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December 29, 2014

असली बाइकर नक़ली बाइकर

बार बार उन्हें बाइकर बुलाया जाता है तो बुरा लगता है। असल बाइकर ऐसे थोड़े ही ना होते हैं। बहुतों को जानता हूं, जो दिल से और जीने के तरीके में बाइकर हैं। ख़ुद मैं भी उनमें से हूं जो ये मानते हैं कि बाइक पर लंबी राइड जीवन के लगभग हर तरीके की परेशानी को दूर कर देती है। और ऐसे में जब बिना हेलमेट के, सैकड़ों के झुंड में देर रात सड़कों पर, लोगों को परेशान करते हुए, बाइक भगाते नौजवानों को देखता हूं तो फिर बुरा लगता है। उन्हें देखकर ये नहीं लगता है कि वो इस सवारी का मज़ा लेने के लिए निकले हैं। साफ़ लगता है कि वो भड़ास निकालने के लिए निकले हैं सड़कों पर। उनके सामने पुलिस वालों को भी एक तरीके से बेबस देखता हूं। एक जिप्सी में दो पुलिस वालों के सामने से एक साथ 50 मोटरसाइकिलें निकलें तो फिर किसी को भी संभालना मुश्किल लगेगा ही। और कौन उनसे उलझे वाले भाव से वो दूसरी ओर देखने लगते हैं। कौन उन्हें हेलमेट के लिए पूछे और कौन रेडलाइट जंप करने पर सवाल करे। और ऐसे में नतीजा ये होता है कि बाइकसवार हुड़दंग मचाते चलते हैं और जो लोग उनके रास्ते में आते हैं परेशान होते रहते हैं। और सबसे ज़्यादा ये हुड़दंग देखने को मिलता है किसी ना किसी त्यौहार के दौरान। जहां पर मानो लाइसेंस मिल जाता है सब बाइकसवारों को कुछ ना कुछ स्टंट करने का। और जब तक पुलिस वालों पर नहीं पड़ती वो उन्हें घेरते भी नहीं। पहले तो पुलिस नज़रअंदाज़ करती रही, फिर टीवी चैनलों पर लगातार विज़ुअल दिखाने पर दबाव बढ़ा और फिर पुलिस ने कार्रवाई करनी शुरू की। और पिछली बार तो हद ही हो गई, जब एक बाइकसवार की पुलिस की गोली से मौत ही हो गई। कुछ वक्त पहले घटना सामने आई है जहां पर पुलिस वालों ने लगभग 400 बाइकसवारों को पकड़ा, 250 मोटरसाइकिलों को ज़ब्त किया। इसकी भी तस्वीर काफ़ी अजीबोगरीब थी, पुलिसवालों को ऐसे डंडे बरसाते देखा गया कि समझ नहीं आ रहा था कि पुलिस करना क्या चाहती है इनके साथ। लाठी के चोट लिए नौजवान भी बिलबिलाते दिखे। ख़ैर, इस सबके बाद इन सभी नौजवानों की काउंसेलिंग भी करवाई गई। दिल्ली पुलिस ने तमाम धर्मगुरूओं को बुला कर इन नौजवानों को समझाने के लिए कहा। उन्होंने अपने अपने संदेश दिए। बाद में इनके मां-बाप को बुलाया गया, उनसे बात की गई और कहा गया कि अपने बच्चों को सिखाएं संभालें। इन क़दमों से लगा कि पुलिस कुछ तो रास्ते पर है इस समस्या से निपटने में। लेकिन अनुशासन एक बार में तो बनता नहीं है। रोज़ रोज़ की आदत ही अनुशासन में बदलेगी । तो पहले तो पुलिस को नियमों के पालन के लिए ज़ोर लगाने की ज़रूरत है, जिससे नियमों को तोड़ना किसी को भी आसान ना लगे। एनफ़ोर्समेंट की कमी नियम-क़ानून को बेमानी बना देते हैं। और हर बार बाइकसवारों को हुड़दंग के बाद यही देखने को मिलता है। दूसरे पुलिस को इन नौजवानों से निपटने के लिए इनसे बात करनी होगी, केवल कड़ाई से तो ये उम्र रुकने वाली होती नहीं है। ऐसे में ज़रूरत है कि उनसे पुलिस किसी ना किसी तरीके से एक संवाद भी बनाए, उनसे बात करे और समझाए कि केवल नियम के लिए नहीं अपनी जान की सुरक्षा के लिए भी सेफ़्टी ज़रूरी है। और ये भी कि असल बाइकर अपनी बाइक से प्यार तो करते ही हैं, बाकी सवारों की इज़्ज़त भी करते हैं।

*पहले छपी हुई है। 

September 30, 2014

ये दिल्ली दिलवालों की नहीं...

इस नई दिल्ली से बाहर वालों को नहीं ख़ुद यहां के बाशिंदों को अब डर लग रहा है। अमीर बाप के बिगड़े औलादों से और बिगड़े बाप के अमीर औलादों से भी। 

घटना नंबर एक। 
पिछले शनिवार को मूलचंद के पास के पेट्रोल पम्प पर गाड़ी में तेल भरवाने गया। शनिवार की शाम का वक़्त जब पेट्रोल पंपों पर रौनक़ लगी रहती है। जहाँ दिल्ली के पार्टी पीपल क़रीने से कपड़ों में इस्त्री करके, बालों को सँवार कर, सँभल कर गाड़ियों में तेल भरवाते दिखाई देते हैं। जिससे वीकेंड के उनके पार्टी प्लान पर तेल के छींटें या ग्रीज़ का दाग़ ना लगे। कौरेस्पोंडेंस कोर्स से फ़ैशन की पढ़ाई करने वालों के लिए अच्छी जगह हो सकती है, समझने के िलए कि आजकल पोलो पैंट चल रहा है कि जोधपुरी। आई शैडो के शेड पर शोध की भी गुंजाइश। लेकिन मेरे पास काम था। तो जल्दी वापस ऑफ़िस जाना था। ख़ैर, मेरी कार की बारी भी आई, तेल भराने लगा। और इसी बीच अचानक तू-तू मैं-मैं की आवाज़ सुनाई दी। मैंने भी तेल भरने वाली मशीन के मीटर से अपना ध्यान तुरंत उस कोने पर लगा दिया जिधर चिल्लपों मचा हुआ था। लेकिन किसी असली ऐक्शन नहीं दिख रहा था क्योंकि ये सब हवा भरवाने वाली लाइन में हो रहा था और वो ओट में था। और फिर हाथापाई-थप्पड़ की भी आवाज़ सुनाई दी। ऐसे में तेल भरवाने वाले सभी ड्राइवर, भरने वाले सभी कारिंदे लालायित हो गए कि जल्दी से लड़ाई देखने के लिए बढ़ा जाए। एक नए तमाशे की उम्मीद से भरे थे हम सब। लेकिन जबतक मैं आगे बढ़ा, मामला मद्धम सा लगा। देखा एक टैक्सी ड्राइवर, अपनी इनोवा की खिड़की के रास्ते उतरने की कोशिश सा करता, आधे मन से चिल्लाता-गलियाता लगा। शायद उसी को थप्पड़ पड़ा। लेकिन दूसरी पार्टी नज़र नहीं आ रही थी। कि अचानक दिल्ली का फ़ेवरेट मौलिक आध्यात्मिक प्रश्न गूँजा- "तू जानता नहीं मैं कौन हूँ " और ये उसी ड्राइवर को संबोधित लगा। घूम कर देखा तो एक स्मार्ट सा आदमी हाथ में चमकती रिवोल्वर लहराता ये उद्घोष कर रहा था, चमकती-नक्काशी की हुई रिवॉल्वर। जो उस आदमी के फ़ैशन से मेल खाता लग रहा था, डिज़ाइनर दिल्ली वाले की डिज़ाइनर रिवॉल्वर। जिसे उस शख़्स ने अपनी पैंट में पीछे खोंसा और फिर सफ़ेद ह्युंडै में बैठ गया। और मैं आधे सेकेंड के लिए सोच में पड़ा कि आख़िर टायर में हवा भरवाने को लेकर क्या ऐसा बवाल हो सकता है कि कोई रिवॉल्वर निकाले? फिर मेरे पीछे वाले लोगों ने हॉर्न बजाना शुरू किया तो मैं भी आगे निकल गया।  
घटना नंबर दो। 
फिर से मैं पेट्रोल पंप पर। और इस बार मैं कार लेकर लाइन में खड़ा हुआ, हवा भरवाने के लिए । ये ग्रेटर कैलाश का इलाक़ा, शहर का पॉश, अमीर, पढ़ा लिखा इलाक़ा, लेकिन संभ्रांत ? नहीं । वो इलाक़ा जहां पर कारें पेट्रोल डीज़ल पर नहीं अहंकार पर चलती हैं। दिल्ली के कई संपन्न इलाक़ों की तरह यहां भी पढ़े-लिखे अनपढ़ की अवधारणा को समझा जा सकता है। तो इस पेट्रोल पंप पर क़तार में मेरे से आगे एक बुज़ुर्ग थे। उम्र काफ़ी लेकिन छरहरे, फ़िट से। रिटायर्ड आर्मी टाइप के लग रहे थे। और वो बड़े करीने से कार से उतर कर, चारों टायरों में हवा भरवाने के अलावा कार की डिक्की खोलकर भी खड़े थे कि स्टेपनी में भी हवा भरवा लें। और तुरंत पीछे एक सफ़ेद बीएमडब्ल्यू कार आकर रुकी। और अपनी तेज़ आवाज़ वाली कर्कश हॉर्न को दबाया। जिसे दिल्लीवालों की आदत समझ कर नज़रअंदाज़ किया जा सकता था। यहां पर वैसे भी ब्रेक दबाते ही लोग हॉर्न बजाते हैं। लेकिन उस ड्राइवर ने फिर से बजाया। आमतौर पर ड्राइवरों को इतनी जल्दी होती है लेकिन मैंने शीशे में देखा कि अपनी गर्लफ़्रेंड के साथ बैठा नौजवान उस बुज़ुर्ग की रफ़्तार से उकता कर हॉर्न बजा रहा है। मतलब कह रहा है कि जल्दी बढ़ो आगे। उसे कहीं पहुंचने की जल्दी थी या नहीं पता नहीं। लेकिन उसे इस क़तार में नहीं खड़ा होना था। उसे इंतज़ार नहीं करना था। 
घटना नंबर तीन। 
रात के एक बजे ऑफ़िस से घर के लिए निकला और ग्रेटर कैलाश के एन ब्लॉक के बाज़ार सामने से गुज़र रहा था। आमतौर पर शुक्र शनि की रात काफ़ी रौनक होती है इस सड़क पर जब मैं निकल रहा होता हूं। और रौनक के जितने मतलब निकाले जा सकते हैं वो सब यहां देखने को मिलता है। वो वक्त जब पब और रेस्त्रां बंद होने के बाद पार्टी-पीपल निकल रहे होते हैं, कुछ सड़क पर झूम रहे होते हैं जिनसे बच कर गाड़ी निकालनी होती है साथ में उनसे भी जो अपनी कारों को झुमा रहे होते हैं। कई रात पुलिस वालों के साथ तू-तू मैं मैं भी देखने को मिलता है। ख़ैर जिस ख़ास रात के बारे में मैं ज़िक्र कर रहा था उस रात ऐसे ही गुज़रते हुए फिर से गालियों की गूंज सुनाई दी और कारों की रुकी क़तार के आगे से आ रही थी। और आगे बढ़ने पर देखा कि इस बार एक ऑडी कार की खिड़की से सर निकाले नौजवान गालियां बक रहा है और ये थी सामने उल्टी तरफ़ से आती ऑल्टो कार के लिए, जिसमें एक बुज़ुर्ग जोड़ी थी, सकपकाई सी। पता नहीं ग़लती किसकी थी कि दोनों कारें ऐसे आमने सामने फंसी थीं, लेकिन ६० से ऊपर के उस जोड़े को,इतनी देर रात ऐसी सड़क पर देखकर किसी को भी दया आ जाए। 

ये दिल्ली है। और जितना ज़्यादा वक़्त सड़कों पर ड्राइव करते गुज़र रहा है, उसके बाद यही लग रहा है कि यही दिल्ली है। जहां सड़कों पर एक मान्यता प्राप्त जंगल राज है, जो क़ानून व्यवस्था के दायरे से दूर, यहां के लोगों के मनों में है। जो ट्रेंड उन हादसों से भी ज़्यादा हिंसक लगने लगे हैं जिनमें दरअसल दो हज़ार दिल्ली वाले अपनी जान गंवा देते हैं। वैसे ही मुंबई-बैंगलोर के दोस्त दिल्ली की बेरुख़ी और अग्रेशन से डरते-मज़ाक उड़ाते हैं, अब तो हालत और ख़राब होती लग रही है।  वो उजड्डपना और लंपटपना जो मारुति-ह्युंडै, बीएमडब्ल्यू-ऑडी, प्राइवेट और टैक्सी की सीमाओं को पार करता एक जैसा पूरे शहर पर पकड़ बना रहा है। जिसे रोड रेज के नाम से जाना जा रहा है, वो रेज जो रोज़ की बात हो गई है। जहां-तहां बीच सड़क पर रुकती गाड़ियां और फिर  उनमें से आस्तीन समेटते निकलते लोगों की आपस में बहसबाज़ी और गाली गलौज होते देखना दिल्लीवालों की आदत बन गई है। कई हॉर्न दबा कर बैठ जाते हैं, और उस प्रेशर हॉर्न की आवाज़ भी कम लगने लगती है तो फिर  चिल्लाने भी लग रहे हैं। अपने दोस्तों सहकर्मियों से ज़िक्र करो तो उनका एक ही डर होता है कि पता नहीं किस बात पर लोग बंदूक निकाल लें। बुज़ुर्ग, महिला या बच्चों की मौजूदगी भी नहीं शांत करती है इन लोगों को। 'दिल्ली दिलवालों की’ जैसे जुमले पहले भी शक के घेरे में थे अब तो और भी बेमानी लगते हैं। इस बेदिली का कोई भी मोटर वेह्किल ऐक्ट हार्ट ट्रांसप्लांट नहीं कर सकता । इस नई दिल्ली से बाहर वालों को नहीं ख़ुद यहां के बाशिंदों को अब डर लग रहा है। अमीर बाप के बिगड़े औलादों से और बिगड़े बाप के अमीर औलादों से भी। 

September 22, 2011

Traffic मसाला डोसा


...रोज़ फेसबुक पर मैं लिख रहा हूं, वो लाइनें जिसे कई बकवास मानते हैं, मैं कहता हूं ट्रैफ़िक मसाला डोसा। जिसकी एंट्री वहां होती है, जिस डब्बे को दिखाकर ज़ूकरबर्ग कहता है कि आपके सर पर क्या सवार है, ये दोस्तों को बताइए। और चूंकि अभी भी चिट्ठी के आख़िर में मैं योर्स ओबिडिएंटली क्रांति संभव ही लिखता हूं तो मैं इस बक्से में भी कुछ लिखने लगा हूं...जिसे कहते हैं स्टेटस मेसेज और जो मेरे जज़्बातों के लिए मसाज का काम भी करता है। वो जज़्बात जो उभर कर आते हैं कई बार सड़कों के बीच में...जब बाईं ओर से स्कॉर्पियो वाला मुझे ओवरटेक करता है, मोबाइल पर बात करने की वजह से जो नहीं दे पाता है इंडीकेटर और उसे लगता है कि टेलिपैथी के ज़रिए मैं समझ जाउंगा कि वो अब ओवरटेक करके अचानक दाएं होने वाला है और फिर स्लो हो जाने वाला है, मानो उसने संकट मोचन मंदिर में यही मन्नत मांगी थी कि देश के किसी मूर्धन्य या फिर धन्य  कुचले पत्रकार को उसकी औक़ात समझा सकूं...वैसे इमानदारी से कहूं तो हाल में मेरी गाड़ी में जितना ख़र्चा लगा है, उसे चुकाने के बाद मैं पहले से कहीं ज़्यादा संवेदनशील हो गया हूं, मैं -कोई मिल गया- का रितिक रौशन हो चुका हूं, कि मुझे पता चल जाता है कि तीन किलोमीटर आगे कैसे कोई सैंट्रो वाला मेरे लिए घात लगाए बैठा है, जो अचानक शाहरुख़ ख़ान की तरह अपनी स्टीयरिंग घुमाएगा और मेरे कलेजे के एक सत्रहवें हिस्से को मेरे मुंह के रास्ते निकलने की वजह देगा। लेकिन कई बार ये सिक्स्थ सेंस बिज़ी होता है।
सैंट्रो के सिग्नल को बीच में इंटरसेप्ट करके एक सफ़ेद कॉलसेंटर सिंड्रोम से पीड़ित टवेरा मुझे पहले दाएं से ओवरटेक करती है, फिर बाएं से, आगे जाकर अचानक ब्रेक मारती है, फिर अचानक पीछे से आकर हॉर्न बजाती है...लग रहा है कि मैं ज्वेल थीफ़ का देव आनंद हूं, गरदन टेढ़ी करके ढोल बजा रहा हूं और वो टवेरा वैजंति माला है और इर्द गिर्द नाचते हुए कह रही है कि होठों पे ऐसी बात मैं छुपा के चली आई.... वैसे बुनियादी सवाल ये है कि वाई शुड आई केयर कि कॉल सेटंर टवेरा क्या बात छुपा सकती है...हाऊ मे आई हेल्प यू मिस्टर बॉब फ्रॉम बाल्टीमोरडैम इट...तो इसी पूर्वाग्रह के साथ मैं विश्वामित्र की तरह स्थिर चित्त एक रफ़्तार में चला जा रहा हूं, ये बात अलग है कि पिछली बारिश में ये गाड़ी भीग गई थी, मंदाकिनी से थोड़ा कम और श्रीदेवी से थोड़ा ज़्यादा, जिसके बाद से मेरी गाड़ी की टॉप स्पीड मेरी मजबूरी है विकल्प नहीं।  वैसे ये काबिलेतारीफ़ बात कही जानी चाहिए और रोटरी क्लब के द्वारा मुझे प्रशस्ति पत्र मिलना चाहिए कि पूरा देश जब इनकसेंस्टेंसी से जूझ रहा है, वहां पर मेरी कंसेस्टेंसी आने वाली नस्लों के लिए एक समाजशास्त्रीय स्टडी हो सकती है। लेकिन फिर ये सोच कर अपनी मांग वापस लेता हूं कि उस सर्टिफिकेट से मुझे एक लीटर पेट्रोल भी नहीं मिलेगा...तो वापस आता हूं उसी स्कॉर्पियो पर, सॉरी टवेरा या सैंट्रो ...आई डोंट नो मेट...लगता है भूल गया...
वैसे कई सारी हैं, सड़कों पर दिमाग़ ज़्यादा चलता है इसलिए कई तरीके के कैल्कुलेशन करता रहता हूं...कई बार नुसरत और कोल्डप्ले सुनते हुए कई बार मैडम अख़्तर को सुनते हुए और कई बार चुप्पी में भी। ख़ैर। फिर से वापस आता हूं। पिछले शुक्ल पक्ष या विपक्ष की बात है....लाजपत नगर की सड़क पर ट्रैफ़िक में दबा सा, मिडिल क्लास के डेली स्ट्रगल को गरिमामंडित करते हुए अपनी धीमी रफ़्तार गाड़ी से सड़क के बीचो बीचे चला जा रहा था....सबसे दाईं वाली लेन में गाड़ियों की क़तार लगती दिखाई दे रही थी...वो जगह ऐसी है जहां पर एक ही सड़क के दो हिस्से एक दूसरे से रूठते हुए मुड़ जाते हैं, एक तो बाईं तरफ़ सेंट्रल मार्केट में चली जाती है, जिस मोड़ के एक तरफ़ एक ज़माने में स्टूडेंट बस पास बनाने वाला सीमेंट का चहलपहल भरा कमरा दीखता था, और उसके दूसरे ओर इतने जूस कॉर्नर हुआ करते थे कि ज्योमेट्री के सारे थ्योरम से इंसानियत का भरोसा उठ जाए, दाएं बाएं तो ठीक, बीच और ऊपर वाले दुकान भी ख़ुद को जूस कॉर्नर ही बताते, जूस सेंटर या सेंटर फ़ॉर्वर्ड नहीं...रूठी हुई सड़क का दूसरा सिरा बहुत ही महत्वाकांक्षी तरीके से एक फ्लाईओवर में तब्दील हो जाता है। वैसे उसकी अकड़ भी जल्द ख़त्म हो जाती है जब 8 लेन का ट्रैफ़िक तीन लेन में अंटने की कोशिश में, इसका करियर नेहरू नगर में जाकर भद्दे तरीके से ख़त्म कर देता है।  लेकिन आज कहानी वहां तक नहीं जा रही है। प्लॉट तो पहले से तैयार हो गया था। एक श्कोडा वाले सज्जन ने ट्रैफ़िक के मोमेंटम के ऊपर अपने हार्मोनल ज़रूरत को तरजीह दी, अधेड़ उम्र में अपने जीवन के माएने खोजने की प्रक्रिया में नज़र एक बाला पर टिकी, और जैसा कि कोई भी 42 साल का शरीफ़ शादीशुदा इंसान करेगा, प्रकृति की उस सुंदर क्रिएटिविटी को इज़्ज़त देगा, ख़ुद को नहीं रोकेगा तो ऐसा ही उन्होंने भी किया। ख़ुद को बिल्कुल नहीं रोका, गाड़ी रोकी। और ज़ाहिर है कि ऐसी अलौकिक प्रक्रिया में कोई भी जानबूझ कर अड़चन नहीं डालेगा, जिसके भी दिल में जज़्बात हैं और कार की स्टीरियो में अन्नू मलिक के गाने हैं वो अप्रिशिएट तो करेगा ही इस जज़बात को, और बल्कि उसी बाला को निहार कर अपना सपोर्ट भी प्रदर्शित करेगा। लेकिन सच्चाई के अनगिनत पहलुओं में से एक पहलू है कलयुग भी और इसी युग के बर्थ सर्टिफिकेट के नशे में चूर एक नौजवान नहीं कद्र कर पाया इस रेयर खगोलीय घटना को और रगेत के मारा अपनी कार, लाल श्कोडा के पीछ लगी 8 गाडियों की कतार में सबसे आख़िर में खड़ी गाड़ी में। रगेत वाला वर्ड हमेशा मुझे फैसिनेट करता है, इट्स फ्रॉम पटना यू नो। अगर दिल्ली वाली हिंदी में बोलूं तो सूत के मारा। वहीं इसका एक बॉलीवुड पैरलल खींचू तो बिल्कुल उसी तरह मारा जैसे आई थिंक इंस्पेक्टर सन्नी या किसी बन्नी ने एक चमड़े के बैट से विलेन के पृष्ठ भाग में ऑटोग्राफ़ दिया था। तो आगे बढ़ते हैं। तो उस सफ़ेद सफ़ारी ने अगली गाड़ी को ठोका, जो न्यूट्रल में थी, उसने उसी चोट को आगे पास किया, फिर आगे और आगे एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया। अचानक 8-9 गाड़ियां जो कुछ सेकेंड पहले तक प्रकृति के साथ एकाकार होते लैंडस्केप का हिस्सा थीं, एक अनचाहे चुंबन का शिकार बनी। जिसमें रत्ती भर भी ब्यूटी नहीं थी, पैशन नहीं था, क्योंकि इसमें होठों की जगह सफ़ारीनुमा हथौड़े का इस्तेमाल था, जो दिल दहलाने वाला और शरीर से लेकर आत्मा तक को चोट पहुंचाने वाला था। और मैं इस घटना का गवाह था। लग रहा था मेरी आंखें एक ऐसे कैमरे की तरह हैं, जो बल्ले से निकले बॉल के साथ चल रहा है, ज़ूम इन या ज़ूम आउट नहीं..साथ में चल रहा है। एक हाई डेफिनिशन वीडियो जिसकी एक एक डीटेल मेरे सामने खुल रही है। ये सब मैंने बताया तो बहुत रायता फैला कर है लेकिन कुल मिलाकर 2-3 सेकेंड में ये लंका-कांड समाप्त हो चुका था।
जैसा कि कहा जाता है कि शरीर तो सिर्फ़ वस्त्र है, और जिस फटे वस्त्र के लिए इंश्योरेंस भी क्लेम कर सकते हैं उसके लिए क्या रोना, क्या फ़ील करना। वैसे भी अपने ईएमआई, पेट्रोल और बिजली बिल का रोना कम है कि उन टिन के वस्त्रों के लिए सोचूं। लेकिन थोड़ा सोचा। फिर ये भी सोचा कि क्या सोचा ये बताने की मजबूरी तो नहीं है, वैसे भी ब्लॉग पर मैं लिख रहा हूं...डज़न्ट मैटर की ये पढ़ कर किसी के जीवन में कुछ ऐड हो या ना हो, मैं तो कमसेकम इसे अपने दिमाग़ के डेटाबेस से सबट्रैक्ट कर लूं। लेकिन फिर भी मैं आम भारतीय की तरह नॉन जवाबदेहिक सलाह तो दे ही दूं...सड़क के सबसे दाईं ओर कम ही चलाएं...वैसे इंटरनैशनली उसका इस्तेमाल ओवरटेकिंग के लिए होता है लेकिन मैं ग़ुलाम मानसिकता वाला भारतीय नहीं हूं इसलिए इंटरनैशनली इसका इस्तेमाल किसी के लिए भी हो, आई डू नॉट केयर। सड़क की बाईं ओर चलाने से व्यू बेहतर होता है दरअसल, बस स्टॉप होता है, ऑटो स्टैंड होता है, और संजय लीला भंसाली से नई हीरोईन खोजने का एकतरफ़ा वायदा आपने कर रखा है वो बेहतर तरीके से निभा पाएंगे। और अगर गाड़ी रोकनी भी पड़े तो अनचाहे चुंबन की आशंका कम ही हो। तो इसी अनमोल एडवाइस के साथ.... शब्बा ख़ैर।