ट्रक्टर भी थे। जिन्होंने थोड़े बहुत टिप्स भी दिए। तो थोड़ी देर में जितने चक्कर काट सकते थे, काटे। मोटरसाइकिल के हैंडलिंग से इंप्रेस हुए। थोड़ा और वक्त होता तो और आनंद आता। क्योंकि इन ट्रैक पर जितने चक्कर काटते जाएं, प्रैक्टिस जितनी होती जाती है, और रोमांच बढ़ता जाता है। आप तेज़ से तेज़ जाने की कोशिश करते हैं और ज़्यादा तेज़ मोड़ने की कोशिश भी करते हैं। और यहां मौजूद राइडर्स भी वही कर रहे थे।
कंपनी ने इसी जगह ऐलान किया कि वो अपनी आरसी सीरीज़ भी जल्द भारत मे ंला रही है। केटीएम की वो मोटरसाइकिलें जो ख़ासतौर पर रेस ट्रैक के लिए तैयार होती हैं। ज़ाहिर है कंपनी को उम्मीद है कि जिस तरीके का उत्साह ग्राहकों में ऐसे ट्रैक डे को लेकर है, ऐसे में रेसिंग मोटरसाइकिलों का बाज़ार भारत में तेज़ी से बढ़ेगा।

January 09, 2015

DSK Hyosung GT250 R


नए अवतार में आ गई है ह्योसंग GT 250 R । जिन मोटरसाइकिलों को चाहिए कुछ और विकल्प उनके लिए आ रहे हैं कुछ और विकल्प । डीएसके कंपनी ने ह्योसंग की GT 250 R को नए रंग-रूप में ग्राहकों के सामने पेश किया है। 2 लाख 76 हज़ार (एक्स शोरूम पुणे) की क़ीमत पर ।
इस नए लौंच के साथ बेहतर स्टाइलिंग का दावा है, ग्राफ़िक्स नए डिज़ाइन के नज़र आएंगे और साथ में नया स्टाइलिश हेडलैंप भी है। यहां पर तीन नए रंगों का विकल्प भी मिलेगा।

हाल फ़िलहाल में २०० सीसी से बड़ी मोटरसाइकिलों के सेगमेंट जिस तरीके का ऐक्शन देखने को मिल रहा है वहां पर कोई भी कंपनी आराम से नहीं रह सकती । ना सिर्फ़ नए प्रो़डक्ट आते जा रहे हैं बल्कि काफ़ी आकर्षक क़ीमत पर भी आ रहे हैं और ऐसे में ह्योसंग को नया करना भी ज़रूरी था। 
कंपनी ने यही किया भी है। तो इन नई जानकारियों के बाद पुरानी जानकारी दे देते हैं इस मोटरसाइकिल के बारे में । इसमें लगा है 249 सीसी की V Twin ऑयल कूल्ड इंजिन। इसकी ताक़त है 28 बीएचपी की और इसका टॉर्क है 22 एनएम का। 5 स्पीड ट्रांसमिशन है और इसकी टॉप स्पीड जाती है 140 किमी प्रति घंटे की। 

January 07, 2015

Vespa S


स्कूटरों का बोलबाला देख कर दिल ख़ुश हो जाता है आजकल। भले ही एक से एक तेज़ तर्रार मोटरसाइकिलों ने हिंदुस्तानी सड़कों पर धूम मचा रखी हो, भले ही माचो और तेज़ तर्रार फ़ील के साथ आने वाली बाइक्स ने यंगस्टर्स को दीवाना बना रखा है लेकिन उन सब के बावजूद देसी सड़कों को सबसे ज़्यादा रंगीन अगर किन्हीं सवारियों ने बना रखा है तो वो हैं स्कूटर। चारों ओर से रंग-बिरंगे स्कूटर दौड़ते भागते नज़र आ जाते हैं और लगता है कि ये अलग क़ौम तैयार हो चुकी है।  स्कूटर प्रेमियों और स्कूटर सवारों की। छोटे-मझोले स्कूटर, रंग-बिरंगे डिज़ाइन वाले स्कूटर। और उन्हें चलाने वाले भी एक तसल्ली वाले मूड में नज़र आते हैं, जो केवल ज़रूरत के लिए स्कूटर नही चुन रहे, कहीं ना कहीं वो मोटरसाइकिल छोड़कर एक नया चुनाव कर रहे हैं। और इसी क़ौम को थोड़ा और रंगीन कर रही है जानी पहचानी वेस्पा।


 कंपनी जिसने भारत में स्कूटर को लाइफ़स्टाइल सेगमेंट में ले जाने के लिए कमर कसा हुआ है। वो एक के बाद एक स्कूटर लेकर आ रही है जो शौकीनों के लिए ख़ास सवारी कही जाएगी। हाल ही में कंपनी ने एक और प्रोडक्ट लौंच किया जिसका नाम है वेस्पा एस। ये हाल में जो वेस्पा स्कूटर लौंच हुए हैं, उनसे बिल्कुल अलग है। कंपनी ने पहले तो वेस्पा १२५ उतारी थी एलएक्स और वीएक्स अवतार में । लुक और फ़ील के हिसाब से ये पारंपरिक वेस्पा लग रही थी और साथ में हाल फ़िलहाल में स्कूटरों में जो डिज़ाइन चल रहे हैं उसी लीक पर डिज़ाइन की हुई सवारी थी। 

लेकिन वेस्पा एस के साथ कंपनी ने थोड़ा अलग करने की कोशिश की है। इसका लुक मौजूदा दोनों स्कूटरों से बिल्कुल अलग है। जिसमें सबसे ख़ास दो चीज़ें लग रही हैं एक तो इसमें इस्तेमाल हुआ क्रोम और इसका चौकोर हेडलैंप। अब एक हेडलैंप किसी भी गाड़ी या सवारी का लुक किस हद तक बदल सकता है ये समझने के लिए वेस्पा एस को देखना ज़रूरी है। इस हेडलैंप के साथ स्कूटर पुराने ज़माने का नया पैकेज लगता है। एक बहुत अलग तरीके का स्टाइल स्टेटमेंट देने वाला स्कूटर। स्पोर्टी भी और रेट्रो भी। कुछ ख़ास तरह के स्कूटरप्रेमियों की इसमें दिलचस्पी हो सकती है।

 इसमें भी लगा है १२५ सीसी का इंजिन और इसकी ताक़त ठीक ठाक १० बीएचपी के लगभग है। यहां पर इसकी राइड का ज़िक्र करें तो ये सटीक और सिंपल तरीके से भागती है। स्कूटरों से जैसी ताक़त की उम्मीद होती है ये पूरा करता है और हैंडलिंग में ख़ुश करता है। अच्छी संतुलित राइड। ब्रेकिंग भी अच्छी है। इन सब मामलों में जो मौजूदा स्कूटर हैं उन्हें अच्छी टक्कर देती है ये सवारी। लेकिन इसका सेगमेंट वो नहीं, ये तो शौकीनों की चीज़ हैं। दिल्ली में लगभग ७५ हज़ार रु की एक्सशोरूम क़ीमत का यही तो मतलब है। और ऊपर से चार चटख़ रंग में । तो इसकी क़ीमत और लुक इसे चुनिंदा ग्राहकों की फेवरेट बनाएंगे। देखते हैं बिक्री कैसी होती है। लेकिन ये तय है कि स्कूटरों में भी एक लाइफ़स्टइल सेगमेंट फल फूल रहा है। 

*पुरानी छपी हुई है। 

January 03, 2015

हौंडा ऐक्टिवा 125

हौंडा टू व्हीलर्स ने एक नई सवारी पेश की थी दुपहिया बाज़ार में, ये अहम लौंच है या नहीं, इसके बारे में तो बाद में ही पता चलेगा। लेकिन सवारी को चलाना तो ज़रूरी था, ये समझने के लिए कि बेस्टसेलर को और बेहतर कैसे किया जा सकता है। जिस एक्टिवा को सालों से हमने स्कूटर बाज़ार पर राज करते देखा है, यही नहीं, हाल के वक्त में बेस्टसेलर मोटरसाइकिलों को भी पछाड़ दिया। 
तो पहली बार बल्कि हौंडा टू व्हीलर्स ने 125 सीसी का स्कूटर उतारा है। और स्कूटर को देखें तो इसमें अलग से ज़िक्र है इसके इंजिन का। इसका नाम ही दिया गया है, ऐक्टिवा 125। जिसे चलाने के लिए निकला दिल्ली की गर्म सुबह में। मौसम ने तो कहानी थोड़ी गड़बड़ कर दी थी लेकिन फिर भी इतनी दूरी चला ही लिया कि इस नए पैकेज की शुरूआती राइड के बारे मे जानकारी दी जा सके। 

पहले लुक के बारे में बताएं तो बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं लगेगा आपको मौजूदा ऐक्टिवा और नए ऐक्टिवा में। लेकिन नज़दीक जाएं तो इसके अगले हिस्से में लगे क्रोम से लगेगा कि कुछ अलग और नया है। फिर किनारे से देखें तो पता चल जाएगा कि ये ऐक्टिवा 110 नहीं, 125 है। 

इसके अलावा इंस्ट्रुमेंटेशन साफ़ सुथरा और गंभीर लगेगा। स्विच और प्लास्टिक बढ़िया लुक और फ़िनिश वाले लगेंगे। 
और इसमें हौंडा के चिर परिचित फ़ीचर्स तो हैं ही। जैसे कंबाइंड ब्रेकिंग सिस्टम, और 190 एमएम का फ़्रंट डिस्क ब्रेक। साथ में डिजिटल मीटर, मेटल बॉडी, ट्यूबलेस टायर वगैरह।

राइड की बात कर लेते हैं, जो इस सेगमेंट में सबसे बेहतरीन में से एक कही जाएगी। ऐक्टिवा 125 अपने सवा सौ सीसी इंजिन, मेटल बॉडी और बनावट के साथ संतुलित राइड देती है। इसकी ताक़त 8.6 बीएचपी की है। कंपनी का दावा ये भी कि ज़्यादा ताक़त के बावजूद इसकी माइलेज सेगमेंट में सबसे बेहतर भी है, जो 59 किमीप्रतिलीटर का मापा गया है।
चुस्त भी लगी और ब्रेकिंग काफ़ी सटीक भी। 

ऐक्टिवा 125 दो वेरिएंट में है, स्टैंडर्ड 52,447 रु में और डीलक्स वेरिएंट 58156 रु में।
अब इस क़ीमत के साथ एक बात तो महसूस की जा सकती है कि जो ऐक्टिवा लेना चाहते हैं, वो इस नए ऐक्टिवा की ओर ज़रूर जा सकते हैं। किफ़ायती है ही, क़ीमत भी ज़्यादा नहीं और राइड के मामले में आरामदेह है ही, साथ में बड़े इंजिन का बोनस भी.

*Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । पुरानी छपी हुई है। 

December 29, 2014

असली बाइकर नक़ली बाइकर

बार बार उन्हें बाइकर बुलाया जाता है तो बुरा लगता है। असल बाइकर ऐसे थोड़े ही ना होते हैं। बहुतों को जानता हूं, जो दिल से और जीने के तरीके में बाइकर हैं। ख़ुद मैं भी उनमें से हूं जो ये मानते हैं कि बाइक पर लंबी राइड जीवन के लगभग हर तरीके की परेशानी को दूर कर देती है। और ऐसे में जब बिना हेलमेट के, सैकड़ों के झुंड में देर रात सड़कों पर, लोगों को परेशान करते हुए, बाइक भगाते नौजवानों को देखता हूं तो फिर बुरा लगता है। उन्हें देखकर ये नहीं लगता है कि वो इस सवारी का मज़ा लेने के लिए निकले हैं। साफ़ लगता है कि वो भड़ास निकालने के लिए निकले हैं सड़कों पर। उनके सामने पुलिस वालों को भी एक तरीके से बेबस देखता हूं। एक जिप्सी में दो पुलिस वालों के सामने से एक साथ 50 मोटरसाइकिलें निकलें तो फिर किसी को भी संभालना मुश्किल लगेगा ही। और कौन उनसे उलझे वाले भाव से वो दूसरी ओर देखने लगते हैं। कौन उन्हें हेलमेट के लिए पूछे और कौन रेडलाइट जंप करने पर सवाल करे। और ऐसे में नतीजा ये होता है कि बाइकसवार हुड़दंग मचाते चलते हैं और जो लोग उनके रास्ते में आते हैं परेशान होते रहते हैं। और सबसे ज़्यादा ये हुड़दंग देखने को मिलता है किसी ना किसी त्यौहार के दौरान। जहां पर मानो लाइसेंस मिल जाता है सब बाइकसवारों को कुछ ना कुछ स्टंट करने का। और जब तक पुलिस वालों पर नहीं पड़ती वो उन्हें घेरते भी नहीं। पहले तो पुलिस नज़रअंदाज़ करती रही, फिर टीवी चैनलों पर लगातार विज़ुअल दिखाने पर दबाव बढ़ा और फिर पुलिस ने कार्रवाई करनी शुरू की। और पिछली बार तो हद ही हो गई, जब एक बाइकसवार की पुलिस की गोली से मौत ही हो गई। कुछ वक्त पहले घटना सामने आई है जहां पर पुलिस वालों ने लगभग 400 बाइकसवारों को पकड़ा, 250 मोटरसाइकिलों को ज़ब्त किया। इसकी भी तस्वीर काफ़ी अजीबोगरीब थी, पुलिसवालों को ऐसे डंडे बरसाते देखा गया कि समझ नहीं आ रहा था कि पुलिस करना क्या चाहती है इनके साथ। लाठी के चोट लिए नौजवान भी बिलबिलाते दिखे। ख़ैर, इस सबके बाद इन सभी नौजवानों की काउंसेलिंग भी करवाई गई। दिल्ली पुलिस ने तमाम धर्मगुरूओं को बुला कर इन नौजवानों को समझाने के लिए कहा। उन्होंने अपने अपने संदेश दिए। बाद में इनके मां-बाप को बुलाया गया, उनसे बात की गई और कहा गया कि अपने बच्चों को सिखाएं संभालें। इन क़दमों से लगा कि पुलिस कुछ तो रास्ते पर है इस समस्या से निपटने में। लेकिन अनुशासन एक बार में तो बनता नहीं है। रोज़ रोज़ की आदत ही अनुशासन में बदलेगी । तो पहले तो पुलिस को नियमों के पालन के लिए ज़ोर लगाने की ज़रूरत है, जिससे नियमों को तोड़ना किसी को भी आसान ना लगे। एनफ़ोर्समेंट की कमी नियम-क़ानून को बेमानी बना देते हैं। और हर बार बाइकसवारों को हुड़दंग के बाद यही देखने को मिलता है। दूसरे पुलिस को इन नौजवानों से निपटने के लिए इनसे बात करनी होगी, केवल कड़ाई से तो ये उम्र रुकने वाली होती नहीं है। ऐसे में ज़रूरत है कि उनसे पुलिस किसी ना किसी तरीके से एक संवाद भी बनाए, उनसे बात करे और समझाए कि केवल नियम के लिए नहीं अपनी जान की सुरक्षा के लिए भी सेफ़्टी ज़रूरी है। और ये भी कि असल बाइकर अपनी बाइक से प्यार तो करते ही हैं, बाकी सवारों की इज़्ज़त भी करते हैं।

*पहले छपी हुई है। 

December 25, 2014

Harley Street 750

हार्ली की नई नवेली स्ट्रीट 750 को कुछ वक्‍त पहले चलाई थी। सोचा एक बार फिर से उस राइड को आपके लिए याद करूं। भारत में कंपनी ने इसे लौंच कर दिया है पिछले ऑटो एक्स्पो के वक्त । एक शांत शनिवार की सुबह को राइड के लिए चुना गया था। मोटरसाइकिल चलाने के लिए मौसम बिल्कुल फ़िट । और हम भी अपने राइडिंग गियर के साथ फ़िट हो गए थे। और तैयार थे स्ट्रीट 750 को चलाने के लिए । 
हार्ली डेविडसन की ये मोटरसाइकिल कई मामले में अहम है भारतीय मोटरसाइकिल बाज़ार के लिए भी और ख़ुद कंपनी के लिए भी। पहली बार जहांं कंपनी ने इतना छोटा इंजिन तैयार किया है, (नई स्ट्रीट सीरीज़ में कंपनी ने 500 और 750 सीसी के इंजिन तैयार किए हैं, जिनमें से फ़िलहाल 750 भारत में लौंच हुई ), साथ ही ये एयरकूल्ड इंजिन नहीं लिक्विड कूल्ड हैं। इसके अलावा जो चीज़ नई है इसके लिए वो है, भारत में इसका प्रोडक्शन। जो हार्ली के इतिहास मे ंपहले नहीं हुआ था। ज़ाहिर है भारत में बड़ी बिक्री की उम्मीद कर रही है कंपनी। और इसके लिए कंपनी ने सबसे पहला क़दम तो कंपनी ने काफ़ा ज़ोरदार उठाया है। इस मोटरसाइकिल की क़ीमत के साथ, जो शुरू हो रही है 4 लाख 10 हज़ार से। इसके साथ ये सबसे सस्ती हार्ली मोटरसाइकिल बाइक हो गई है।



तो भारत में बनी इस मोटरसाइकिल को चलाने के लिए हम तैयार थे और लेकर फिर निकल पड़े इसे सड़कों पर। बिल्कुल नई बाइक की पहली राइड। 

स्ट्रीट 750  में लगा है 749 सीसी की लिक्विड कूल्ड इंजिन, जिससे 65 एनएम टॉर्क आता है। आंकड़ों के हिसाब से तो स्ट्रीट 750  के पास अच्छे नंबर हैं, लेकिन क्या ये नंबर सड़क पर वैसे लगते हैं कि नहीं। शुरूआती सवारी में ही लगा कि स्ट्रीट एक ताक़तवर सवारी है। मज़ेदार और दमदार। सुबह सुबह खुली सड़कों पर भागने में इसने कोई कोताही नहीं दिखाई और भरपूर ताक़त के साथ भागी। अगर ख़ाली और सुरक्षित ट्रैक मिले तो फिर 150 की रफ़्तार तक ये बहुत आराम से चली जाती है। किसी स्पोर्ट्स बाइक की तरह नहीं लेकिन तेज़ी और चुस्ती से। यही नहीं इसकी हैं़डलिंग भी काफ़ी अच्छी लगी। तेज़ रफ़्तार में आड़े तिरछे रास्तों पर मुड़ते हुए कभी भी हिचक नहीं लगी। इंप्रेसिव। 
आम तौर पर हार्ली डेविडसन की मोटरसाइकिलें भारी भरकम सी होती हैं जिन्हें धीमी रफ़्तार में चलाना उतना आरामदेह नहीं होता, भारी शहरी ट्रैफ़िक के बीच संभालना थोड़ा मुश्किल होता है, लेकिन स्ट्रीट 750  की बात करें तो ये बाकियों से हल्की हैंडलिंग वाली है, शहरी ट्रैफ़िक में चलते हुए इसे संभालना किसी भी हल्की बाइक के बराबर ही लगा। गाड़ियों के बीच से निकालना मुश्किल नहीं लगा। 
लेकिन हां, बाइक बड़ी मोटरसाइकिलों की तरह ही गर्म होती है, गर्मी के मौसम में इसे चलाना बहुत आरामदेह नहीं होगा लगता है। वहीं इसकी आकार लंबे लोगों जैसे मेरे लिए बहुत आरामदेह नहीं है। बाइक मौजूदा सुपरलो और आयरन जैसे आकार की लगेगी। हां अगर औसत हिंदुस्तानी लंबाई है तो फिर फ़िट होगी आपके लिए। 
तो इस राइड को ख़त्म करके लगा कि हार्ली ने कुछेक छोटी कमियों को छोड़ एक तेज़ तर्रार बढ़िया बाइक बनाई है, अच्छी क़ीमत पर लौंच किया है। एक ज़ोरदार पैकेज जो हार्ली के लिए अच्छी ख़बर है भारत में।

* पहले छपी हुई है।

December 22, 2014

यूनिकाॅर्न ने बदला रूप

हौंडा मोटरसाइकिल ने अपनी नई मोटरसाइकिल उतार दी है। हौंडा की 163 सीसी वाली नई CB यूनिकॉर्न । नए रंग-रूप में । 
हाल फ़िलहाल में कंपनी ने अपने मोटरसाइकिल पोर्टफ़ोलियो को बड़ा किया है और इसमें शुरूआती सेगमेंट से लेकर डेढ़ सौ सीसी वाले सेगमेंट में भी नयापन ज़रूरी था। इस साल कंपनी ने चार लौंच किए हैं। जिनमें स्कूटर और छोटी मोटरसाइकिल से लेकर लाखों की गोल्डविंग भी रही है। तो कंपनी ने अपनी जानी पहचानी यूनिकॉर्न को रिफ्रेश करने की कोशिश की है।  इसकी स्टाइलिंग और डिज़ायन में बदलाव किए हैं। और हाल फिलहाल में सभी स्कूटरों में जिस HET टेक्ऩॉलजी का इस्तेमाल किया थो वो इसमें भी डाला है, माइलेज बढ़ाने के लिए। कंपनी का दावा है कि हौंडा राइडिंग कंडिशन में इसकी माइलेज अब 62 किमीप्रतिलीटर हो गई है। चार रंगों में फ़िलहाल आई है और इसके दो वेरिएंट हैं। स्टैंडर्ड वेरिएंट जिसकी क़ीमत है 69, 350 रु और CBS वेरिएंट 74,414 रू । दोनों दिल्ली में एक्स शोरूम क़ीमत है। 
यूनिकॉर्न स्टैंडर्ड 69 हज़ार रु यूनिकॉर्न CBS वेरिएंट 74 हज़ार रु (दिल्ली में एक्स शोरूम क़ीमत)

हौंडा अपनी रणनीति के मामले में काफ़ी आक्रामक हो चुकी है। एंट्री सेगमेंट में अपनी युगा को लेकर वो जोश में है, जिसके कई अलग अलग वर्ज़न उतारे जा चुके हैं। कंपनी ने ऐसे ही बड़ी मोटरसाइकिलों के सेगमेंट में भी अपने प्रोडक्टस को रिफ्रेश किया है। और अभी तक हौंडा के लिए बेस्टसेलर रहे स्कूटरों को भी कंपनी ने उसी आक्रामकता के साथ नया किया है। 
HMSI यानि हौंडा मोटरसाइकिल्स और स्कूटर इंडिया लिमिटेड की फ़ैक्ट्री से निकलने वाली सबसे पहली मोटरसाइकिल रही है यूनिकॉर्न । ज़ाहिर है कंपनी के लिए ख़ास है ये। जो अपनी स्मूद राइड के लिए जानी जाती है। नए जेनरेशन की टेस्ट राइड करने का वक्त आ गया है

November 12, 2014

क्या चीज़ है ये मार्केज़ !!!


कोई बहुत ज़ोरदार फॉलोवर नहीं हूं मैं मोटरस्पोर्ट्स का। मोटरस्पोर्ट्स की दुनिया में क्या चल रहा है ये नज़र रहती है, रखनी भी पड़ती है…लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं फ़ॉर्मूला वन के एक-एक पल के बारे में पूरी जानकारी रखता हूं, रेसरों की ज़िंदगी और रेसिंग से जुड़े एक एक पल, उनकी कहानियों और किंवदंतियों के बारे में बहुत डीटेल में जाने का वक़्त नहीं मिल पाता है। लेकिन ऐसा नहीं कि इस मसरूफ़ियत के बीच मैं वो पल भूल जाऊं कि कैसे मैंने वैलेंटीनो रॉसी से मुलाक़ात की थी और कैसे उसके साथ फ़ोटो खिचाया था। कैसे इस इंटरव्यू या मीडिया की भाषा में कहें तो इंटरऐक्शन के बीच जॉन अब्राहम किनारे से हो गए थे। वो मौक़ा था यामाहा के एक ईवेंट का जब यामाहा की मोटो जीपी टीम के राइडर, मोटरसाइकिल रेसिंग के सबसे सनसनीख़ेज़ सितारे वैलेंटीनो रॉसी और भारत में यामाहा के ब्रांड एंबैसेडर जॉन अब्राहम एक साथ कुछ प्रेस टीम से मिले थे। रॉसी उससे पहले भी पसंद था और आज भी पसंद है। उसकी सफलता के ऊपर नज़र रहती है और असफलताओं से थोड़ी निराशा भी होती है। एक रेसर जिसने मोटो जीपी यानि मोटरसाइकिलों की रेसिंग की दुनिया के लिए वो किया जो शायद हमारे जेनरेशन में माइकल शूमाकर ने फ़ॉर्मूला वन के लिए और सचिन ने क्रिकेट के लिए किया। रेस सर्किट में रॉसी की दिलेरी आजकल यूट्यूब पर आराम से देखी जाती है। आप में से जो मोटो जीपी रेसिंग की दुनिया से परिचित हैं उन्हें पता ही होगा कि रॉसी फिर से यामाहा की टीम के लिए रेस करते हैं, इस बीच में वो डुकाटी की टीम से हो आए हैं। हालांकि रॉसी के इर्द गिर्द की कहानियों में अब वो चुलबुलापन, सनसनी नहीं जैसे पहले थी। हाल में वो चार साल बाद पोल पोज़ीशन ले पाए। और फिर भी रेस में और चैंपियनशिप में दूसरे नंबर पर ही रहे। और पहले नंबर पर है वो शख़्स जिसने मोटरसाइकिल रेसिंग में वो कर दिखाया है कि सब भौंचक्के हैं, रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाता ऐसा नौजवान जिससे भिड़ने के बारे में फ़िलहाल ख़ुद रॉसी भी नहीं सोच सकता है। 
वो है मार्क मार्केज़। 
ये स्पेनिश राइडर एक ऐसा अजूबा है कि रिकॉर्ड की किताबें रंग दी गई हैं, रेस के जानकार भौंचक्के हैं और रॉसी जैसा रेसर इसे अपना बैड लक कह रहा है, जो उसे चैंपियनशिप ये जीत से इतनी दूर किए हुए है कि रॉसी बेबस दूर खड़ा है। 
मार्क मार्केज़। 

जब से मैंने ये नाम सुना तब से उसके नाम के साथ लोगों को यही कहते सुना है - आख़िर ये चीज़ क्या है मार्केज़ ? जिसने 2008  से हिला के रखा हुआ है मोटरसाइकिल रेसिंग की दुनिया को। फ़िलहाल मोटोजीपी का लगातार दूसरे साल वर्ल्ड चैंपियन है। जब आप खोजने जाएं तो पता चलेगा कि ये वो राइडर है जिसने सबसे कम उम्र में जीतने के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले हैं। एक से एक नए रिकॉर्ड बना दिए हैं। 1993 में पैदा मार्केज़ ने पहली बार 125 सीसी कैटगरी में क़दम रखा, जब उसकी उम्र पंद्रह साल से थोड़ी ही ऊपर थी। और तब से लेकर अब तक इस रोमांचक दुनिया को और हिलाया हुआ है। 20120 में 125 सीसी वाले कैटगरी में वर्ल्ड चैंपियन बना। 2012 में मोटो २ का वर्ल्ड चैंपियन, अब 2013 और 2014 का मोटोजीपी वर्ल्ड चैंपियन बना हुआ है। मोटोजीपी में भी सबसे कम उम्र में जीत हासिल करने वाला राइडर बना ये। तो ये सब रिकॉर्ड काफ़ी हैं समझाने के लिए कि इसकी काबिलियत क्या है। क्या इसका टैलेंट है और क्या ये आने वाले वक्त में कर सकता है।
फ़िलहाल मार्केज़ हौंडा रेप्सॉल रेसिंग टीम का राइडर है। तो एक वक्त में अपनी तेज़ी और ड्रामा की वजह से जैसे रॉसी नामी था, वैसे ही मार्केज़ के बारे में भी दुनिया बात कर रही है लेकिन इसमें तेज़ी ज़्यादा है ड्रामा कम है। तो आपमें से  किसी की भी थोड़ी भी दिलचस्पी है मोटरसाइकिल रेसिंग में तो इस नाम को याद रखिएगा। अगले सीज़न में भी नज़र रहेगी इस नौजवान पर जिसने रफ़्तार पकड़ी हुई है। 93 नंबर की बाइक पर नज़र रखिएगा आप लोग भी।

September 30, 2014

ये दिल्ली दिलवालों की नहीं...

इस नई दिल्ली से बाहर वालों को नहीं ख़ुद यहां के बाशिंदों को अब डर लग रहा है। अमीर बाप के बिगड़े औलादों से और बिगड़े बाप के अमीर औलादों से भी। 

घटना नंबर एक। 
पिछले शनिवार को मूलचंद के पास के पेट्रोल पम्प पर गाड़ी में तेल भरवाने गया। शनिवार की शाम का वक़्त जब पेट्रोल पंपों पर रौनक़ लगी रहती है। जहाँ दिल्ली के पार्टी पीपल क़रीने से कपड़ों में इस्त्री करके, बालों को सँवार कर, सँभल कर गाड़ियों में तेल भरवाते दिखाई देते हैं। जिससे वीकेंड के उनके पार्टी प्लान पर तेल के छींटें या ग्रीज़ का दाग़ ना लगे। कौरेस्पोंडेंस कोर्स से फ़ैशन की पढ़ाई करने वालों के लिए अच्छी जगह हो सकती है, समझने के िलए कि आजकल पोलो पैंट चल रहा है कि जोधपुरी। आई शैडो के शेड पर शोध की भी गुंजाइश। लेकिन मेरे पास काम था। तो जल्दी वापस ऑफ़िस जाना था। ख़ैर, मेरी कार की बारी भी आई, तेल भराने लगा। और इसी बीच अचानक तू-तू मैं-मैं की आवाज़ सुनाई दी। मैंने भी तेल भरने वाली मशीन के मीटर से अपना ध्यान तुरंत उस कोने पर लगा दिया जिधर चिल्लपों मचा हुआ था। लेकिन किसी असली ऐक्शन नहीं दिख रहा था क्योंकि ये सब हवा भरवाने वाली लाइन में हो रहा था और वो ओट में था। और फिर हाथापाई-थप्पड़ की भी आवाज़ सुनाई दी। ऐसे में तेल भरवाने वाले सभी ड्राइवर, भरने वाले सभी कारिंदे लालायित हो गए कि जल्दी से लड़ाई देखने के लिए बढ़ा जाए। एक नए तमाशे की उम्मीद से भरे थे हम सब। लेकिन जबतक मैं आगे बढ़ा, मामला मद्धम सा लगा। देखा एक टैक्सी ड्राइवर, अपनी इनोवा की खिड़की के रास्ते उतरने की कोशिश सा करता, आधे मन से चिल्लाता-गलियाता लगा। शायद उसी को थप्पड़ पड़ा। लेकिन दूसरी पार्टी नज़र नहीं आ रही थी। कि अचानक दिल्ली का फ़ेवरेट मौलिक आध्यात्मिक प्रश्न गूँजा- "तू जानता नहीं मैं कौन हूँ " और ये उसी ड्राइवर को संबोधित लगा। घूम कर देखा तो एक स्मार्ट सा आदमी हाथ में चमकती रिवोल्वर लहराता ये उद्घोष कर रहा था, चमकती-नक्काशी की हुई रिवॉल्वर। जो उस आदमी के फ़ैशन से मेल खाता लग रहा था, डिज़ाइनर दिल्ली वाले की डिज़ाइनर रिवॉल्वर। जिसे उस शख़्स ने अपनी पैंट में पीछे खोंसा और फिर सफ़ेद ह्युंडै में बैठ गया। और मैं आधे सेकेंड के लिए सोच में पड़ा कि आख़िर टायर में हवा भरवाने को लेकर क्या ऐसा बवाल हो सकता है कि कोई रिवॉल्वर निकाले? फिर मेरे पीछे वाले लोगों ने हॉर्न बजाना शुरू किया तो मैं भी आगे निकल गया।  
घटना नंबर दो। 
फिर से मैं पेट्रोल पंप पर। और इस बार मैं कार लेकर लाइन में खड़ा हुआ, हवा भरवाने के लिए । ये ग्रेटर कैलाश का इलाक़ा, शहर का पॉश, अमीर, पढ़ा लिखा इलाक़ा, लेकिन संभ्रांत ? नहीं । वो इलाक़ा जहां पर कारें पेट्रोल डीज़ल पर नहीं अहंकार पर चलती हैं। दिल्ली के कई संपन्न इलाक़ों की तरह यहां भी पढ़े-लिखे अनपढ़ की अवधारणा को समझा जा सकता है। तो इस पेट्रोल पंप पर क़तार में मेरे से आगे एक बुज़ुर्ग थे। उम्र काफ़ी लेकिन छरहरे, फ़िट से। रिटायर्ड आर्मी टाइप के लग रहे थे। और वो बड़े करीने से कार से उतर कर, चारों टायरों में हवा भरवाने के अलावा कार की डिक्की खोलकर भी खड़े थे कि स्टेपनी में भी हवा भरवा लें। और तुरंत पीछे एक सफ़ेद बीएमडब्ल्यू कार आकर रुकी। और अपनी तेज़ आवाज़ वाली कर्कश हॉर्न को दबाया। जिसे दिल्लीवालों की आदत समझ कर नज़रअंदाज़ किया जा सकता था। यहां पर वैसे भी ब्रेक दबाते ही लोग हॉर्न बजाते हैं। लेकिन उस ड्राइवर ने फिर से बजाया। आमतौर पर ड्राइवरों को इतनी जल्दी होती है लेकिन मैंने शीशे में देखा कि अपनी गर्लफ़्रेंड के साथ बैठा नौजवान उस बुज़ुर्ग की रफ़्तार से उकता कर हॉर्न बजा रहा है। मतलब कह रहा है कि जल्दी बढ़ो आगे। उसे कहीं पहुंचने की जल्दी थी या नहीं पता नहीं। लेकिन उसे इस क़तार में नहीं खड़ा होना था। उसे इंतज़ार नहीं करना था। 
घटना नंबर तीन। 
रात के एक बजे ऑफ़िस से घर के लिए निकला और ग्रेटर कैलाश के एन ब्लॉक के बाज़ार सामने से गुज़र रहा था। आमतौर पर शुक्र शनि की रात काफ़ी रौनक होती है इस सड़क पर जब मैं निकल रहा होता हूं। और रौनक के जितने मतलब निकाले जा सकते हैं वो सब यहां देखने को मिलता है। वो वक्त जब पब और रेस्त्रां बंद होने के बाद पार्टी-पीपल निकल रहे होते हैं, कुछ सड़क पर झूम रहे होते हैं जिनसे बच कर गाड़ी निकालनी होती है साथ में उनसे भी जो अपनी कारों को झुमा रहे होते हैं। कई रात पुलिस वालों के साथ तू-तू मैं मैं भी देखने को मिलता है। ख़ैर जिस ख़ास रात के बारे में मैं ज़िक्र कर रहा था उस रात ऐसे ही गुज़रते हुए फिर से गालियों की गूंज सुनाई दी और कारों की रुकी क़तार के आगे से आ रही थी। और आगे बढ़ने पर देखा कि इस बार एक ऑडी कार की खिड़की से सर निकाले नौजवान गालियां बक रहा है और ये थी सामने उल्टी तरफ़ से आती ऑल्टो कार के लिए, जिसमें एक बुज़ुर्ग जोड़ी थी, सकपकाई सी। पता नहीं ग़लती किसकी थी कि दोनों कारें ऐसे आमने सामने फंसी थीं, लेकिन ६० से ऊपर के उस जोड़े को,इतनी देर रात ऐसी सड़क पर देखकर किसी को भी दया आ जाए। 

ये दिल्ली है। और जितना ज़्यादा वक़्त सड़कों पर ड्राइव करते गुज़र रहा है, उसके बाद यही लग रहा है कि यही दिल्ली है। जहां सड़कों पर एक मान्यता प्राप्त जंगल राज है, जो क़ानून व्यवस्था के दायरे से दूर, यहां के लोगों के मनों में है। जो ट्रेंड उन हादसों से भी ज़्यादा हिंसक लगने लगे हैं जिनमें दरअसल दो हज़ार दिल्ली वाले अपनी जान गंवा देते हैं। वैसे ही मुंबई-बैंगलोर के दोस्त दिल्ली की बेरुख़ी और अग्रेशन से डरते-मज़ाक उड़ाते हैं, अब तो हालत और ख़राब होती लग रही है।  वो उजड्डपना और लंपटपना जो मारुति-ह्युंडै, बीएमडब्ल्यू-ऑडी, प्राइवेट और टैक्सी की सीमाओं को पार करता एक जैसा पूरे शहर पर पकड़ बना रहा है। जिसे रोड रेज के नाम से जाना जा रहा है, वो रेज जो रोज़ की बात हो गई है। जहां-तहां बीच सड़क पर रुकती गाड़ियां और फिर  उनमें से आस्तीन समेटते निकलते लोगों की आपस में बहसबाज़ी और गाली गलौज होते देखना दिल्लीवालों की आदत बन गई है। कई हॉर्न दबा कर बैठ जाते हैं, और उस प्रेशर हॉर्न की आवाज़ भी कम लगने लगती है तो फिर  चिल्लाने भी लग रहे हैं। अपने दोस्तों सहकर्मियों से ज़िक्र करो तो उनका एक ही डर होता है कि पता नहीं किस बात पर लोग बंदूक निकाल लें। बुज़ुर्ग, महिला या बच्चों की मौजूदगी भी नहीं शांत करती है इन लोगों को। 'दिल्ली दिलवालों की’ जैसे जुमले पहले भी शक के घेरे में थे अब तो और भी बेमानी लगते हैं। इस बेदिली का कोई भी मोटर वेह्किल ऐक्ट हार्ट ट्रांसप्लांट नहीं कर सकता । इस नई दिल्ली से बाहर वालों को नहीं ख़ुद यहां के बाशिंदों को अब डर लग रहा है। अमीर बाप के बिगड़े औलादों से और बिगड़े बाप के अमीर औलादों से भी। 

July 03, 2014

लाख रुपए माइनस !!!!!


अब ये एक बड़ी ख़बर है उन नौजवानों के लिए जो हैं थोड़ा हटके वाले सेगमेंट में। मोटरसाइकिलों के प्रेमी जो शौक़ीन भी हैं और जिन्हें बड़ी मोटरसाइकिलों का शौक़ है। उनके लिए ख़बर आकर्षक ही है क्योंकि अब २५० सीसी सेगमेंट की मोटरसाइकिलों में एक नई हलचल देखने को मिली है। और ये हलचल है उसी मोटरसाइकिल से जुड़ी जिसे हाल में मैंने चलाया था और आप सभी को जिसके बारे में बताया था। ये है सुज़ुकी की इनाज़ूमा । जिसके बारे में एक ही मुद्दा मुझे खटक रहा था और वो थी इसकी क़ीमत। तो सुज़ुकी ने लगता है सुनी और समझी है वो बात और कंपनी ने अपनी इनाज़ूमा की क़ीमत सीधे एक लाख रु कम कर दिया है। सोचिए एक लाख। जो मोटरसाइकिल साल की शुरूआत में ३ लाख १० हज़ार के आसपास उतारी गई थी उसे अब कंपनी ने २ लाख १० हज़ार के लगभग कर दिया है। और इस नए क़दम से अचानक मार्केट में कई समीकरण बदल सकते हैं। 
कंपनी ने देखा था कि शुरूआती महीनों में इनाज़ूमा को लेकर ज़्यादा गर्मजोशी नहीं थी और कंपनी को बिक्री नहीं मिल रही थी। उसकी सबसे बड़ी वजह उसकी क़ीमत ही थी तो कंपनी ने अपनी रणनीति बदली है। इस सेगमेंट में, जिसमें ज़रूरी नहीं कि केवल २५० सीसी इंजिन हों क़ीमत के हिसाब से भी, जिस तरीके से प्रोडक्ट आ रहे हैं और जितने विकल्प बढ़ रहे हैं, कंपनी को लगा कि इस कांपिटिशन में देरी करना ख़तरे से ख़ाली नहीं है। हालांकि ऐसा नहीं कि केवल क़ीमत कम करने से ही ग्राहक इसकी ओर आएंगे क्योंकि इससे सस्ती केटीएम ३९० ने सेगमेंट को हिला रखा है। लेकिन ये भी है कि सुज़ुकी की रिफ़ाइनमेंट और शांत राइड ख़ास तरीके के राइडरों के लिए पसंदीदा हो सकती है, और नई क़ीमत से कमसेकम ऐसे ग्राहकों पर सुज़ुकी ध्यान दे सकती है। 

सुज़ुकी मोटरसाइकिल कंपनी भारत में अब तक बहुत अाक्रामक नहीं रही है, कमसेकम जिस तरीके का आक्रामक रुख़ 
बाकी जापानी मोटरसाइकिल कंपनियों का रहा है वैसा नहीं रहा है और इस बार के क़दम से लग रहा है कि सुज़ुकी का मूड थोड़ा बदला है, कंपनी ने फ़ैसला जल्दी लिया है, जो बहुत ज़रूरी था भारत जैसे तेज़ मोटरसाइकिल बाज़ार में। कांपिटिशन को तेज़ी से समझना और तेज़ प्रतिक्रिया बताता है कि आप वाकई तैयार हैं या नहीं हैं। सुज़ुकी ऐसे ही कुछ संकेत दे रही है।


Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । कहीं ना कहीं छपी हुई है।

June 04, 2014

एक नए मेनिफ़ेस्टो की ज़रूरत



हर तरफ़ वादों और दावों के झंडे लहरा रहे हैं, बयानों और बहानों की बारिश हो रही है। ये मौसम है चुनावो का। जहां सभी ये जताने में लगे हैं कि आपकी फ़िक्र सबसे ज़्यादा की जा रही है, आपके एक वोट के लिए चांद तारे तोड़ कर लाने के वादे अब इतने पुराने हो गए हैं कि उन सबमें रोमांस बिल्कल ख़त्म हो गया है। अब सभी वोटर अपने अपने वोट को लेकर पहले कहीं ज़्यादा तैयार हैं, वोट के बदले में क्या मिल रहा है और क्या देना पड़ रहा है वो एक तौल रहे हैं। लेकिन अब ये कहने में भी कोई नयापन नहीं रह गया है कि अभी भी विचारधाराओं की लड़ाई के नाम पर वही स्कूली डिबेट चल रहा है जिसके पक्ष और विपक्ष में क्या क्या दलीलें देनी हैं वो युगों से नेता और जनता ने रट रखे हैं। वही आपको ट्विटर पर दिखेंग, वही फ़ेसबुक पर। तो ऐसे में, आज के वक्त में पॉलिटिक्स से अलग सोचना किसी भी उस इंसान के लिए मुश्किल है जो किसी भी तरीके के मीडिया से संपर्क में है। मास मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक। और पूरी बहस को देखते हुए मुझे लग रहा था कि कैसे इस बहस में वो मुद्दे अंट सकते हैं, जगह बना सकते हैं जो इतने सालों से नहीं बने। जिनकी वजह से एक तरफ़ तो लाख से ऊपर मरते हैं, लाखों घायल होते हैं, लाखों परिवार तबाह होते हैं और दूसरी ओर लोगों की बनावट को बदल रहा है, उन्हें आक्रामक बना रहा है और एक दूसरे के प्रति संवेदनहीन बना रहा है। 
 तो इस पूरी चर्चा के बीच लगता है कि एक और मेनिफ़ेस्टो है जिसके लिए जगह बनाने की ज़रूरत है। जिससे आने वाले वक्त मे देश की तस्वीर बेहतर हो। सड़क हादसों में हर साल जो सवा लाख से ज़्यादा लोग मारे जाते हैं, दुनिया में सबसे ज़्यादा लोग भारत में सड़कों पर दम तोड़ते हैं, एक ऐसा मेनिफ़ेस्टो जो उस कलंक को मिटाने की कोशिश करे। ये मेनिफ़ेस्टो है सड़क का मेनिफ़ेस्टो। 
लाइसेंस - सबसे पहले ज़रूरत है हमारी ड्राइविंग को ईमानदार बनाने की। देश के तमाम लाइसेंसिंग ऑथोरिटी में दलालों का कैसा साम्राज्य चलता है इसके बारे ना जाने कितनी बार लिखा-पढ़ा जा चुका है। लेकिन कैसे आसानी से बिना टेस्ट के लाइसेंस मिल जाते हैं, वो लाइसेंस जो किसी को भी सड़क पर गाड़ी लेकर जाने की इजाज़त दे देता है, चाहे वो मारुति ८०० या ऑल्टो है या फिर फ़ेरारी और लैंबोर्गिनी। चाहे ४० हॉर्सपावर की गाड़ी हो या ४०० की। चाहे स्प्लेंडर हो या हायाबूसा। और बिना ट्रेनिंग और बिना टेस्ट के मिले इस लाइसेंस का ख़तरा वैसा ही है जैसा कि बच्चे के हाथ में असल पिस्तौल देना है, बिना इसकी परवाह किए कि इससे किसी की जान जा सकती है। सोचिए कि जिस लाइसेंस के लिए कुछेक सौ रुपए एक्स्ट्रा देने के अलावा अगर और कुछ नहीं करना हो तो फिर उसकी अहमियत और ज़िम्मेदारी क्या रह जाएगा। जो सड़कों पर दिखता है, जहां ड्राइविंग की काबिलियत का कोई मापदंड नहीं है। सड़क पर नौसिखुए से लेकर एक्सपर्ट हर तरीके के ड्राइवर मिल जाते हैं। जो आम हालात में एक जैसी ड्राइविंग करते दिखेंगे, लेकिन जहां कुछ मुश्किल आई दोनों का रिएक्शन अलग होगा और नतीजा भी। चूंकि ये मामला सड़क का है तो ड्राइवर की बेवकूफ़ी का ख़ामियाज़ा केवल उस ड्राइवर को नहीं भुगतना पड़ता है। 
विदेशों में लाइसेंस मिलना एक उपलब्धि होती है, जिसके लिए बार बार फ़ेल होना भी आम बात है। यही नहीं कुछ सालों में फिर से टेस्ट लेकर लाइसेंस रिन्यू करना भी आम है। फिर ये भी होता है कि अलग अलग गाड़ियों या इंजिन क्षमता के लिए अलग लाइसेंस होते हैं। यानि ज़रूरी नहीं कि एक ही लाइसेंस से आप ऐक्टिवा भी चला सकें और डुकाटी भी। विडंबना यही है कि हमारे यहां वर्ल्ड क्लास प्रोडक्ट तो आ गए हैं लेकिन वर्ल्ड क्लास सेफ़्टी स्टैंडर्ड नहीं आए। तो ज़रूरत है हमारी लाइसेंिसंग व्यवस्था दुरूस्त हो। नए ज़माने के लिए, नई गाड़ियों के लिए बने। उन ऑफ़िसों से भ्रष्टाचार दूर हो। क्योंकि भ्रष्टाचार हमारी ज़िंदगी मुश्किल कर देता है, लेकिन लाइसेंस देने में भ्रष्टाचार ज़िंदगी मुश्किल नहीं, बल्कि ख़त्म कर देती है। तो क्या इस भ्रष्टाचार पर भी किसी पार्टी की नज़र जाएगी ?

पैदल - किसी यूरोप के शहर में टहलिए या जापानी सड़कों पर चलिए, ज़ेब्रा क्रॉसिंग से सड़क पार कीजिए। सामने से आने वाली गाड़ियों को देखिए, उनका रवैया देखिए। चलिए कई किलोमीटर तक। अगर आप गए हैं तो फिर कल्पना करने में कोई दिक़्कत नहीं, अगर नहीं गए हैं तो थोड़ा अपना तजुर्बा बता दूं। ज़्यादातर जगहों पर चलने वालों को तरजीह दी जाती है, फ़ुटपाथ का मतलब फ़ुटपाथ होता है, पैदल यात्रियों के लिए गाड़ियां रुकती हैं और अगर आप सड़क पार करे रहे हैं तो आपके लिए वो रुक जाएंगी, हम हिंदुस्तानियों के लिए आश्चर्य की एक और बात की वो ड्राइवर इशारा करेगा कि आप पहले पार कर लीजिए।  और फिर आईए वापस देश में। अब अपने अपने कॉलनी में चलिए, ऐसे ही फ़ुटपाथ पर चलने की कोशिश कीजिए, सड़क क्रॉस करने की कोशिश कीजिए और लंबी दूरी पैदल तय करने की कोशिश कीजिए। और अब अचानक लगेगा कि हमारे देश की सड़कें और ट्रैफ़िक व्यवस्था पैदल यात्रियों के बिल्कुल ख़िलाफ़ है। देश के ज़्यादातर शहरों में ज़्यादातर सड़कों के फ़ुटपाथ पर लोगों ने क़ब्ज़ा कर रखा है। बड़ी सड़कों पर ये क़ब्ज़ा ठेलेवालों और रिक्शे वालों का रहता है तो कॉलनी के अंदर अपने आप को सभ्य कहने वालों का होता है। जिनकी कोठियों के सामने की सड़क कार पार्किंग के तौर पर इस्तेमाल होती है। यानि अगर आप पैदल चलने की कोशिश करते हैं तो आपको चलती और पार्क की गई गाड़ियों के बीच रास्ता खोजना पड़ता है। तो जो टहलना आराम के लिए होता, एक संघर्ष में तब्दील हो जाती है। और इस संघर्ष का मतलब ये कि आपको केवल रास्ता नहीं ढूंढना होता है, जान भी बचानी होती है। और पैदल यात्रियों की भारत में जितनी कम इज़्ज़त है वो शायद ही कहीं हो। गाड़ी वाले उनके लिए रुकेंगे क्या, कुचल कर निकल जाते हैं। हाल में दिल्ली में एक नौजवान पैदलयात्री की कुचल कर मौत हो गई थी। जिसमें एक चौंकानेवाली दलील ये सुनने को मिल रही थी कि उस नौजवान ने कान में हेडफ़ोन लगाया हुआ था और कार की हॉर्न नहीं सुन पाया और कुचला गया। बताइए, यानि पैदल यात्री के जान की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उसकी ख़ुद की है, अगर उसने ग़लती की, हॉर्न नहीं सुना तो उसे अपनी जान गंवानी पड़ सकती है। सवाल ये है कि पैदल यात्रियों के हक़ के लिए क्या कोई क़दम उठाया जाएगा ? 


साइकिल ट्रैक- दिलचस्प बात ये है कि एक राजनीतिक पार्टी का चुनाव चिन्ह है साइकिल। एक हद तक राज्य में सरकार बनाने तक का रास्ता भी तय किया है साइकिल पर चढ़ कर ही। ये एक प्रतीक है। वहीं आम ज़िंदगी में भी साइकिल की अहमियत बहुत ज़्यादा है। ग़रीबों की सवारी के तौर पर देखें तो भी और हम सबकी ज़िंदगी में साइकिलों की इमोशनल मौजूदगी के तौर पर भी। लेकिन साइकिल चलाना आजकी तारीख़ में जान पर खेलने वाली बात है। जो आंकड़े बता रहे हैं कि देश में सड़क हादसों में मारे जाने वाले लोगों में आधी संख्या पैदल यात्रियों और साइकिल सवारों की ही होती है। और जिस तरीके से सड़कों को कारों के लिए बना सिग्नल वाले रास्ते बनाने की कोशिशें चल रही हैं ऐसे में पैदल यात्री और साइकिल सवार पर ख़तरा और बढ़ा है। हालांकि ये दोनों ही वर्ग ऐसे हैं जिसमें आम लोग होते हैं, ग़रीब होते हैं, और उनकी ज़िंदगी की क़ीमत राजनीति में कम आंकी जाती है इसलिए अब तक उनकी सेफ़्टी के लिए गंभीरता नहीं दिखाई देती है। हां ये हादसे हेडलाइन तभी बन पाते हैं जब कोई बड़ा नाम इसमें शामिल होता है, चोट पहुंचाने वाले में या फिर चोट खाने वाले में। हाल में हमने देखा था सेंटर फ़ॉर साइंस एंड इनवायरन्मेंट की सुनीता नारायण का जब साइकिल चलाते वक्‍त एक्सिडेंट हुआ था। अख़बारों में ख़बरें देखी थीं मैंने। कहने का मतलब ये नहीं आम साइकिल सवार का ऐक्सिडेंट हो तो ख़बर छपे, सवाल ये है कि क्यों नहीं इस तबके के लिए सोचा जाए कि दुर्घटनाएं कमसेकम हो।
क़ानून- मैं क़ानून का जानकार नहीं लेकिन ये ज़रूर समझ सकता हूं कि जो क़ानून हैं भी उनका पालन नहीं हो रहा है। पालन इसलिए नहीं हो रहा है कि क्योंकि उसे लागू करने में कोताही बरती जाती है। कोताही क्यों बरती जाती है ये सवाल ऐसा है जिस पर थिसीस लिखी जा सकती है। लेकिन इस कोताही से क्या कुछ हो रहा है ये अब दिख तो रहा है लेकिन इसकी गंभीरता समझी नहीं जा रही है। रेड लाइट जंप करने पर, ग़लत ओवरटेक करने पर, ओवरस्पीड करने पर इन सभी मौक़ों पर जब आराम से छूट जाते हैं, ज़्यादातर मौक़ों पर कोई देखनेवाला नहीं होता है, कुछेक मौक़ो पर १००से ४०० रु में छूट जाते हैं। या फिर किसी एक बच्ची को अपनी गाड़ी से कुचल देते हैं जिसके स्कूल का पहला दिन होता है, और उसके पिता को भी जो अपनी बेटी को स्कूल बस में पहले दिन जाते देखने की ख़्वाइश के साथ सुबह उठ कर आया था, जो गुड़गांव के एक अस्पताल में दिल का डॉक्टर भी था। और दोनों की जान लेने के बाद कुछ घंटों में अगर ड्राइवर को बेल मिल जाए, और वो ज़मानत पर छूट आए। ये सब देखकर यही लगता है कि यहां आप कुछ भी करके निकल सकते हैं, सब चलता है। 
अपनी बेटी और पति को एक साथ खोने के ग़म में जो महिला सदमे में चली जाती है, शायद हर साल सवा लाख परिवार भी ऐसे ही सदमे में चले जाते होंगे, जिनका अपना घर वापस नहीं आता होगा। लेकिन बाकी के हम लोग सदमे में नहीं जाते हैं। देश सदमे में नहीं जाता। सवाल यही है कि इस सदमे की आदत कब जाएगी ? 

Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । कहीं ना कहीं छपी हुई है।
(published before 2014 elections I guess..) 

May 14, 2013

New Thunderbird


एक ऐसी मोटरसाइकिल जिसके साथ मेरी शुरूआत अच्छी नहीं रही थी। रॉयल एनफ़ील्ड थंडरबर्ड। एक क्रूज़र बाइक, जैसी इनफ़ील्ड की सभी मोटरसाइकिलों को हम मानते हैं, जिसका आकार प्रकार भी क्रूज़र जैसा था। लंबी हैंडिल और कम ऊंचाई वाली सीट । वो शेप जिसे आमतौर पर हम अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में क्रूज़र बाइक के तौर पर देखते आए हैं। जब पहली बार ये बाइक आई थी तो मैं इसे चलाने नौएडा और ग्रेटर नौएडा के बीच एक्सप्रेस्वे पर गया था। तब सड़क बन ही रही थी, एक तरफ का ही काम पूरा हुआ था। उसी पर दोनों साइड का ट्रैफ़िक चल रहा था। और उसमें भी ट्रक ज़्यादा। और मेरे ठीक आगे चलने वाले ट्रक ने बीच सड़क ऐसी ब्रेक लगाई की कहानी ख़राब हो गई। बिना इंडीकेटर, बिना ब्रेक लाइट के ट्रक को रुका हुआ समझने में जितना वक्त लगा वो एक ऐक्सिडेंट के लिए काफ़ी था। मैंने ब्रेक किया, बाइक स्किड कर गई, कई मीटर तक घिसटती गई, साथ में मैं भी । ख़ैर । जैसा कि हर ऐक्सिडेंट के बाद होता है आप उसके हर पहलू को दिमाग़ में कई बार ध्यान दुहराते हैं, सोचते हैं। तो बहुत सारी चीज़ों में एक ख़ास चीज़ नए थंडरबर्ड ने लगा फ्रंट डिस्क ब्रेक। मेरे पास ख़ुद भी एक बुलेट ही थी और उसके ब्रेक की मुझे आदत थी, लेकिन थंडरबर्ड का डिस्क ब्रेक कहीं ज़ोरदार था। अगला पहिया तो वक्त से रुक गया, पिछला नहीं । पहली मुलाक़ात जब ऐसी रोमांचक थी तो याद तो आती ही। वैसे अब जो नई थंडरबर्ड आई है उसमें पिछले पहिए में भी डिस्क ब्रेक दिया गया है। लेकिन ये तो एक पहलू है। इसके अलावा भी कई बदलाव हैं जो नई थंडरबर्ड 500 को अहम बनाते हैं। ना सिर्फ़ ग्राहक के लिए बल्कि कंपनी के लिए भी। मोटरसाइकिल अब नए इंजिन, फीचर्स और लुक के साथ आई है। 500 सीसी का इंजिन अब लगभग 27 बीएचपी की ताक़त दे रहा है। जो इसे तेज़-तर्रार तो बनाती है। इसके अलावा छोटे मोटे ऐसे बदलाव हैं जो रॉयल एनफ़ील्ड की बदलती कहानी बयान कर रहे हैं। पिछले पहिए में डिस्क ब्रेक के बारे में तो बता दिया, लेकिन इसका असर एनफ़ील्ड की राइड पर कैसा पड़ा है वो भी बता दूं। आमतौर पर एनफ़ील्ड की मोटरसाइकिलों की ब्रेकिंग हमेशा से बड़ा मुद्दा रही है। कमसेकम वैसे ब्रेक नहीं रहे हैं जैसा आजकल हम बाकी मोटरसाइकिलों में देखते रहे हैं। लेकिन अब एनफ़ील्ड ने उस कमी को पूरा किया है। दोनों पहियों में डिस्क के बाद एक संतुलन और कांफिडेंस महसूस होता है राइडर को।  और केवल ब्रेक ही क्यों इंजिन और गियरशिफ़्ट भी अब राइड का कहीं बेहतर तजुर्बा दे रहे हैं। शहर के बाहर ही नहीं, शहरी ट्रैफ़िक में भी। लेकिन वो तो एक पहलू है। इस मोटरसाइकिल को नया बनाने के लिए और भी कई काम किया है कंपनी ने। जैसे टेक्नॉलजी को अपडेट करना। आमतौर पर देखते रहे हैं कि मोटरसाइकिल कंपनियां जो भी टेक्नॉलजी लाएं, फीचर्स लाएं, एनफ़ील्ड मोटरसाइकिलों में वो नहीं आते थे। जिसकी एक वजह थी ग्राहकों का प्यार, जो किसी भी हालत में एनफ़ील्ड ही लेना चाहते थे, फ़ीचर्स कैसे भी हों । लेकिन हाल में हार्ली डेविडसन ने एक तरह से क्रूज़र बाइक्स की दुनिया को भारत में बदला है। हालांकि एनफ़ील्ड के मुक़ाबले बहुत महंगी हैं लेकिन फिर भी ग्राहकों को नई टेक्नॉलजी और फ़ीचर्स से तो परिचित करवाया ही है। और इस नए और बदले माहौल में थंडरबर्ड एक ऐसी ही कोशिश लग रही है। डिजिटल डिस्प्ले लगा हुआ है इसके इंस्ट्रुमेंटेशन में। जिसमें फ़्यूल गेज और घड़ी के अलावा ट्रिपमीटर भी लगेगा। अब रॉयल एनफ़ील्ड की मोटरसाइकिल में एलईडी लाइट भी मिल रहा है। और ये सब दिल्ली में लगभग 1 लाख 57 हज़ार रु के एक्सशोरूम क़ीमत में मिल रहा है। 
तो लग रहा है कि कांपिटिशन का असर हो रहा है। टेक्नॉलजी बदल रही है, नज़रिया बदल रहा है। एक वक्त का आरामतलब ब्रांड ख़ुद को नए तरीके से बदलने की कोशिश कर रहा है। और इन सबके बीच ग्राहकों के लिए विकल्पों में बढ़ोत्तरी हो रही है। 

May 12, 2013

Lifestyle Biking 2013


सुपर 2013
अगर सबकुछ अपनी रफ़्तार से चला और वो लौंच देखने को मिले जिनकी योजना थी तो साल 2013 मोटरसाइकिलों के लिए भी एक ख़ास साल रहेगा। वो भी बड़ी मोटरसाइकिलों के इलाक़े में, वो मोटरसाइकिलें जिन्हें लोग शौक की वजह से ख़रीदते हैं ज़रूरत के लिए नहीं। पिछले दो-तीन सालों में, ख़ास तौर पर हार्ली डेविडसन के भारत आने के बाद हमने भारतीय लाइफ़स्टाइल बाइकिंग में ठोस तब्दीलियां देखी हैं। कंपनी ने लगभग दो साल में दो हज़ार के आसपास मोटरसाइकिलें बेची हैं। और ये संख्या केवल इस कंपनी के बारे में नहीं बता रहा है बल्कि बाज़ार के बारे में भी बता रहा है, ग्राहकों के बारे में भी । वो मोटरसाइकिलें, जिसका सबसे सस्ता मॉडल साढ़े पांच लाख रु के आसपास शुरू होता है, जो सिर्फ़ क्रूज़र बाइक्स बनाती है, उसने क्या ऐसा किया जो सही था। तो इसमें कंपनी की सभी कोशिशों को याद करना पड़ेगा, जिनमें अच्छे प्रोडक्ट, भारतीय बाज़ार के मद्देनज़र सस्ते प्रोडक्ट, आकर्षक पेमेंट स्कीम से लेकर ठोस आफ़्टर सेल्स सर्विस नेटवर्क की कवायद भी थी। इस कंपनी के अभी तक के प्रदर्शन से कुछ चीज़ें साफ़ हुई हैं, बाज़ार थोड़ा ऑर्गनाइज़्ड दिख रहा है। पहले लाखों की मोटरसाइकिलों का बाज़ार बहुत उहापोह में दिखता था। कुछेक पॉकेट्स में और चुनिंदा शहरों में। ये भी साफ़ हुआ है कि अगर भरोसा दिलाया जाए तो हिंदुस्तानी ग्राहक लाखों रुपए मोटरसाइकिल पर ख़र्च करने से नहीं डरेंगे। 2013 के बारे में बात करते हुए इस पुरानी कहानी का ज़िक्र करना इसलिए ज़रूरी था क्योंकि एक बड़ा ब्रांड जो इस साल भारत में अपने प्रोडक्ट ला सकती है, उसके लिए हार्ली का सफ़र एक बड़ी सीख हो सकता है। ये वो कंपनी है जिसने भारत में आने का ऐलान 2012 की शुरूआत में ही कर दिया था। ब्रिटिश मोटरसाइकिल कंपनी ट्रायंफ़। कंपनी ने ना सिर्फ़ ऐलान किया था भारत में एंट्री के बारे में बल्कि मोटरसाइकिलों की फ़ाइनल लिस्ट और उनकी क़ीमतों का ऐलान भी कर दिया। लेकिन 2012 के भीतर लौंच का वायदा पूरा नहीं कर पाई। जो अच्छी शुरूआत नहीं कही जा सकती है। लेकिन उम्मीद यही है कि इस साल भी आ जाए वक्त पर तो ज़्यादा नुकसान नहीं होगा। ये एंट्री मुझे इसलिए भी ख़ास लग रही है क्योंकि ट्रायंफ़ मोटरसाइकिल कंपनी हार्ली से जुदा है। केवल अमेरिकी और ब्रिटिश कंपनी की बात नहीं है। ट्रायंफ़ का पोर्टफ़ोलियो कहीं ज़्यादा विस्तृत है। जहां हार्ली केवल क्रूज़र मोटरसाइकिलें बनाती है वहीं ट्रायंफ़ के पास हर तरीके की मोटरसाइकिलें हैं जो ना सिर्फ़ ग्राहकों को विकल्प देंगी बल्कि ग्राहकों को नए कौंसेप्ट से परिचित भी करवाएगी। यानि अब तक हम हिंदुस्तानी मोटरसाइकिल प्रेमी दो तरीके की बड़ी मोटरसाइकिलों को जानते हैं सुपरबाइक्स और क्रूज़र। लेकिन ट्रायंफ़ ने अपने पत्ते सही खोले तो ग्राहक उसकी टूरिंग मोटरसाइकिलों को पहचान पाएंगे, क्लासिक सिटी स्पोर्ट्स बाइक जान पाएंगे, ऑफ़ रोड मोटरसाइकिलें भी देख पाएंगे। लेकिन उन सबके लिए ग्राहक जाएं इससे पहले कंपनी को अपनी तरफ़ से गंभीरता दिखानी पड़ेगी, ठोस रणनीति और नेटवर्क के साथ । लेकिन सवाल ये है कि क्या कंपनी कर पाएगी ये सब ? जवाब वही जानती है कि कितना आत्मविश्वास है और भारतीय बाइकरों पर विश्वास है। लेकिन केवल एक कंपनी ही साल को ख़ास नहीं बनाएगी भारतीय बाइक बाज़ार को। ये सिर्फ़ एक सिरा है। बाकी प्रोडक्ट और भी हैं। 
जिस सेगमेंट के बढ़ने का इंतज़ार मैं कई सालों से कर रहा था वो अब दिख रहा है। यानि किफ़ायती मोटरसाइकिलों और सुपरबाइक्स के बीच के सेगमेंट में इस साल कई एंट्री हम देख सकते हैं। वैसे इस सेगमेंट में हाल में जो गतिविधियां दिखी हैं वो बता रही हैं कि ये सेगमेंट काफ़ी ज़ोरों से बढ़ रहा है। और इसके अगले चैप्टर इस साल देखेंगे। जैसे हौंडा की तरफ़ से हमने ढाई सौ सीसी की मोटरसाइकिल देखी सीबीआर 250 के तौर पर, फिर 150 सीसी की स्पोर्ट्स बाइक आई। अब इस साल हौंडा की 500 सीसी वाली नई सीबीआर हम देख सकते हैं, जिसे कंपनी ने अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में पेश किया था। वहीं एक सीनियर बाइक आ सकती है केटीएम की तरफ़ से। केटीएम ने अपनी 200 सीसी की ड्यूक को काफ़ी इंतज़ार करवाने के बाद भारत में पेश किया था और अब वो लेकर आ रही है अपनी ड्यूक 390। देखते हैं कि इसकी क़ीमत क्या होती है। वैसे इनके अलावा भी कुछ मोटरसाइकिलों की फेहरिस्त है। और इनकी क़ीमत 4 लाख रु के इर्दगिर्द रह सकती है। 
तो इन सब मोटरसाइकिलों के लौंच की वजह से साल 2013 को शायद वो साल पुकारा जा सकता है जब लाइफ़स्टाइल बाइकिंग भारतीय बाइकर्स के लाइफ़स्टाइल का हिस्सा बने।
Published in jan 2013

May 10, 2013

Bajaj Discover 100T

चाहे कितनी भी हज़ार सीसी वाली सुपरबाइक्स आ जाएं। 400-600 सीसी की स्पोर्ट्स बाइक्स आ जाएं। भारतीय मोटरसाइकिल मार्केट जहां आमतौर पर हर महीने 7-8 लाख बाइक्स बिकती हैं वहां पर अगर किसी ने राज किया है और करने वाला है तो वो है सौ सीसी सेगमेंट। हालांकि इसे केवल इंजिन की क्षमता से इसे नहीं समझा जा सकता है। ये दरअसल वैसी मोटरसाइकिलों का सेगमेंट है जो सौ सीसी की रही हैं और इनकी क़ीमत कम रहे। तो एक तरह से एंट्री सेगमेंट और सौ सीसी मोटरसाइकिलों को एक ही माना जाता रहा है। और जब पैमाना कम क़ीमत हो तो कई बार प्रोडक्ट केवल पैसा वसूल बन कर रह जाती हैं, क़ीमत को कम रखने के चक्कर में कंपनी की तरफ़ से फ़ीचर्स की लिस्ट बिल्कुल ख़त्म हो जाती थी और लुक की तो बात ही मत कीजिए, और ये चल भी जाता था। लेकिन हाल के सालों में ये ट्रेंड बदला है, ग्राहक पैसा वसूल सवारी भी थोड़ा अपटूडेट चाहते हैं। स्टाइल की थोड़ी छौंक चाहते हैं और कंपनी से थोड़े फ़ीचर्स की उम्मीद भी होती है। हाल के कई प्रोडक्ट ऐसे ही मापदंड पर बनते दिखाई दे रहे हैं। हरेक बाइक निर्माता अपनी ओर से कोशिश कर रहा है सबसे बड़े मोटरसाइकिल सेगमेंट में अपने प्रोडक्ट को ज़्यादा बेहतर पैकेज बनाने की। और अगर कहें कि ग्राहकों को इससे फ़ायदा ही हो रहा है तो ग़लत नहीं होगा। हाल में इस सेगमेंट में काफ़ी हलचल देखी जब पहली बार हीरो से गठजोड़ टूटने के बाद हौंडा ने अपने बूते इस सेगमेंट की बाइक ड्रीम युगा उतारी, सुज़ुकी ने भी अपनी हायाते उतारी थी। और ऐसे में बाकी पुराने खिलाड़ी तो पीछे रहेंगे नहीं। इन सब गतिविधियों को देखकर बजाज ने भी अपनी कोशिश तेज़ कर दी है। इसी सिलसिले में आई है नई बजाज डिस्कवर 100टी। सौ सीसी की मोटरसाइकिल जो दावा कर रही है कि इसकी माइलेज तो सौ सीसी वाली होगी और ताक़त सवा सौ सीसी वाली। तो एक तीर से कई निशाने लगाने की कोशिश है बजाज की। यानि कंपनी ने अपनी पिछली कोशिश को बिल्कुल उलट कर अपने ग्राहकों को फिर आकर्षित करने की कोशिश की है। आपको याद होगा कि कंपनी ने एक सवा सौ सीसी मोटरसाइकिल एक्सीड उतारी थी। जिसके साथ कंपनी का दावा था कि वो सवा सौ सीसी की ताकत तो देगी ही, फ़ीचर्स तो देगी ही, साथ में सौ सीसी वाला माइलेज भी। अपने ख़ास इंजिन के सहारे कंपनी को उम्मीद थी कि वो हीरो की सत्ता पलट देगी। लेकिन वैसा हुआ नहीं था। इस बार दूसरी तरफ़ से आक्रमण किया है बजाज ने। देखते हैं ग्राहक 51 हज़ार रू की एक्स शोरूम क़ीमत वाली इस बाइक को कैसे देखते हैं। हालांकि कंपनी के हिसाब से इसमें वो सब मसाला है जो किसी भी फ़िल्म को हिट कर सकता है। 10 बीएचपी की ताक़त , 5 स्पीड गियरबॉक्स । यही नहीं कंपनी का दावा है 87 किमीप्रतिलीटर की माइलेज का। अब ये सब पैकेज ऐसा है जो ग्राहकों को पसंद आ सकता है, लेकिन कितना ये फिलहाल पता नहीं। वैसे ये तो तय है कि बजाज अपनी तरफ़ से पूरी ताक़त ज़रूर लगा रही है इस मोटरसाइकिल पर। और हो भी क्यों नहीं, कंपनी बड़ी मोटरसाइकिल सेगमेंट में तो बेस्टसेलर है लेकिन सौ सीसी सेगमेंट में कंपनी ऊपर नीचे जाती रही है। कभी प्लैटिना और डिस्कवर 100 ने अच्छी बिक्री देखी कभी फीकी रही, लेकिन ये साफ़ है कि बजाज को अब अगर अपनी पोज़ीशन संभालनी है, आगे जाना है तो फिर सौ सीसी सेगमेंट में ऐसा प्रोडक्ट ज़रूर चाहिए जो लंबे वक्त तक बढ़िया प्रदर्शन करे।
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May 08, 2013

अपन हिंदुस्तानी हैं शौकीन...


विंटेज कारों की दुनिया बहुत ही ख़ास होती है, सभी कारों के साथ एक से एक कहानी जुड़ी होती है। सब एक से एक दिलचस्प। ऐसी ही दुनिया में घूमते हुए एक विंटेज कार रिस्टोरर से सालों पहले मुलाक़ात हुई थी। दिल्ली के एक किनारे में बने एक फ़ॉर्महाउस में उनके वर्कशॉप पर उनसे बात हो रही थी, मैंने पूछा कि सबसे अनोखी कार कौन सी है उनके कलेक्शन में । तो उन्होंने बताया कि एक कार ऐसी थी जिसके लिए उन्होंने काफ़ी पैसे ख़र्च किए। ना सिर्फ़ पैसे बल्कि सौदे के लिए उन्होंने पुरानी रोल्स रॉयस तक दे डाली। ये सब एक कार के लिए जिसका  नाम था मिनर्वा। इसके बारे में आम भारतीय कार प्रेमियों को कम पता है क्योंकि ये बीसवीं शताब्दी की शुरूआत में कार बनाती थी। ऐसा नहीं कि ये कार बहुत ही ज़ोरदार हो, या इंजनीयरिंग का अद्भुत शाहकार हो । लेकिन अब दुनिया भर में इक्का-दुक्का कारें ही ऐसी बची थीं, ऐसे में ये कार बहुत ही नायाब बन गई थी।


कुछ साल पहले लुधियाना के सफ़र पर निकला था। साइकिल और होज़ियरी के लिए नामी इस शहर के साथ एक और ख़ास आंकड़ा जुड़ा था। वो था आबादी के अनुपात में देश में सबसे ज़्यादा मर्सेडीज़ कारों का। और ऐसे में एक से एक शख़्सियतों से मिलने का मौक़ा मिला। जिनमें से प्रॉपर्टी डीलर और बिज़नेसमेन तो आम थे। लेकिन एक बहुत बड़ी संख्या थी वैसे किसानों की जो बड़े किसान थे और मर्सेडीज़ का शौक पूरा कर रहे थे। उन्हीं में से एक शख़्स ने बहुत ही दिलचस्प बात बताई। उनके मुताबिक उनकी कार नॉर्थ इंडिया में अनोखी थी। मैंने जब उनकी कार देखी तो लगा कि आम सी क्लास मर्सेडीज़ है। मैंने पूछा कि इसमें क्या ख़ास है, ये तो सी क्लास है। तो उन्होंने जवाब दिया कि ये कार तो आम है लेकिन इसमें लगा इंजिन पूरे नॉर्थ इंडिया के किसी सी क्लास में नहीं। मैं लाजवाब हो गया। 

ये दोनों कहानी तब याद आई जब किसी ने सवाल किया कि इंपोर्टेड कारों को लेकर ऐसी दीवानगी क्यों है। और क्यों लोग तरह तरह के तिकड़म के ज़रिए इंपोर्टेड कारों को ख़रीदने में लगे रहते हैं और पकड़े भी जाते हैं। वो है एक्सक्लूसिविटी। गाड़ी तो आज हर इंसान ख़रीद रहा है, ऐसे में हम अलग औऱ ख़ास कैसे दिखें ...इसी सवाल का जवाब बहुतों के लिए इंपोर्टेड कार के तौर पर आती है। 

बुगाटी वेरोन-

कोई जाता है दुनिया में सबसे ताक़तवर कार की तरफ़। बुगाटी की वेरोन। वो कार जिसे बनाना ही शुरू किया गया इस आइडिया के साथ कि एक ऐसी कार बने जिसका इंजिन हज़ार हॉर्जोसपावर से ज़्यादा है और सबसे तेज़ कार बने। वेरोन इसी वजह से सबसे तेज़ चलने वाली कार बनी। भारत में शौकीनों के लिए इसका एक आंकड़ा काफ़ी था। टॉप स्पीड 407 किमीप्रतिघंटा। इसकी भारत में क़ीमत 16 करोड़ रु से शुरू होती है। वो भी एक्सशोरूम क़ीमत। यानि ऑन रोड होते होते क़ीमत में कुछ और शून्य जुड़ जाते हैं। 

हमर -
भारत में एसयूवी का अलग रोमांस है। और दुनिया भर में सबसे दमदार एसयूवी माना जाता है हमर को ही। हालांकि कंपनी बंद हो गई लेकिन अभी भी भारत में इस भारी भरकम एसयूवी के वर्ज़न बिकते दिख जाएंगे। जहां अमेरिका में आर्नोल्ड श्वार्ज़ेनेगर जैसे फौलादी ऐक्टर हमर के फ़ैन हैं ही...भारत में धोनी और हरभजन सिंह ने भी करोड़ से ऊपर की इस स्पोर्ट्य यूटिलिटी गाड़ी को ख़रीदा है। वैसे भारत में इंपोर्ट होने वाली सबसे लोकप्रिय कारों में से हमर एक है। जो पहले सिर्फ़ आर्मी के लिए बनाई गई थी और बाद में आम ग्राहकों केलिए इसे बनाया गया।       हाल में सीबीआई ने जो गाड़ियां पकड़ी हैं, उनमें भी हमर ज़रूर थी।


फ़ेरारी -

भारत में रफ़्तार के नाम पर सबसे पहले अगर किसी एक कार ब्रांड का नाम आता है तो वो है फ़ेरारी । फ़ेरारी की सवारी तो बाद में आई। बस ऑटो में भी फ़ेरारी के स्टिकर दिखते रहते हैं। शूमाकर से लेकर तेंडुलकर सभी स्पोर्ट्स आइकॉन इस कार के दीवाने रहे हैं। और भारत के अरबपतियों को भी पता है कि अगर ये कार नहीं है गेराज में तो उनका रुतबा अधूरा है। इसीलिए कंपनी ने भी भारत में बिक्री शुरू कर ही दी है। क़ीमत की शुरूआत मात्र ढाई करोड़ रु से। जो जाती है 4 करोड़ रु तक।

लैंबोर्गिनी-
भारतीयों को इटैलियन ब्यूटी कुछ ज़्यादा ही पसंद हैं। एक और इटैलियन महारथी जो सबकी फ़ेवरेट है वो है लैंबोर्गिनी। सस्ती ये भी नहीं है। 2 करोड़ रु से शुरू होती है। जाती है पांच करोड़ तक। लैंबोर्गिनी अवांतेडोर औऱ गलार्डो हर रईस हिंदुस्तानी के लिए ज़रूरी नाम बने हुए हैं। 

रोल्स रॉयस
भारत में अभी भी महाराजाओं के लिए प्यार गया नहीं है। और ये सबसे बड़ी वजह है रोल्स रॉयस से प्यार के पीछे। अभी भी रोल्स रॉयस को ख़रीदना रईस होने की सबसे बड़ी निशानी में से एक है। क़ीमत भले ही 3 से 6 करोड़ रु के बीच हो लेकिन अभी भी लोग इस कार के लिए 8 से 9 महीने इंतजार करने के लिए तैयार हैं। कंपनी ने भारत में वापसी के वक्त जिस बिक्री का अंदाज़ा लगाया था, बिक्री उसे कब का पार कर चुकी है।

बेंटली

कुछ ने इस कंपनी को रोल्स रॉयस के विकल्प के तौर पर देखा तो कुछ ने ज़्ज़्यादा स्पोर्टी लंगज़री कार के तौर पर। ये है बेंटली। ये कार भी भारत में करोड़ों की ही आती है। डेढ़ से तीन करोंड़ तक की कारें आती हैं बेंटली की। शाही के साथ स्पोर्टी अंदाज़ जोड़ने के लिए भारतीय रईसों को ये कार काफ़ी पसंद आती है।


इन सभी कारों को इंपोर्ट करना कुछ साल पहले तक लालफीताशाही में फंसने का रास्ता माना जाता था । लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। दुनिया की लगभग हर नामी कार भारत में किसी ना किसी तरीके से आ चुकी है। कुछ अपनी कंपनी के शोरूम के ज़रिए तो कुछ ऑफिशियल इंपोर्टर के ज़रिए। तो ऐसे में जो भी शौकीन हैं उनके पास कई ज़रिए हैं अपनी मनपसंद कार को ख़रीदने का। तो जब ऐसी उपलब्धता है फिर क्यों आए दिन हम इंपोर्टेड कार के घोटाले की ख़बर देखते रहते हैं। तो इसमें एक बड़ी भूमिका है विदेशी कारों पर लगने वाले इंपोर्ट ड्यूटी की भी। भारत में इंपोर्ट होने वाली कार पर जो ड्यूटी देनी पड़ती है वो कार की क़ीमत को दुगना कर देता है। यानि पचास लाख की कार एक करोड़ की और एक करोड़ की कार दो करोड़ की। और इसी से बचने के कई तरीके देखे जाते हैं जब कारें पकड़ी जाती हैं। 


वैसे एक्सक्लूसिव कारों के लिए शौक कई बार मज़ेदार मोड़ ले लेता था। महंगी लग्ज़री कारों के लिए लोग लालायित रहते थे औऱ ऐसी कार पाने के लिए कई बार हास्यास्पद हद तक जाते थे। एक जाने माने गायक के ऊपर एक ऐसी ही कार इंपोर्ट करने वाली कंपनी ने केस कर दिया था। हुआ ये था कार इंपोर्टर ने एक चमचमाती पीली फ़ोक्सवागन बीटल जर्मनी से इंपोर्ट की थी। ये किसी ग्राहक के लिए था, जिसके नाम पर कार रजिस्टर हो चुकी थी, लेकिन डिलिवरी नहीं हुई थी। लेकिन जब नामी सिंगर ने कार टेस्ट ड्राइव के लिए मंगवाई तो इंपोर्टर ने कार को भेज दिया। और फिर जो हुआ हो तो ज़बर्दस्त कहानी बन गई। इंपोर्टर के मुताबिक उस सिंगर ने कार को फिर से अपने नाम रजिस्टर करवा कर रख लिया और कहा कि आप दूसरी कार इंपोर्ट कर लीजिए। जीहां ऐसी दीवानगी थी कारों के लिए और ऐसी कमी थी ऐसे शौकीनों के लिए इंपोर्टे कारों के लिए।


(कुछ महीने पहले छपा )

ऑफ़र और डिस्काउंट का डिस्को


आवश्यकता आविष्कार की जननी है। कार कंपनियों के लिए भी वक्त ऐसा ही आ गया है, जब उन्हें अपनी कारों को बेचने के लिए नए तरीकों का आविष्कार करना पड़ रहा है। कमसेकम कार मार्केटिंग के हिसाब से यही कहेंगे , क्योंकि कार कंपनियों को ये सब करते नहीं देखा था जो भारत में फिलहाल देखा जा रहा है। हां बड़े-बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर में साबुन-शैंपू-नूडल्स के शेल्फ़ पर तो हम देखते ही हैं, लेकिन कार डीलरशिप ने भी ऐसी ही स्कीम दे डाली। बाई-वन-गेट-वन फ़्री । गुजरात से ख़बर आई कि श्कोडा के एक डीलरशिप ने ऐसी गणित निकाली है कि वो एक रैपिड कार की ख़रीद पर वो ग्राहकों को फ़ाबिया कार मुफ़्त दे रही है। हालांकि ये कंपनी की ओर से दिया जाने वाला ऑफ़र नहीं लेकिन फिर भी कहानी दिलचस्प है। डीलरशिप ने आइडिया ये निकाला कि पांच साल के बाद ये फ्री वाली फ़ाबिया मिलेगी। अगर फ़ाबिया बनानी कंपनी बंद कर देती है तो उसकी जगह जो कार आएगी वो दी जाएगी। और अगर ये डीलरशिप कार रिप्लेस नहीं कर पाएगी तो फिर उसकी जगह साढ़े तीन लाख रु पेनल्टी के तौर पर देगी। भले ही ये एक डीलरशिप की कोशिश है, लेकिन कंपनियां भी अपनी जुगत लगा ही रही हैं। ये सिर्फ़ एक नमूना है उस मार्केटिंग की कोशिश का जिससे पता चल रहा है कि कंपनी कैसे कैसे पैंतरे अपना रही है  गाड़ियों को बेचने के लिए। जैसे टाटा मोटर्स ने सबसे पहले तो अपनी मांज़ा और इंडीका रेंज की कारों की क़ीमत को कम किया पचास हज़ार रु तक। उसके बाद कंपनी ने मांज़ा पर एक अनूठा ऑफ़र दिया कि अभी ख़रीदिए और 3 साल के बाद कंपनी उसे वापस ख़रीद लेगी, कार की 60 फ़ीसदी क़ीमत के साथ। किसी को भी आकर्षित करने के लिए ये ऑफ़र काफ़ी ज़ोरदार कहेंगे, जबकि आजकल लोग तीन-चार साल में ही कार बदलना चाहते हैं। इसके अलावा नैनो को लेकर भी टाटा मोटर्स ने कुछ बैंक के साथ गठजोड़ किया है और नैनो भी दुकान से सामान ख़रीदने जैसी कहानी है...क्रेडिट कार्ड स्वाइप कीजिए और नैनो लेकर निकल जाइए। और बिना ब्याज के ईएमआई। 
वहीं वेंटो के साथ फोक्सवागन ने ऑफ़र दिया कि अपनी पुरानी कार दीजिए और एक रुपए में वेंटो ले जाइए। बाक़ी की क़ीमत एक साल बाद। साथ में कुछ शर्तें भी हैं। लेकिन ये तो तय है कि जो ग्राहक ऐसी डील के इंतज़ार में थे उनके लिए बहुत अच्छा वक्त है। एक और स्कीम कंपनी ने दी कि आधी क़ीमत में वेंटो ले जाइए और बाकी की क़ीमत एक साल के बाद। 
वहीं जापानी कार कंपनी निसान अपनी कारों को बेचने के लिए सबसे कम ईएमआई का चैलेंज लेकर आई है। जिसके प्रचार दिख रहे हैं। वहीं कुछ लग्ज़री कार कंपनियां अपनी कारों को बजट से पहले की क़ीमत में लेने के लिए ग्राहकों को बुला रही है।
ये तो कुछ अलग तरीके के ऑफ़र हैं, वैसे बाज़ार में परंपरागत ऑफ़र अभी भी मौजूद हैं । कार पर डिस्काउंट, फ्री इंश्योरेंस या ऐक्सेसरीज़ जैसे ऑफ़र और एक्सचेंज बोनस भी। एक तरीके से कहें कि कार ख़रीद का अच्छा वक्त है तो ग़लत नहीं होगा...हां कंपनियों की हालत को पस्त है ही, फरवरी में कारों की बिक्री पच्चीस फ़ीसदी गिरी जो है। 
(कुछ महीने पहले छपा )