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December 25, 2014

Harley Street 750

हार्ली की नई नवेली स्ट्रीट 750 को कुछ वक्‍त पहले चलाई थी। सोचा एक बार फिर से उस राइड को आपके लिए याद करूं। भारत में कंपनी ने इसे लौंच कर दिया है पिछले ऑटो एक्स्पो के वक्त । एक शांत शनिवार की सुबह को राइड के लिए चुना गया था। मोटरसाइकिल चलाने के लिए मौसम बिल्कुल फ़िट । और हम भी अपने राइडिंग गियर के साथ फ़िट हो गए थे। और तैयार थे स्ट्रीट 750 को चलाने के लिए । 
हार्ली डेविडसन की ये मोटरसाइकिल कई मामले में अहम है भारतीय मोटरसाइकिल बाज़ार के लिए भी और ख़ुद कंपनी के लिए भी। पहली बार जहांं कंपनी ने इतना छोटा इंजिन तैयार किया है, (नई स्ट्रीट सीरीज़ में कंपनी ने 500 और 750 सीसी के इंजिन तैयार किए हैं, जिनमें से फ़िलहाल 750 भारत में लौंच हुई ), साथ ही ये एयरकूल्ड इंजिन नहीं लिक्विड कूल्ड हैं। इसके अलावा जो चीज़ नई है इसके लिए वो है, भारत में इसका प्रोडक्शन। जो हार्ली के इतिहास मे ंपहले नहीं हुआ था। ज़ाहिर है भारत में बड़ी बिक्री की उम्मीद कर रही है कंपनी। और इसके लिए कंपनी ने सबसे पहला क़दम तो कंपनी ने काफ़ा ज़ोरदार उठाया है। इस मोटरसाइकिल की क़ीमत के साथ, जो शुरू हो रही है 4 लाख 10 हज़ार से। इसके साथ ये सबसे सस्ती हार्ली मोटरसाइकिल बाइक हो गई है।



तो भारत में बनी इस मोटरसाइकिल को चलाने के लिए हम तैयार थे और लेकर फिर निकल पड़े इसे सड़कों पर। बिल्कुल नई बाइक की पहली राइड। 

स्ट्रीट 750  में लगा है 749 सीसी की लिक्विड कूल्ड इंजिन, जिससे 65 एनएम टॉर्क आता है। आंकड़ों के हिसाब से तो स्ट्रीट 750  के पास अच्छे नंबर हैं, लेकिन क्या ये नंबर सड़क पर वैसे लगते हैं कि नहीं। शुरूआती सवारी में ही लगा कि स्ट्रीट एक ताक़तवर सवारी है। मज़ेदार और दमदार। सुबह सुबह खुली सड़कों पर भागने में इसने कोई कोताही नहीं दिखाई और भरपूर ताक़त के साथ भागी। अगर ख़ाली और सुरक्षित ट्रैक मिले तो फिर 150 की रफ़्तार तक ये बहुत आराम से चली जाती है। किसी स्पोर्ट्स बाइक की तरह नहीं लेकिन तेज़ी और चुस्ती से। यही नहीं इसकी हैं़डलिंग भी काफ़ी अच्छी लगी। तेज़ रफ़्तार में आड़े तिरछे रास्तों पर मुड़ते हुए कभी भी हिचक नहीं लगी। इंप्रेसिव। 
आम तौर पर हार्ली डेविडसन की मोटरसाइकिलें भारी भरकम सी होती हैं जिन्हें धीमी रफ़्तार में चलाना उतना आरामदेह नहीं होता, भारी शहरी ट्रैफ़िक के बीच संभालना थोड़ा मुश्किल होता है, लेकिन स्ट्रीट 750  की बात करें तो ये बाकियों से हल्की हैंडलिंग वाली है, शहरी ट्रैफ़िक में चलते हुए इसे संभालना किसी भी हल्की बाइक के बराबर ही लगा। गाड़ियों के बीच से निकालना मुश्किल नहीं लगा। 
लेकिन हां, बाइक बड़ी मोटरसाइकिलों की तरह ही गर्म होती है, गर्मी के मौसम में इसे चलाना बहुत आरामदेह नहीं होगा लगता है। वहीं इसकी आकार लंबे लोगों जैसे मेरे लिए बहुत आरामदेह नहीं है। बाइक मौजूदा सुपरलो और आयरन जैसे आकार की लगेगी। हां अगर औसत हिंदुस्तानी लंबाई है तो फिर फ़िट होगी आपके लिए। 
तो इस राइड को ख़त्म करके लगा कि हार्ली ने कुछेक छोटी कमियों को छोड़ एक तेज़ तर्रार बढ़िया बाइक बनाई है, अच्छी क़ीमत पर लौंच किया है। एक ज़ोरदार पैकेज जो हार्ली के लिए अच्छी ख़बर है भारत में।

* पहले छपी हुई है।

May 01, 2013

तजुर्बा तो ज़रूरी है....

कुछ साल पहले तक...किसी भी सुपरबाइकर के साथ एक बात तो तय थी कि जब भी कोई उनकी बाइक को कोई छूए को वो तपाक से रोकते थे । कई बार गुस्से से भी। अपनी प्यारी मोटरसाइकिल पर एक उंगली का निशान भी उन्हें पसंद नहीं होता। साथ में ये भी मुद्दा था ही कि कुछ वक्त पहले तक उन मोटरसाइकिलों के पार्ट-पुर्ज़े काफ़ी मुश्किल से मिलते थे। तो चिंता ज़रूरी था। ऐसे में जब मोटरसाइकिल कंपनियां जब सुपरबाइक्स लाईं, और शोरूम पर उन्होंने डू-नॉट-टच का स्टिकर लगाया तो ज़्यादा लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ । लेकिन बात अटपटी ज़रूर थी, जब मैं देखता था कि स्कूली बच्चों का झुंड बाइक शोरूम के बाहर से लाखों रु की उन मोटरसाइकिलों को निहारते थे लेकिन नज़दीक से छू नहीं सकते थे। ये बात मुझे काफ़ी अटपटी लगती थी, ख़ासकर तब जब कंपनियां भारत में इस तरीके की सवारियों का भारत में बाज़ार ही खंगाल रही थीं। यहां पर बिक्री से ज़्यादा ज़रूरी था बाज़ार को बनाना। और मुझे बाद में लगा कि मैं बहुत ग़लत नहीं था। ग्राहक एक्सपीरिएंस की मांग करते हैं।
इसी पहलू पर एक नए लहजे में देखा हार्ले डेविडसन को जब कंपनी ने भारत में अपनी महंगी मोटरसाइकिलों को लौंच किया। कंपनी के शोरूम में बाइकप्रेमियों पर बहुत बंदिशें नहीं थीं । इसके अलावा कंपनी ने अपनी सवारियों को एक्सपीरिएंस करवाने के लिए कई तरीके की कोशिशें की। कंपनी का वैसे भी नाम मज़बूत था लेकिन इन सब कोशिशों के साथ, कंपनी ने आज की तारीख़ में भारत में भी एक मोटरसाइकिल कल्चर को अपने नाम किया है । ये सच्चाई तो है ही कि आने के दो साल में ही कंपनी ने दो हज़ार मोटरसाइकिलें बेच दी थीं, जो बाकी सुपरबाइक या प्रीमियम बाइक की बिक्री से कही ज़्यादा है।  हर वीकेंड पर देश के कई बड़े शहरों में बाइकर्स एक साथ निकलते हैं और बाइकिंग का मज़ा लेते हैं साथ वक्त गुज़ारते हैं।
मोटरसाइकिलों में तो सिर्फ़ इक्का दुक्का ऐसे उदाहरण हैं, कार कंपनियां इस मामले में कहीं आगे जा चुकी हैं। एक वक्त था जब घर पर मार्केटिंग के लिए धूप-अगरबत्ती और वाटर प्यूरिफ़ायर वाले आते थे। अब लाखों करोड़ों की कार कंपनियां शहर शहर घूम रही हैं, अपनी कारों को बेचने के लिए। भारतीय कार बाज़ार की दुर्गति निकली हुई है, ज़्यादातर कार निर्माता हिचकियां ले रहे हैं। कैसे कार बेचें इसकी तरकीबें सोच रहे हैं। कोई एक के साथ एक फ्री दे रहा है और कोई कार्ड स्क्रैच करने के लिए कह रहा है। ऐसे में लग्ज़री कार कंपनियां भी पीछे नहीं रह रही हैं । आज के दौर में इन कंपनियों ख़ासकर जर्मन कार कंपनियों को जिस आक्रामक मूड में देखा जा रहा है वो अब तक नहीं था। पारंपरिक प्रतिद्वंदी मर्सेडीज़, बीएमडब्ल्यू और ऑडी। ये कंपनियां एक दूसरे से रेस में लगी हैं जिसके लिए पूरे भारत में संभावित बाज़ार ढूंढ रही हैं। जहां पर शोरूम है वहां तो है ही, जहां नहीं है वहां भी कार बेचने की कोशिश ज़ोरदार है। सभी कंपनियां किसी ना किसी तरीके से उन सभी शहरों में अपनी कारों को लेकर पहुंच रही हैं जहां पर पैसे वाले ग्राहकों की संख्या बढ़ी मालूम चली है। और एक समय में संभ्रांत और एक्सक्लूसिव ब्रांड उस गुमान में नहीं दिखते जो कुछ साल पहले था। अब वो सभी ग्राहकों को अपने एक एक फ़ीचर को एक्सपीरिएंस कराने की कोशिश कर रही हैं।
जैसे मर्सेडीज़ और ऑडी अपने ग्राहकों के लिए कुछ अलग तरीके की कोशिश कर रही है। कंपनी ने अपनी कारों की ड्राइव और पर्फोर्मेंस की एक एक बारीकी समझाने के लिए ग्राहकों को रेस ट्रैक पर बुलाने लगे हैं। दोनो ही कंपनी ने कुछ हज़ार रु की फ़ीस लेकर अपनी स्पोर्ट्स कारों का तजुर्बा देने के  लिए प्रोग्राम शुरू किया है। जिन शहरों में रेस ट्रैक नहीं वहां पर ख़ास ट्रैक बना कर ।
कुछ कार कंपनी अपनी कारों के साथ छोटे छोटे ड्राइव भी आयोजित करती हैं। जहां पर पुराने ग्राहक अपनी फ़ैमिली के साथ आते हैं। कस्टमर के साथ ख़ास रिश्ता जोड़ने के साथ कंपनी की ब्रांड बिल्डिंग भी हो जाती है। महिंद्रा का ग्रेट एस्केप रैली ऐसी ही कोशिश है, जहां ग्राहक मुश्किल रास्तों पर अपनी एसयूवी दौड़ाते हैं। टाटा मोटर्स ने भी इसी तरह की कोशिश फ़ुल थ्रॉटल के नाम से शुरू कर रही है।
ऐसी कोशिशों के साथ ना सिर्फ़ ग्राहक बेहतर फ़ैसला कर पाते हैं, बल्कि कार कंपनियों के लिए भी फ़ायदे का सौदा होता है  जहां कई ग्राहक प्रभावित होकर कार ख़रीदने का फ़ैसला तुरंत कर लेते हैं। इसके अलावा ग्राहकों की जानकारी बढ़ती है, मोटरिंग का कल्चर बढ़ता है। सभी तरीके से फ़ाएदेमंद ही कहा जाएगा, जो कार कंपनियां ऐसा नहीं कर रही हैं उन्हें तुरंत शुरू करना चाहिए।


February 12, 2013

For Harley Lovers and others


हार्ली की नई फ़ैटबॉब


बार बार बात होती है दो तरीके के भारत की...तो बाज़ार में भी इसकी झलक ज़रूर दिखती है। एक तरफ़ हम गाड़ियों की बिक्री को गिरते हुए देख रहे हैं, तो उसी में से स्पोर्ट्स यूटिलिटी वेह्किल की बिक्री ज़ोरदार बढ़ रही है। एक तरफ़ लोग ज़्यादा से ज़्यादा प्रैक्टिकल और किफ़ायती गाड़ी की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शौकीनों की तादाद भी कम नहीं हो रही है। बढ़ ही रही है। जैसे इस हफ़्ते एक लौंच देखने को मिला दिल्ली में। नामी अमेरिकी क्रूज़र बाइक्स बनाने वाली कंपनी हार्ली डेविडसन लेकर आई है अपनी सबसे लेटेस्ट फ़ैटबॉब। दरअसल ये दो मोटरसाइकिलों का रिमिक्स है। हार्ली डेविडसन अपनी मोटरसाइकिलों को पांच फ़ैमिली में बांटती है। बनावट, फ़ीचर्स और इस्तेमाल के हिसाब से। इन्हीं में से हार्ली के दो मोटरसाइकिल हैं, जो पहले से मौजूद हैं, फ़ैटब्वाय और स्ट्रीट बॉब। इनमें से फ़ैटब्याव के चाहने वाले तो बहुत हैं, जो तब नामी हुआ था जब आर्नौल्ड श्वार्ज़ेनेगर ने सुपरहिट फ़िल्म टर्मिनेटर में चलाया था। भारत में फ़िलहाल इस बाइक की क़ीमत थोड़ी ज़्यादा है। कंपनी ने माना कि ये दोनों बाइक्स काफ़ी पसंद रहे हैं, लेकिन ग्राहक की तरफ़ फ़ीडबैक मिला। तो ऐसे ही कुछ फीडबैक के बाद कंपनी ने इस मोटरसाइकिल को लाने का फ़ैसला किया। फ़ैटब्वाय और स्ट्रीट बॉब को मिलाकर कहानी बनी है फ़ैटबॉब की।
ये मोटरसाइकिल हार्ली की वो छठी बाइक है, जो सीकेडी अवतार में आई है। यानि कंप्लीटली नॉक्ड डॉउन वर्ज़न में। जिसे हार्ली अपने हरियाणा स्थित असेंबली प्लांट में असेंबल करेगी। जिससे कि इस मोटरसाइकिल को ड्यूटी में छूट मिल पाए और इसकी क़ीमत कम रखी जा सके। लेकिन मज़े की बात ये कि इस छूट के बाद क़ीमत क्या हुई है, वो भी जान लीजिए। इसकी एक्स शोरूम क़ीमत है 12 लाख 80 हज़ार रु मात्र। जीहां लंबी कार, या छोटी एसयूवी की क़ीमत में मिल रही है एक हार्ली मोटरसाइकिल।



इसमें लगा है 1600 सीसी का इंजिन। जो ऑल्टो से डबल् साइज़ का है, और इसका टॉर्क 126 एनएम है। यानि बड़ी गाड़ियों से बेहतर टॉर्क वो भी एक दुपहिए में । तो सोचिए कि ताक़त का एहसास कैसा होता होगा । और इसी तजुर्बे को ख़रीदने वालों की संख्या बढ़ रही है। तो फिर से मुद्दा वही आ गया जिससे शुरू किया था। शौकीनों की बढ़ती तादाद। और ये शौक ही जो किसी को इस क़ीमत की बाइक ख़रीदने की सोचे। जो हो भी रहा है। सोचिए कि कैसे हार्ली ने लगभग ढाई साल के वक्त में दो हज़ार बाइक्स बेच दी है। और वो भी तब जब हार्ली मोटरसाइकिल की क़ीमत शुरू ही साढ़े पांच लाख के ऊपर होती है। और ये इसलिए भी बड़ा आंकड़ा है क्योंकि भारत में सुपरबाइक्स या बड़ी इंपोर्टेड मोटरसाइकिलों की बिक्री बहुत कम रही है। जापानी कंपनियों यामाहा, हौंडा, सुज़ुकी से लेकर इटैलियन डुकाटी तब बहुत बड़ी संख्या में बिक्री नहीं देख रहे थे। कुछ समय पहले तक इस सेगमेंट की सालाना बिक्री 500 -1000 बाइक्स की भी नहीं मानी जा रही थी। जिसमें एक वजह ये ज़रूर है कि ज़्यादातर बाइक्स वही थे जो सुपरबाइक्स थे, यानि बहुत ताक़तवर स्पोर्ट्सबाइक्स, जिन्हें संभालना आसान नहीं। लेकिन अगर हार्ली की बिक्री के आंकड़े को देखें तो लग रहा है कि लाखों की मोटरसाइकिलें अब नॉर्म बन चुकी है, ग्राहकों को स्वीकार हो चुकी हैं। अगर काम की सवारी उन्हें मिले तो भारतीय ग्राहक कार की क़ीमत में मोटरसाइकिल ख़रीदने में नहीं झिझक रहे।


*already published