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January 25, 2015

इटैलियन बेनेली की इंडियन एंट्री


इटैलियन गाड़ियों का ज़िक्र आते ही हमारे ज़ेहन में एक से एक दमदार और ख़ूबसूरत कारों, मोटरसाइकिलों और स्कूटरों की तस्वीर आती है। चाहे तेज़ तर्रार ख़बूससूरती हो फ़ेरारी या लैंबोर्गिनी जैसी सुपर कारों की, डुकाटी जैसी मोटरसाइकिल हों या फिर कूल दिखने वाले स्कूटर हों, चाहे वेस्पा हो या लैंब्रेटा, जिस ना सिर्फ़ आज के रफ़्तार प्रेमी पसंद करते हैं बल्कि पुराने ज़माने के हिंदुस्तानी भी। लेकिन इस फ़ेहरिस्त में बेनेली ऐसा नाम नहीं रहा है। ये भी एक मोटरसाइकिल ब्रांड है और और इस बीच में अगर बेनेली का नाम हम ले रहे हैं तो इसकी यही वजह है कि इस कंपनी ने भी दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मोटरसाइकिल बाज़ार में आख़िरकार एंट्री मार ली है। 

सबसे पुरानी इटैलियन मोटरसाइकिल कंपनी ने ऐलान किया है कि वो भारत में अपनी पांच मोटरसाइकिल उतारने वाली है। TNT 302, TNT 600 GT, TNT 600i, TNT 899, TNT 1130 R 
यहां पर TNT का मतलब है Tornado Naked Tre । इनकी क़ीमतों का अभी ऐलान नहीं हुआ है, अभी औपचारिक लौंच का इंतज़ार है। कंपनी फ़िलहाल अपने डीलरशिप को अंतिम रूप देने में लगी है।

कंपनी की योजना है कि वो भारत में अगले 6-8 महीने में 20 डीलरशिप बनाएगी, जिनमें से आठ बड़े शहरों में तीन-चार महीनों में सबसे पहले डीलरशिप शुरू होंगे, जिनमें मौजूदा मेट्रो शहर शामिल हैं। ख़बर ये भी है कि कंपनी इन स्पोर्ट्स बाइक्स के साथ छोटी मोटरसाइकिलें उतारने की भी सोच रही है। 

सौ साल से पुरानी इस इटैलियन कंपनी फ़िलहाल चाइनीज़ कियानजियांग ग्रुप का हिस्सा है। अब वो भारत में डीएसके मोटोव्हील्स के साथ आई है। जो इन मोटरसाइकिलों को फ़िलहाल पुणे में असेंबल करेगी, बेचेगी और सर्विस-स्पेयर पार्ट का ज़िम्मा उठाएगी। 



* पुरानी छपी हुई है

January 01, 2015

मॉडर्न ख़ानाबदोश, जो छुट्टी के बाद वापस नहीं गया...


अपनी भागती दौड़ती ज़िंदगी में से कुछ दिन निकाल कर हम-आप छुट्टी पर जाते हैं, वेकेशन पर जाते हैं, नई नई जगहें देखते हैं, लोगों और परंपराओं से परिचय होता है, और फिर ख़ुश होकर वापस अपनी ज़िंदगी, अपने काम पर वापस आ जाते हैं। दोस्तों की क़िस्से सुनाते हैं, फ़ोटो दिखाते हैं और फिर कुछ दिनों में फिर से वो जोश ठंडा पड़ जाता है। फिर हम अगली छुट्टी के सपने देखने लगते हैं। लेकिन सोचिए अगर हम ऐसी किसी छुट्टी पर निकलें और फिर बिना काम पर वापस आए अगली छुट्टी पर निकलें और फिर अगली। वैसे सोच भी लिया तो हमें ये भी पता होता है कि नौकरी, परिवार और ईएमआई के फेरों के साथ ये फ़िल्मों में हो सकता है असल ज़िंदगी में नहीं। लेकिन एक शख़्स ऐसे हैं जिनकी असल कहानी फ़िल्मी कही जा सकती है। 
नाम है इनका जेन्स जेकब, जर्मनी में पैदा व्यवसायी हैं। इनका सपना था दुनिया देखना, अलग अलग लोगों,  संस्कृतियों और परंपराओं को देखना-महसूस करना। तो उन्होंने इस सपने को सपना नहीं रहने दिया।  
अपनी 1965 मॉडल की फोक्सवागन कॉम्बी कार ली और निकल गए दुनिया घूमने। अपनी इस पचास साल पुरानी सवारी को जेकब प्यार से ब्लूई पुकारते हैं। और ब्लूई को उन्होंने अपनी ज़रूरतों के हिसाब से बदल भी दिया है। इसमें एक छोटी रसोई बनाई है, पानी की टंकी है, टायर और टूल भी। साथ में कुछ किताबें भी।


जन्स जेकब ने अपने लंबे सफ़र को शुरू तो अकेला किया था लेकिन अब उनके साथ उनकी पत्नी सिंथिया भी चल रही हैं। जिनसे वो दुबई में मिले थे। ये जोड़ी अब तक 26 देश घूम चुकी है। 60 हज़ार किलोमीटर से ऊपर का सफ़र। नीदरलैंड, बेल्जियम, फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, इटली, ग्रीस, तुर्की, दुबई, ओमान, ईरान और फिर भारत भी। 

अब ये जोड़ी भारत घूमने के बाद नेपाल और तिब्बत की योजना बना रही है और सफ़र वहीं नहीं रुकेगा। आगे सफ़र इंडोनेशिया और वियतनाम की ओर रुख़ करने वाला है। 
तो सोचिए आप भी कब निकल रहे हैं ऐसे सफ़र के लिए। 


*पुरानी छपी हुई है। 

December 31, 2014

इमोशनल अपील


आज का वक्त ऐसा आ गया है जब कारों और मोटरसाइकिलें बहुत हद तक एक जैसे हो गए हैं। अगर तकनीकी और आंकड़ों के हिसाब से देखें तो बहुत हद तक मिलते जुलते। जैसे किसी एक सेगमेंट को ले लीजिए, तो वहां पर इंजिन की क्षमता, बीएचपी से लेकर गाड़ी की माइलेज वगैरह एक जैसे ही नज़र आएंगे। अंतर होगा, लेकिन मामूली। ऐसा नहीं जो क्रांतिकारी हो और आपके ख़रीद के फ़ैसले को बदल दे, या फिर यूएसपी बन जाए। कुछेक ही प्रोडक्ट आजकल ऐसे होते हैं जिनके पास ऐसे एक्सक्लूसिव फ़ीचर्स होते हैं और वो फ़ीचर्स भी जल्द बाकी कंपनियां ले आती हैं। ऐसे में हम कोई प्रोडक्ट क्यों ख़रीदते हैं इस फ़ैसले को किसी नंबर और मीटर पर  नापना बहुत आसान या सीधा काम नहीं है। इसमें काफ़ी हद मार्केटिंग और ब्रांडिंग की चाशनी फैली रहती है और बहुत हद तक इन सबके नतीजतन हमारा फ़ैसला इमोशनल भी हो जाता है। अपने आसपास किसी से भी पूछिए तो जड़ में जो वजहें आती हैं वो कई बार आती हैं जिसे क़ीमत या बीएचपी में समझना मुश्किल है। बहुत हद तक फ़ैसला आ जाता है उसी प्वाइंट पर कि कार को देख कर हम कैसा महसूस कर रहे हैं, गाड़ी के साथ क्या महसूस कर रहे हैं। तो वही बात कि सवारियों की ख़रीदारी में जहां समझदारी का रोल होता है बहुत सा हिस्सा उसकी अपील से जुड़ा भी होता है। ख़ैर ये सब मैं सोच रहा था जब ऑडी की एक कार चलाने का हाल में मौक़ा आया था। और ये सोच इसलिए आ रही थी, क्योंकि मैं सोच रहा था कि इसे चलाने की मुझे ज़्यादा इच्छा क्यों नहीं हई थी अब तक। और इसके पीछे कोई ठोस लॉजिक वाली वजह नहीं थी। ऑडी की टीटी कूपे। दो दरवाज़ों वाली छोटी स्पोर्टी कार जो मुख्य तौर पर स्पोर्टी छोटी कार के तौर पर आती है। हाल में इसके नए किट यानि एस लाइन कही जाने वाले किट की वजह से ऑडी चाहती थी कि मैं इसे चला कर देखूं कि कैसा है ये नया पैकेज। और ये भी समझूं कि कैसा प्रदर्शन होता है इसका। कितनी रोमांचक है ये कार। ऑडी टीटी को अगर देखें पहली नज़र में बहुत अलग सी कार लगेगी, छोटी स्पोर्ट्स कार तो लगेगी ही, क्योंकि है तो टू सीटर ही, पीछे दो सीटें को बस ख़ानापूर्ती के लिए ही हैं। इस छोटे आकार के साथ जो चीज़ सबसे पहले आपके ज़ेहन में जाएगी वो है इसकी बनावट, इसका लाइन। ये किसी भी एंगिल से शार्प या तीखी बनावट वाली कार नहीं लगेगी। हेडलैंप से लेकर टेललैंप तक, छत से लेकर बंपर तक, सबकुछ गोलाई लिए है। जो मेरे पसंद का नहीं है, हालांकि ढेरों कार प्रेमी हैं जिन्हें ये पसंद है डिज़ाइन। ख़ैर। कार को मैंने चलाना शुरु किया और इसको इंजिन की ताक़त औऱ हैंडलिंग ने समां तो बांधा। तेज़ और हल्की कार, बढ़िया हैंडलिंग और ठोस सस्पेंशन से लैस। जितना इसे चलाता गया, उतनी रोमांचक ये कार लगती गई। इसका छोटा आकार औऱ इसका 211 हॉर्सपावर की ताक़त मुझे मज़ेदार लग रही थी।  इसका इंजिन 1984 सीसी की था। तो पैकेज शानदार लग रही थी। और चूंकि ये ऑडी टीटी कूपे का एस लाइन वर्ज़न था तो अंदर ज़्यादा शाही था, सीटें ज़्यादा आरामदेह। कुल मिलाकर ड्राइव का अनुभव अच्छा हुआ और रोमांचक लगा। तो फिर सोचा कि इसका लुक मुझे ज़्यादा पसंद नहीं था शायद इसलिए अपील नहीं करती थी ये कार पहले। लेकिन आजके प्रदर्शन से तो अच्छी ही लग रही थी। और फिर दिल के बाद बारी आई एक दिमाग़ी एंगिल की। वो है इसकी क़ीमत लगभग 56 लाख रु। औऱ फिर बिंदू वहीं जाकर विश्राम करने चली गई। अगर आपको ये कार दिल से अच्छी है तभी लेंगे आप, नहीं तो इस बजट में कई और तरीके के विकल्प मौजूद हैं।

*पुरानी छपी हुई है। 

July 12, 2014

बजट में रोड सेफ़्टी के लिए कुछ कहा क्या ????

( जब सड़कों को चौड़ा करने, कॉरीडोर बनाने, इंफ़्रास्ट्रक्चर बेहतर करने पर ज़ोर दिया जा रहा था, लगा कि ये सरकार कुछ ऐसे ऐलान करेगी जो इतने सालों से कांग्रेस ने नहीं किया था, रोड सेफ़्टी के लिए कुछ पैसे निकालेगी, १०० करोड़ वाले २९ प्रोजेक्ट हो ही चुके थे, ३० भी हो सकते थे !! कुछ इशारा तो करते, ज़िक्र तो करते कि जिन सड़क हादसों की वजह से कहा जाता है सालाना सवा लाख लोग मारे जाते हैं, जीडीपी का दो-ढाई फीसदी का नुक़सान करता है, उस पर भी कुछ पॉलिसी टाइप की बात करते, उस बहस में नहीं जा रहा कि महिला सुरक्षा के लिए इतना और पटेल की मूर्ति के लिए इतना...कमसेकम सोच तो दिखा देते ? थोड़े दिन पहले ये कॉलम लिख रहा था तो लग रहा था कि बजट के वक्त कुछ ऐसा सुनाई दे जाए, आख़िर एक मंत्री की मौत हुई थी, किसी आम हिंदुस्तानी की नहीं...तब तो चिंता होनी चाहिए थी ?? ) 


हाल में एक मौत ने फिर से हमारे सामने ये सवाल खड़ा कर दिया है जिसे हम बार बारे उठाने की कोशिश करते हैं लेकिन जवाब नहीं मिल रहा है। वो ये कि कब तक हिंदुस्तानी
सड़कें दुनिया की सबसे ख़ूनी सड़कें बनी रहेंगी। कब तक हम रोड सेफ़्टी को इतने हल्के में लेते रहेंगे, कब तक हिंदुस्तानियों की जान की अहमियत को इतना कम आंकते रहेंगे।
अलग अलग आंकड़ों का औसत भी लें तो देश की सड़कों पर हर साल सवा लाख से ज़्यादा लोग अपनी जान सड़क हादसे में गंवा देते हैं। और अब तक अगर सरकारों का रवैया देखें तो लगेगा कि इन जानों की फ़िक्र सरकार को नाम मात्र की ही है, कागज़ों में, ख़ानापूर्ति में। लेकिन सड़क हादसे में एक मंत्री की मौत के बाद अचानक लग रहा है कि तस्वीर शायद बदले।
अचानक सा लगने लगा है कि इस बार शायद कुछ अलग है, सवा लाख मौत पर जैसा रवैया अब तक सरकारों का देखने को मिलता रहा है,पता नहीं क्यों उम्मीद हो रही है, या कमसेकम ऐसा लग रहा है कि अब चारों ओर से चर्चा शुरू होगी, कोशिशें शुरू होंगी समाधान निकालने की और कुछ ठोस क़दम उठाए जाएंगे। लोगों की जान की क़ीमत समझी जाएगी, ट्रैफ़िक सेफ़्टी नियमों को लागू करने में कड़ाई बरती जाएगी, सड़कों के डिज़ाइन की ख़ामियां दूर की जाएंगी और सेफ़्टी को सबसे बड़ी प्राथमिकता माना जाएगा।
इस उम्मीद की वजह साफ़ है, एक तो इस बार किसी आम आदमी या नेता की हादसे का शिकार नहीं हुआ है। इस बार हादसे में मौत एक मंत्री की भी हुई है। और हादसे की तस्वीर लगभग वैसी ही, जैसी हमें हर रोज़ देखने की आदत है। क्रॉसिंग से गुज़रती दो गाड़ियां, एक की रफ़्तार ज़्यादा, कोई एक लापरवाह और कोई बेपरवाह। नतीजा मौत। इस बार दिल्ली के चौराहे पर ऐसा देखा गया है।
दूसरी वजह है सरकार का नया होना। अभी जिस तरीके से सालों बाद फिर से सरकार में आई एनडीए में जोश दिख रहा है, कई मुद्दों पर सकारात्मक ऐलान सुनने को मिले है, हालांकि कार्रवाई का इंतज़ार है, उसे देखकर लग रहा है कि गोपीनाथ मुंडे के निधन के बाद सरकार कुछ क़दम उठाए, जिससे सड़कें ज़्यादा सुरक्शित हों।
सबसे अहम तो ट्रैफ़िक नियमों का पालन ही है। ये समझते हुए कि सभी हाईवे, सड़कों या चौराहों पर ट्रैफ़िक पुलिस को तैनात करना नामुमकिन है। हर स्पॉट पर पुलिस कर्मी हों तो भी ज़रूरी नहीं कि सभी नियम तोड़ने वाले उनकी नज़र में आ जाएं, या वो सभी को पकड़ पाएं। तो इसका समाधान टेक्नॉलजी ही हो सकती है। जहां सबसे पहले स्पीड कैमरे लगाने की ज़रूरत है। सबसे पहले देश की उन ख़ूनी सड़कों को कैमरे से लैस किया जाना चाहिए, जहां पर रिकॉर्ड के मुताबिक सबसे ज़्यादा सड़क हादसे होते हैं। वहां पर कैमरे से लोगों पर एक अंकुश लगेगा कि वो स्पीड लिमिट को ना तोड़ें, या नियम ना तोड़ें। इससे चप्पे चप्पे पर पुलिसवालों की तैनाती से छुट्टी मिलेगी।
इसके बाद लाइसेंसिग की पूरी प्रक्रिया को फिर से देखने की ज़रूरत है। बिना काबिलियत के ड्राइविंग लाइसेंस देना बंद किया जाना चाहिए, जिसके लिए लाइसेंस से पहले ट्रेनिंग भी अनिवार्य की जा सकती है। इसके अलावा इस इलाक़े में भी टेक्नॉलजी का इस्तेमाल ज़रूरी है। लाइसेंस देने के मापदंड और प्रक्रिया साफ़ सुथरी, सटीक और पारदर्शी होनी चाहिए,जिसका एक एक रिकॉर्ड इंटरनेट पर होना चाहिए। किसे किस गाड़ी के लिए किस आधार पर लाइसेंस मिल रहा है।
सरकार की तरफ़ से एक और कोशिश दिखनी चाहिए। वो है पैदल यात्रियों की सुरक्शा और उन्हें मिल रही तरजीह। ना सिर्फ़ उनके लिए फ़ुटपाथ साफ़ करवाए जाने चाहिए, बल्कि उनके लिए सड़क पार करने के सेफ़ रास्ते बनाए जाने चाहिए।
और साथ में गाड़ियों के ड्राइवरों को याद दिलाया जाए कि पैदल यात्रियों के अधिकार क्या हैं। हादसों की सूरत में लागू होने वाले क़ानून को कड़ा करने की ज़रूरत भी है। ट्रैफ़िक नियमों को तोड़ने की सूरत में ज़्यादा बड़ा चालान भी, क्योंकि असल समाधान लोगों से ही आने वाला है। सड़क पर जान लेने के लिए सरकारें सड़क पर ड्राइव करने नहीं आती हैं। लोग जाते हैं, अपनी गाड़ियों के साथ, लापरवाह, बेपरवाह वो आम लोग जिनके लिए ट्रैफ़िक नियमों की कोई अहमियत नहीं है, या उन नियमों को तोड़ने में फ़ख़्र महसूस करते हैं।
वैसे लिस्ट अभी लंबी है जिनकी उम्मीद मुझे सरकार से है, और इंतज़ार भी।


Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । कुछ दिनों पहले छपी थी।

May 12, 2013

Lifestyle Biking 2013


सुपर 2013
अगर सबकुछ अपनी रफ़्तार से चला और वो लौंच देखने को मिले जिनकी योजना थी तो साल 2013 मोटरसाइकिलों के लिए भी एक ख़ास साल रहेगा। वो भी बड़ी मोटरसाइकिलों के इलाक़े में, वो मोटरसाइकिलें जिन्हें लोग शौक की वजह से ख़रीदते हैं ज़रूरत के लिए नहीं। पिछले दो-तीन सालों में, ख़ास तौर पर हार्ली डेविडसन के भारत आने के बाद हमने भारतीय लाइफ़स्टाइल बाइकिंग में ठोस तब्दीलियां देखी हैं। कंपनी ने लगभग दो साल में दो हज़ार के आसपास मोटरसाइकिलें बेची हैं। और ये संख्या केवल इस कंपनी के बारे में नहीं बता रहा है बल्कि बाज़ार के बारे में भी बता रहा है, ग्राहकों के बारे में भी । वो मोटरसाइकिलें, जिसका सबसे सस्ता मॉडल साढ़े पांच लाख रु के आसपास शुरू होता है, जो सिर्फ़ क्रूज़र बाइक्स बनाती है, उसने क्या ऐसा किया जो सही था। तो इसमें कंपनी की सभी कोशिशों को याद करना पड़ेगा, जिनमें अच्छे प्रोडक्ट, भारतीय बाज़ार के मद्देनज़र सस्ते प्रोडक्ट, आकर्षक पेमेंट स्कीम से लेकर ठोस आफ़्टर सेल्स सर्विस नेटवर्क की कवायद भी थी। इस कंपनी के अभी तक के प्रदर्शन से कुछ चीज़ें साफ़ हुई हैं, बाज़ार थोड़ा ऑर्गनाइज़्ड दिख रहा है। पहले लाखों की मोटरसाइकिलों का बाज़ार बहुत उहापोह में दिखता था। कुछेक पॉकेट्स में और चुनिंदा शहरों में। ये भी साफ़ हुआ है कि अगर भरोसा दिलाया जाए तो हिंदुस्तानी ग्राहक लाखों रुपए मोटरसाइकिल पर ख़र्च करने से नहीं डरेंगे। 2013 के बारे में बात करते हुए इस पुरानी कहानी का ज़िक्र करना इसलिए ज़रूरी था क्योंकि एक बड़ा ब्रांड जो इस साल भारत में अपने प्रोडक्ट ला सकती है, उसके लिए हार्ली का सफ़र एक बड़ी सीख हो सकता है। ये वो कंपनी है जिसने भारत में आने का ऐलान 2012 की शुरूआत में ही कर दिया था। ब्रिटिश मोटरसाइकिल कंपनी ट्रायंफ़। कंपनी ने ना सिर्फ़ ऐलान किया था भारत में एंट्री के बारे में बल्कि मोटरसाइकिलों की फ़ाइनल लिस्ट और उनकी क़ीमतों का ऐलान भी कर दिया। लेकिन 2012 के भीतर लौंच का वायदा पूरा नहीं कर पाई। जो अच्छी शुरूआत नहीं कही जा सकती है। लेकिन उम्मीद यही है कि इस साल भी आ जाए वक्त पर तो ज़्यादा नुकसान नहीं होगा। ये एंट्री मुझे इसलिए भी ख़ास लग रही है क्योंकि ट्रायंफ़ मोटरसाइकिल कंपनी हार्ली से जुदा है। केवल अमेरिकी और ब्रिटिश कंपनी की बात नहीं है। ट्रायंफ़ का पोर्टफ़ोलियो कहीं ज़्यादा विस्तृत है। जहां हार्ली केवल क्रूज़र मोटरसाइकिलें बनाती है वहीं ट्रायंफ़ के पास हर तरीके की मोटरसाइकिलें हैं जो ना सिर्फ़ ग्राहकों को विकल्प देंगी बल्कि ग्राहकों को नए कौंसेप्ट से परिचित भी करवाएगी। यानि अब तक हम हिंदुस्तानी मोटरसाइकिल प्रेमी दो तरीके की बड़ी मोटरसाइकिलों को जानते हैं सुपरबाइक्स और क्रूज़र। लेकिन ट्रायंफ़ ने अपने पत्ते सही खोले तो ग्राहक उसकी टूरिंग मोटरसाइकिलों को पहचान पाएंगे, क्लासिक सिटी स्पोर्ट्स बाइक जान पाएंगे, ऑफ़ रोड मोटरसाइकिलें भी देख पाएंगे। लेकिन उन सबके लिए ग्राहक जाएं इससे पहले कंपनी को अपनी तरफ़ से गंभीरता दिखानी पड़ेगी, ठोस रणनीति और नेटवर्क के साथ । लेकिन सवाल ये है कि क्या कंपनी कर पाएगी ये सब ? जवाब वही जानती है कि कितना आत्मविश्वास है और भारतीय बाइकरों पर विश्वास है। लेकिन केवल एक कंपनी ही साल को ख़ास नहीं बनाएगी भारतीय बाइक बाज़ार को। ये सिर्फ़ एक सिरा है। बाकी प्रोडक्ट और भी हैं। 
जिस सेगमेंट के बढ़ने का इंतज़ार मैं कई सालों से कर रहा था वो अब दिख रहा है। यानि किफ़ायती मोटरसाइकिलों और सुपरबाइक्स के बीच के सेगमेंट में इस साल कई एंट्री हम देख सकते हैं। वैसे इस सेगमेंट में हाल में जो गतिविधियां दिखी हैं वो बता रही हैं कि ये सेगमेंट काफ़ी ज़ोरों से बढ़ रहा है। और इसके अगले चैप्टर इस साल देखेंगे। जैसे हौंडा की तरफ़ से हमने ढाई सौ सीसी की मोटरसाइकिल देखी सीबीआर 250 के तौर पर, फिर 150 सीसी की स्पोर्ट्स बाइक आई। अब इस साल हौंडा की 500 सीसी वाली नई सीबीआर हम देख सकते हैं, जिसे कंपनी ने अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में पेश किया था। वहीं एक सीनियर बाइक आ सकती है केटीएम की तरफ़ से। केटीएम ने अपनी 200 सीसी की ड्यूक को काफ़ी इंतज़ार करवाने के बाद भारत में पेश किया था और अब वो लेकर आ रही है अपनी ड्यूक 390। देखते हैं कि इसकी क़ीमत क्या होती है। वैसे इनके अलावा भी कुछ मोटरसाइकिलों की फेहरिस्त है। और इनकी क़ीमत 4 लाख रु के इर्दगिर्द रह सकती है। 
तो इन सब मोटरसाइकिलों के लौंच की वजह से साल 2013 को शायद वो साल पुकारा जा सकता है जब लाइफ़स्टाइल बाइकिंग भारतीय बाइकर्स के लाइफ़स्टाइल का हिस्सा बने।
Published in jan 2013