March 10, 2012

Ladies Spl :)



घड़ी, मोबाईल और शैंपू की तरह महिलाओं के लिए ऑटोमोबील बाज़ार में अलग से ख़ास कोशिश नहीं होती। यहां पर प्रोडक्ट कुछ सौ या हज़ार के नहीं होते, लाखों के होते हैं, तो ऐसे में कम ग्राहक ऐसे होते हैं जो जेंडर स्पेसिफिक गाड़ी लें। कंपनियों की तरफ़ से, बहुत कम ऐसी कोशिशें देखने को मिली हैं जो केवल महिला ग्राहकों के लिए हो। ऐसे ही कुछ कार मॉडलों में कंपनियों की ऐसी कोशिशें देखने को मिली थीं। मारुति ने अपनी एस्टिलो में ऐसी ही कोशिश की थी, एक अजीब से रंग फ़्यूज़न पर्पल के साथ। एक तो वो रंग इक्का-दुक्का ही नज़र आता है, ऊपर से पुरूष ड्राइवर ही उसके अंदर दिखे हैं  । एक वक्त में लग्ज़री सेगमेंट में महिला ग्राहकों की बढ़ोत्तरी के रिपोर्ट आए थे लेकिन उसके पीछे भी टैक्स बचाने की कवायद ज़्यादा थी। पति लोग अपना टैक्स बचाने के लिए दूसरी कारों को पत्नियों के नाम पर ख़रीदते थे। कुल मिलाकर विदेशी बाज़ारों के तरह अभी भी भारतीय बाज़ार उस तरीके से बारीक सेगमेंट वाले नहीं हुए हैं, जहां पर महिलाओं के लिए अलग से प्रोडक्ट लाने के बारे में सोचें या फिर रिस्क लें। विदेशों में कई गाड़ियों की पहचान ऐसी है। महिलाओं की एसयूवी, महिलाओं की हैचबैक कार वगैरह। भारत में अभी ऐसा नहीं। कुछ साल पहले जब मैंने ड्राइवर की तरफ़ सन वाइज़र यानि धूप रोकने वाले पट्टे के पीछ जब मिरर लगा देखा तो चौंका था। लेकिन ये साफ़ बता रहा था कि महिलाएं अब पहले से कहीं ज़्यादा गाड़ी ड्राइव कर रही हैं और कंपनियां उनके लिए तैयार हो रही हैं। गाड़ियां अब पहले से ज़्यादा यूनिसेक्स होती जा रही हैं। ऐसे फ़ीचर्स लगाए जा रहे हैं जो महिलाओं के लिए अहमियत रखते हैं। वैसे टू-व्हीलर्स की बात थोड़ी अलग है। एक तरफ़ इन सवारियों ने महिलाओं या कहें ख़ासकर लड़कियों के ऊपर असर डाला है वहीं ये सेगमेंट भी बहुत महिला सेंट्रिक हुआ है। स्कूटी जैसी सवारियों ने महाराष्ट्र से लेकर यूपी तक की कॉलेज जाने वाली लाखों लड़कियों को एक आत्मनिर्भरता का एहसास दिया है। जो इन छोटे ऑटोमैटिक स्कूटरों की बिक्री से भी साफ़ है। इसे एक उभरता हुए सेगमेंट भी माना जा रहा है जहां नए लौंच भी हो रहे हैं जैसे यामाहा जल्द लड़कियों के लिए 'रे' ला रही है। और स्ट्रगल यहां भी है। हीरो की प्लेज़र को काफ़ी जद्दोजहद करनी पड़ी थी, बावजूद इसके कि वो सिर्फ़ महिलाओं को ध्यान में रख कर लाया गया प्रोडक्ट था। उसका टैगलाइन भी ऐसा ही था, व्हाई शुड ब्वायज़ हैव ऑल दि फ़न” । एक ऐसी चुनौती जो महिलाएं पुरुष ड्राइवरों को हमेशा देती हैं, एक ऐसी लड़ाई जो नई नहीं है। ये एक मार्केटिंग मंत्र भी था और एक सामाजिक स्टेटमेंट भी। उस लड़ाई के सिलसिले में जो हो महिला बनाम पुरुष। कौन बेहतर है 
आज की तारीख़ में जब कंधे से कंधा मिला कर चलना घिसा –पिटा मुहावरा हो चुका है, महिलाएं उससे कहीं आगे जा चुकी हैं, ऊपर से मेट्रोपॉलिटिन कल्चर में जब महिलाओं की ज़रा सी आलोचना से मेल शॉवनिस्ट की कैटगरी में जाने का ख़तरा होता है, तो ऐसे में कई बार मैन वर्सेज वूमन की लड़ाई दिलचस्प इलाकों में जाती है। जिनमें से एक अखाड़ा है सड़कें। ऐसी ही एक लड़ाई का प्रोग्राम संस्करण इंटरनेट पर देख रहा था जो मेरे मित्र ने तैयार करके फेसबुक पर लगाई थी। डायलोग की धींगामुश्ती चल रही थी महिला और पुरुष ड्राइवरों के बीच। चूंकि ये सब कॉलेज कैंपस के इंटरव्यू थे तो तेवर नया था, लेकिन दलीलें वही सब पुरानी। स्लो चलाती हैं, हॉर्न बजाने पर रास्ता नहीं देतीं, इनको पार्किंग नहीं आती ...वगैरह वगैरह। और ऐसे में मुझे याद आया वो इंटरव्यू जो मैंने कुछ साल पहले किया था। लेडी ड्राइवरों का ग्रुप था, जो एक महिला कार रैली में हिस्सा लेने जा रही थीं और उनका उत्साह देखने लायक था। जहां तक याद आता है सभी की ये पहली कार रैली थी, तो मोटरस्पोर्ट्स में हिस्सा लेने का एक जोश था। घर का काम छोड़ एक कांपिटिशन में ख़ुद को साबित करने का एक जज़्बा और फिर टीवी इंटरव्यू भी तो उन्हें ये यकीन सा था कि सही रास्ते निकली हैं वो। सवाल-जवाब वही रेडीमेड थे जो शॉर्टकट इंटरव्यू के कटपीस होते हैं- महिला होते हुए भी ...? घर में सपोर्ट कैसा है...? सड़क पर लोगों की प्रतिक्रिया कैसी होती है इत्यादि। बाकी कुछ ज़्यादा याद नहीं सिवाय एक बात के जो उनमें से एक ने कही थी- उनमें से एक अपनी कार में एक बोर्ड लेकर चलती थीं जिस पर बड़े अक्षरों में सॉरी लिखा हुआ था। पता नहीं क्यों सुन कर काफ़ी अजीब सा लगा। पता नहीं चल रहा था कि इस बात पर हंसा जाए या अचरज हो। सीधा रिएक्शन तो हंसने का ही था लेकिन वो सॉरी वाला पट्टा उससे कहीं आगे तक ज़ेहन में रहा। 
हर रोज़ सड़क पर एक से एक ड्राइवर मिलते हैं, एक अधेड़ उम्र के अंकल जिन्होंने ज़िंदगी स्कूटर से शुरू की तो आज अपनी हौंडा सिविक भी वैसे ही चलाते हैं, बिना इंडीकेटर दिए, किसी भी लेन में घुसा कर और अचानक चलती ट्रैफ़िक के बीच ब्रेक लगाकर रास्ता पूछ लेते हैं। वो नौजवान भी मिलते हैं जिनको उनके बाप ने लगता है कि बर्थडे गिफ़्ट के तौर पर कार का हॉर्न लगा कर दिया है और वो कार का ब्रेक लगाते ही हॉर्न बजाने लगते हैं। वो सफ़ेद हरियाणा नंबर की टैक्सियां भी मिलती हैं जो तेज़ रफ़्तार में चलती हैं, बिना इशारे के आपके आगे आ जाती हैं, कभी भी दाएं या बाएं चली जाती है बिना किसी अपराध बोध के। सारी कलाबाज़ियों के बाद इनके ड्राइवर आंखें दिखा के भी जाते हैं। लेकिन इनमें से किसी को आजतक सॉरी बोलते नहीं सुना। ऐसे में सॉरी लिखा हुआ एक पट्टा क्या सच्चाई दिखाता है। 
दरअसल गाड़ियां और ड्राइविंग दो ऐसी चीज़ हैं जिन पर पुरुषों ने शुरूआत से टाइटल सूट कर रखा है, अपना इलाका घोषित कर रखा है और महिलाएं इनमें घुसे ये उन्हें ज़्यादा पसंद आता है। और ये भाव महिलाओं में भी बहुत दिखता है, बहुत सी महिलाएं एक क्षमाप्रार्थी के भाव से सड़कों पर गाड़ी चलाती मिलती हैं। मानो थोड़ी जगह दे दो मैं निकल जाउंगी। और अगर कोई कार ग़लत चलती दिखे सड़क पर तो आमतौर पर पुरुष ड्राइवरों का रिएक्शन होता है (मेरा मतलब मेजोरिटी से है, जेनरलाइज़ेशन नहीं) -कोई मैडम चला रही होंगी। 
ये सब उस देश में जहां पर ज़्यादातक ड्राइवर सर्टीफ़ाइड बुरे ड्राइवर हैं, ना सिर्फ़ सड़कों पर मरने वाले लोगों के हिसाब से, बल्कि ट्रैफ़िक नियमों को तोड़ने के हिसाब से भी, जिस देश में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना उतना ही आसान है जितना डीटीसी की टिकट कटाना है। जहां पर ड्राइविंग के टेस्ट के नाम पर गाड़ी नहीं, कलम चलाई जाती है, इंस्ट्रक्टर की जगह दलाल मिलते हैं, वहां से लाइसेंस लेने वाले हम हिंदुस्तानी पुरूष अगर महिलाओं को बुरा ड्राइवर बताते हैं तो विडंबना वाकई छोटा शब्द लगने लगता है। 
* Already Published

December 06, 2011

स्कूटरनामा



हर बारिश के मौसम में मेरी दोस्ती होती थी विजय से। वो मौसम, जिसमें एशिया की सबसे बड़ी कॉलनी कहे जाने वाले पटना के बहुगर्वित कंकड़बाग कॉलनी का ट्रांसफ़ॉर्मेशन होता था, एशिया की सबसे बड़ी कॉलनी से इंसान के रिहाइश वाली झील मे। और इसी मौसम में अशोक नगर में रहने वाले मेरे चाचाजी विजय को हमारे घर छोड़ जाते थे। सड़क पर जमा पानी में ना चल पाना उसका नखरा नहीं, उसकी मेकैनिकल मजबूरी थी। क्योंकि विजय का पूरा नाम था विजय सुपर। 80 के दशक का स्कूटर। जीहां शुरूआत थोड़ा नाटकीय रखा  है मैंने आज, क्योंकि स्कूटरों की कहानी मुझे थोड़ी नाटकीय लगती है। स्कूटर चल रही है या चल रहा है इस दुविधा में मैंने लगभग एक दशक निकाल दिया है। बिहार प्रदेश का होने की वजह से मुझे शंका तो हमेशा रही हालांकि पुकारा हमेशा पुल्लिंग ही है। लेकिन तीस-चालीस पहले जाएं और पुरानी वेस्पा स्कूटर को देखें तो वो ऑटोमैटिकली ख़ूबसूरत और कमनीय लगेगी, लगेगा नहीं। हालांकि भारत में प्रिया या बजाज सुपर तक तो वो नैन-नक्श बचे थे लेकिन लैंब्रेटा, विजय सुपर और बजाज चेतक ने स्कूटर को पूरा मेल डोमेन में डाल दिया था। एक ट्रांसफ़ोर्मेशन पूरा हुआ।
1972 में भारत सरकार ने लैंब्रेटा की फ़ैक्ट्री और ब्रांड ख़रीद कर जब भारत में स्कूटरों का नया युग शुरू किया था, स्कूटर इंडिया लिमिटेड के नाम से। तब वजह तो एक ही थी, सस्ता ट्रांसपोर्टेशन। जो कार नहीं ख़रीद सकते थे वो स्कूटर ले लें। गरीबी और बुनियादी ढांचे की कमी झेल रहे देश में ऐसी सवारी की तो ज़रूरत थी ही। इसी कंपनी ने विजय सुपर भी बनाया और एक पूरी पीढ़ी को एक जगह से दूसरी जगह पर पहुंचाया। उसी दौरान एक और कंपनी लगी हुई थी ऐसे ही ट्रांसपोर्टेशन में । बजाज जिसकी कहानी शुरू हुई थी वेस्पा स्कूटरों को भारत में बेचने से। और इसी कंपनी ने सबसे लंबे वक्त तक स्कूटर के झंडे को उठाए रखा था भारत में। बजाज चेतक, सुपर, प्रिया, क्लासिक वगैरह। और बजाज को हमारा बजाज बनाने वाला चेतक, जो देश में स्कूटरों का पोस्टरब्वॉय था, उसका सफ़र भी बड़े नाटकीय ढंग से ख़त्म हुआ। बेटे राजीव बजाज ने कहा कि नहीं बनाएंगे अब पिता ने कहा कि हां बनाएंगे। वो कहानी भी ख़त्म हुई।
मुझे वो वक्त तो याद है जब हीरो हौंडा की एंट्री हुई थी। जब सीडी 100 आई थी, जो मुझे येज़डी और बुलेट की भीड़ में अजीब सी सवारी लगती थी। लेकिन उस वक्त नहीं पता था कि यही बाइक कहानी ख़त्म करेगी स्कूटरों की भारत में। हीरो हौंडा ने जिस तरीके से भारत का मोटरसाइकिलीकरण किया, वो आज तक जारी रहा है। लेकिन एक और विडंबना ये है कि जिस हौंडा ने भारत में स्कूटरों को ख़त्म किया, वही उसे वापस लाई भी। जब एलएमएल वेस्पा से लेकर बजाज ने अपने हाथ खड़े कर दिए थे वहीं हौंडा मोटरसाइकिल्स एंड स्कूटर्स ने भारत में स्कूटरों में अपना भविष्य देखा। फ़ोर स्ट्रोक और बिना गियर की ऐक्टिवा आज देश के लगभग सभी शहरों में दिखेगी, और ग्राहक इसके लिए तीन-चार महीने इंतज़ार भी कर रहे हैं। और इसी के साथ शुरू हो चुका है स्कूटर का यू-टर्न।
वैसे स्कूटरों की बात अधूरी रहेगी अगर काइनेटिक हौंडा का ज़िक्र ना हो। यंगस्टर्स के बीच जो पुकारी जाती थी काईनी। बिना गियर की काईनेटिक हौंडा इतनी हिट हुई थी, हालांकि तबके स्कूटरों के मुक़ाबले उसकी हल्की बॉडी का हमेशा मज़ाक होता था। मेरे एक मित्र की फेवरेट कहानी है कि वो और उनके पिताजी, पुरानी लैंब्रेटा से जा रहे थे और सामने से एक काइनेटिक हौंडा आ गई...दोनों की कमर लड़ी, काइनेटिक पलट गई लेकिन लैंब्रेटा मस्त चाल में चलती रही। उसकी चाल में कोई फर्क नहीं आया। लेकिन उस किस्से को अब बहुत दिन हो गया है...

*Published




November 20, 2011

Bajaj Boxer


उलझन तब होती है जब पैमाने बदलने पड़ते हैं। वो पैमाने जो हर हफ़्ते आने वाली कार या मोटरसाइकिलों को परखने के लिए इस्तेमाल होते हैं। कभी ताक़त की बात हो सकती है, तो कभी माइलेज और हैंडलिंग की। लेकिन हाल फ़िलहाल में सवारियों में फ़ीचर्स, पर्फोर्मेंस और रिफ़ाइनमेंट का ऐसा स्टैंडर्ड देखने को मिल रहा है, कि सभी सवारियों को एक ख़ास खाके में रखा जा सकता है, एक ही इंची-टेप से मापा जा सकता है । लेकिन ये बाइक ऐसी है जो आज कल की औसत प्रोडक्ट से बहुत अलग है। स्टाइलिंग पुरानी, फ़ीचर्स की लिस्ट छोटी और बनावट बहुत मोटी। बजाज की नई बॉक्सर। जो आई है पांच छह साल पुराने डिज़ाइन वाले हेडलैंप, चौड़ी सीटिंग, काम के बहुत थोड़े फ़ीचर्स के साथ । सीट के पीछे कैरियर । इसे देखकर एक सेकेंड के लिए राजदूत की याद आ गई । इसे लेकर सबसे बड़ा सरप्राइज़ तो यही है कि बजाज जो डेढ़ सौ सीसी के इलाक़े में पल्सर जैसी ट्रेंडी बाइक बनाती है वो ऐसी बाइक क्यों लेकर आई ?
.हर कंपनी के पास कुछ ऐसे प्रोडक्ट होते हैं दो फ़्लैगशिप प्रोडक्ट होते हैं। यानि ग्लैमरस, ख़ूबसूरत और नामी प्रोडक्ट जिसके बारे में चर्चा होती है और कंपनी का नाम होता है। वहीं कुछ ऐसी सवारियां होती हैं जो कंपनी की बिक्री के लिए बहुत ज़रूरी होती है , जो भले ही ग्लैमरस ना हों । और भले ही एक्सीड जैसी कोशिश फ़्लॉप रहे हैं लेकिन राजीव बजाज की ख़ूबी रही है कि वो आमतौर पर कुछ ना कुछ नया सोचते रहते हैं। और इसी सोच का नतीजा लग रही है बॉक्सर । 
इस बाइक को लेकर सभी बहस एक प्वाइंट पर आकर रुक से जाते हैं। वो प्वाइंट है इसकी क़ीमत। बजाज बॉक्सर जो डेढ़ सौ सीसी की एक बाइक है , उसकी क़ीमत है 42 हज़ार रु। दरअसल इसे देखने के लिए नज़र भी अलग चाहिए और यही क़ीमत इस बाइक को देखने के नज़रिए को बदल देती है।  


150 सीसी बाइक, जिसकी ताक़त लगभग 12 बीएचपी की और टॉर्क भी लगभग इतना ही। फ़िलहाल माइलेज का दावा है कि वो 55 से 60 किमी प्रतिलीटर है। इसकी राइड के बारे में, पर्फोर्मेंस के बारे में बहुत कुछ कहने के लिए नहीं, क्योंकि आमतौर पर बजाज की डेढ़ सौ सीसी पल्सर वाली तेज़ी या पकड़ नहीं दिखेगी, ठोस राइड है। 
कंपनी ने बॉक्सर के लिए कई विशेषण रखे हैं, जैसे दो पहियों पर एसयूवी और असल 'भारत बाइक' । इन सबका मतलब यही है कि इस मोटरसाइकिल का बाज़ार हैं उन जगहों पर जहां पर आम सड़क हैं टूटी-फूटी। उन ग्राहकों के बीच, जो मोटरसाइकिल का इस्तेमाल कॉलेज-ऑफिस के लिए ना करके, अपने काम के लिए करते हैं, यानि सामान लाने-ले जाने के लिए । और 42 हज़ार रू की क़ीमत बहुत ही आकर्षक कही जाएगी, इस बाज़ार और उस ग्राहक के लिए। जिस ग्राहक को बस काम से काम है, लाइफ़स्टाइल बाइकिंग से उसका कोई वास्ता नहीं है। 
हालांकि कुछ सालों पहले इस तरह की बाइक शहरों में दिखती थीं, लेकिन अब हर सेगमेंट के ग्राहक, यहां तक की सौ सीसी के ग्राहक भी थोड़े बहुत स्टाइल की उम्मीद करते हैं कंपनी से। तो ऐसे में बॉक्सर का लुक वाकई काफ़ी बेसिक है। क़ीमत को कम रखना वाकई बड़ी चुनौती है लेकिन अगर स्टाइल के मामले में ये थोड़ी और आकर्षक होती तो हो सकता है कि डेढ़ सौ सीसी की बॉक्सर आते ही सौ सीसी मोटरसाइकिलों का भी पसीना छुड़ा देती ।

November 08, 2011

फ़ॉर्मूला पर फ़साद ...WHY ???



फ़ॉर्मूला वन रेस को जब सामने से देखें तो सबसे पहले जिस चीज़ को आप महसूस करेंगे, जो आमतौर पर लोगों के रौंगटे खड़े कर देती है, वो है उन कारों की आवाज़। और कुछ चक्कर (जिसे एफ 1 की भाषा में लैप कहते हैं) के बाद जब आवाज़ की थोड़ी आदत हो जाए तो फिर नज़र जाती है उन बाईस कारों पर, जो एक जैसी, लेकिन बहुत तेज़ रफ़्तार में रेसट्रैक का चक्कर काटती भागती रहती हैं। अगर आप इस रेस को सिर्फ़ एक अजूबे की तरह देखने गए हैं तो फिर ये वो बिंदु होता है जिसके बाद से आपकी दिलचस्पी कम होने लगती है। आप इस रेस के पैटर्न को समझ कर, तेज़ आवाज़ की वजह से सरदर्द के साथ रेसट्रैक से बाहर जा सकते हैं। लेकिन अगर आप गए हैं, इस ईवेंट को एक नए खेल की तरह देखने के लिए। ये समझने के लिए कि आख़िर क्यों ये खेल दुनिया भर में सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले खेलों में टॉप पर है... क्या है ऐसा जो इसे सबसे महंगा बनाता है और क्या इसकी अहमियत है, तो कुछ बातें सामने आती हैं। जिनमें पश्चिमी संस्कृति के दो ख़ास पहलू भी हैं। एक तो है कांपिटिशन और दूसरा अनुशासन। कांपिटिशन ये कि कौन कितनी तेज़ कार बना सकता है और कौन इसे सबसे तेज़ भगा सकता है। लेकिन जो हिस्सा अजूबा लगता है वो है अनुशासन। वो अनुशासन जो कारों को तेज़, ड्राइवरों को संयमित और रेस को सुरक्षित बनाता है। कार, हेलमेट, रेसिंग के लिए कपड़े, टायर, कार की बॉडी और बेहद कड़े नियम, इन सबको तैयार करने के पीछे सिर्फ़ एक मक़सद कि कैसे इस रेस को ज़्यादा से ज़्यादा सुरक्षित बनाया जाए। मुझे ये उम्मीद थी कि इसी पहलू पर शायद लोगों की नज़र जाए, ट्रैक के अनुशासन का थोड़ा असर आम भारतीय सड़कों पर दुहराने की बात की जाए। भारत में इस रेस का आना, साफ़ है कि बढ़ते मार्केट और बिज़नेस की गुंजाईश की वजह से ही हुआ है, लेकिन है ये एक बड़ी विडंबना। सोचिए एक खेल, जिससे जुड़े हज़ारों लोग साल भर दो ही चीज़ों के बारे में सोचते हैं कि कैसे इन कारों को ज़्यादा से ज़्यादा तेज़ और सुरक्षित बनाया जाए, यही वजह कि कि 360 किमी की रफ़्तार में चलने वाली कारों के साथ भी पिछले 27 सालों से किसी की जान नहीं गई है, वो उस देश में आता है जहां पर दुनिया में सबसे ज़्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं। एक लाख बीस हज़ार मौत सालाना। जिसकी चर्चा नहीं होती है, सरकारी मंत्रालयों, मीडिया या फिर ऑटोमोबील कंपनियों के द्वारा। ना तो सरकार लाइसेंस देने में कड़ाई की बात करती है, लाइसेंस जारी करने वाले आफ़िसों को दलालों से मुक्त कराती है और ना ही पैसे देकर लाइसेंस बनाने के ऊपर मीडिया का कोई स्टिंग ऑपरेशन होता है। क्योंकि ये किसी के लिए मुद्दा नहीं है। हालत ये है कि पिछले हफ़्ते मुंबई में एक शख़्स को लापरवाही से स्कूटर चलाने के आरोप में बंद कर दिया पुलिस ने, वो भी तब जब सड़क हादसे में उसकी मां की मृत्यु हो गई । दरअसल वो अपनी मां के साथ जा रहा था, सड़क के बीचोबीच गड्ढे की वजह से स्कूटर गिर गया, और मां की मौत हो गई। लेकिन इन सबके उलट बहस की अलग ही दिशा दिखी। तमाम तर्क सुनने को मिल रहे हैं इस खेल के ख़िलाफ़।

कुछ दिनों पहले तक फेसबुक पर कई ऐसे संदेश आ रहे थे आख़िर क्यों हो रहा है फ़ॉर्मूला वन भारत में और इससे किसका भला होगा। ग़रीबों का क्या भला होगा और किसानों का क्या भला होगा ? चूंकि ये सोच केवल कुछ आम हिंदुस्तानियों की नहीं थी। अचानक कई बौद्धिक भी इस खेल की आलोचना में उतर गए। बिना ये सोचे कि अगर एफ़-1 ग़रीबों और किसानों का भला करने लगेगा तो वो क्या करेंगे जिन्हें इस काम के लिए सरकार पैसे देती है। वो शायद भूल गए कि ये फ़ॉर्मूला वन, यूनाइटेड नेशन का उपक्रम नहीं है। कई क्रिकेट प्रेमियों को बर्नी एक्लेस्टन की वो बात बड़ी नागवार गुज़री कि भारत में एफ1 एक दिन क्रिकेट के बराबर लोकप्रिय हो जाएगा। वो लगे एफ 1 के मुखिया के बयान की धुलाई करने। सवाल तो ये भी उठता है कि आख़िर आईपीएल से कितने लोगों को रोज़गार मिलता है, क्रिकेट से कितने ग़रीबों का भला होता है। आईपीएल में तो शुरू में कुछ प्रतिभाशाली बालाओं की जगह भी थी, लेकिन अब तो वहां भी सभी विदेशी प्रतिभाएं नाचती दिखती हैं।
पता नहीं चल रहा है कि विरोध हो रहा है तो क्यों हो रहा है आख़िर भारत की किस परंपरा को ये चोट पहुंचा रहा है और किन मूल्यों का ह्रास हो रहा है इस खेल से जो सिर्फ़ एक खेल नहीं बल्कि ऑटोमोबील टेक्नॉलजी की एक तरह से प्रयोगशाला भी है। यहां से निकलने वाली टेक्नॉलजी कमसेकम आने वाले समय में आम गाड़ियों में तो अपनाई जाती है। इस रेस केआयोजन में देश की इज़्ज़त दांव पर नहीं लगी थी, कमसेकम वैसे नहीं जैसे कॉमनवेल्थ या वर्ल्ड कप क्रिकेट पर थी, इसीलिए जब इसका सफल आयोजन हो भी गया तो उसका रिश्ता देश के गौरव से नहीं जोड़ा गया, बल्कि मोटरस्पोर्ट्स के लिए बढ़ते फैन्स की संख्या और प्राइवेट कंपनियों के प्रबंधन की कुशलता से जोड़ा गया। इस पर कोई दो राय नहीं कि ये बाज़ार है, रेस एक व्यापार है। लेकिन ये भी समझने वाली बात है कि स्पांसर भी उसी पर पैसे लगाते हैं जिसमें गुंजाईश होती है। खेल और बाज़ार के नाम पर तो और भी दुकान चल ही रही है, इसे भी चलने दीजिए। इससे कुछ सीखने को तो मिल रहा है। 

November 02, 2011

नंबर 1 फ़ॉर्मूला


(24-10 को लिखी रिपोर्ट)

खेल कभी खेल नहीं रह जाते हैं जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हों। कभी महायुद्ध बन जाता है, जैसा कुछ साल पहले तक होता था जब भारत-पाकिस्तान आमने सामने होते थे। या फिर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नामी-बदनामी के लिए अहम ब्रांडिंग बन जाता है, जैसे पिछले साल हुए कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान हुआ था। और ऐसी ही कुछ कहानी है फ़ॉर्मूला वन की भी। जो मोटरस्पोर्ट्स के एक ईवेंट से कहीं ज़्यादा है, कहीं बड़ा बन चुका है। रफ़्तार, इंजीनियरिंग और टेक्नॉलजी से बढ़कर ये मार्केटिंग, ब्रांडिंग, नेटवर्किंग से लेकर ग्लैमर और लाइफ़स्टाइल का ईवेंट बन चुका है। और ऐसे ही रफ़्तार के महाकुंभ का भारत एडिशन भी बन चुका है। इंडियन ग्रां-प्री। भारत का पहला फ़ॉर्मूला वन रेस।

आमतौर पर जैसा हमने देखा है वैसा ही इस रेस के साथ भी हुआ है भारत में। शुरूआत से ही कई विवाद रहे, उहापोह रहा और जब तक कि बुद्धा इंटरनैशनल सर्किट का उद्घाटन नहीं हो गया, डर यही था कि कॉमनवेल्थ वाली किरकिरी ना हो जाए, एफ1 के साथ भी। इसके अलावा ग्रेटर नौएडा के किसानों का आंदोलन, ज़मीन अधिग्रहण को लेकर होने वाली मारामारी के बीच आशंका ये भी रही कि ये रेसट्रैक भी उस खींचतान के बीच आएगा। लेकिन अभी तक आयोजक ये भरोसा ज़रूर दिला रहे हैं कि उस विवाद का रेसट्रैक की ज़मीन से कोई लेना देना नहीं है।

ख़ैर मोटरस्पोर्ट्स प्रेमियों  के लिए तात्कालिक राहत की बात ये है कि रेसट्रैक तैयार है। दुनिया भर के चुनिंदा रेस ड्राइवरों के लिए तैयार है बुद्धा इंटरनैशनल रेस सर्किट...जहां पर भागने वाली हैं दुनिया की सबसे दमदार फ़ॉर्मूला वन कारें। जहां पर एक एक मोड़ पर होंगी सबकी नज़रें और कई किलोमीटर दूर तक सुनी जाएगी आवाज़ें , उन रेसिंग कारों की जो सबसे प्रतिष्ठित, सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले खेल का हिस्सा हैं। 30 अक्टूबर 2011 है वो तारीख़ जब दुनिया के सबसे तेज़ तर्रार 24 ड्राइवर पहली बार होंगे इकट्ठा दिल्ली से सटे ग्रेटर नौएडा में और सभी रेस करेंगे एक दूसरे से। 5 हज़ार मज़दूर, 300 इंजीनियर और चौबीसों घंटे चले काम ने तैयार किया है ये रेस सर्किट जो 350 हेक्टेयर में फैला है। और इन सबके लिए ख़र्च हुए हैं 2 हज़ार करोड़ रु। और इस रेस के लिए लगभग 6 हज़ार टन सामान आएगा।

5.14 किमी लंबे रेसट्रैक में कई ऐसे स्ट्रेच दिए गए हैं जहां पर ओवरटेकिंग करने की गुंजाइश है। वहीं इस सर्किट की एक ख़ासियत है इसका स्ट्रेट, जहां पर टॉप स्पीड जाएगी 318 किमी प्रतिघंटे की।
14 मीटर का एलिवेशन यानि चढ़ाई ...जो दुनिया में शायद ही कहीं और है। कई रेसर जिनमें भारत के पहले एफ़ 1 रेसर नरैन कार्तिकेयन शामिल हैं उनके मुताबिक बुद्धा इंटरनैशनल सर्किट दुनिया के बेहतरीन ट्रैक में से एक होगा। भारत जैसे देश में फ़ॉर्मूला वन रेस की ज़रूरत को लेकर तमाम चर्चाएं चल रही हैं, जिसके पक्ष औऱ विपक्ष में हज़ारों दलीलें हवा में लहरा रही हैं, किसानों की ज़मीन पर क़ब्ज़े को लेकर शक जताया जा रहा है, जिसमें मैं पार्टी नहीं हूं, मैंने ना तो इन पहलुओं पर ठीक से पढ़ाई की है और ना किसानों से जाकर बात की है। मुझे सिर्फ़ एक चीज़ फिलहाल नज़र आ रही है और वो है एफ़ 1 देखने का मौक़ा। अपने तमाम हाइप, ग्लैमर और मार्केटिंग के बीच एफ-1 के बीचोबीच एक ऐसी दुनिया है, जो सिर्फ़ रफ़्तार और रोमांच की है, जो ऐसी तेज़ी से चलती है कि सबकुछ पीछ छूट जाता है। और वो ऐसी आवाज़ निकालती जाती हैं जो जो ज़िंदगी भर के लिए दिमाग़ के मेमोरी कार्ड में छप जाता है।
www.ndtv.com/kranti
*Published last week