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November 05, 2012

Diavel या डेविल कहें ...


दिल्ली में मॉनसून की फ़िल्मी हीरो की तरह यादाश्त चली गई थी, जो अचानक तभी लौटी जब मुझे एक दमदार मोटरसाइकिल चलाने का बहुत दिनों के बाद मौक़ा मिल रहा था। और खटका लगा हुआ था कि कहीं बारिश तो नहीं हो जाएगी। तो सुबह पांच बजे से बादल के ऊपर टकटकी लगाए बैठा था। और फिर लगा कि चांस ले लिया जाए, इटैलियन डुकाटी की एक ऐसी मोटरसाइकिल के लिए जो मैंने आजतक नहीं चलाई थी। ऐसा नहीं कि बारिश में चला नहीं सकता था, लेकिन इस मोटरसाइकिल के लिए रिस्क लेना थोड़ा ज़्यादा हो जाता है। वो इसलिए क्योंकि इस मोटरसाइकिल की क़ीमत है मात्र पच्चीस लाख रु। इसका नाम है डियावेल, जिसमें वही दो पहिए और एक इंजिन लगा है, लेकिन क़ीमत इतनी कि लग्ज़री कारें भी फ़ेल हो जाएं। और जब क़ीमत के बारे में पता चल जाता है तो नज़रिया बदलना तो लाज़िमी है। ख़ैर, बादल के भरोसे पर निकला मैं इस मोटरसाइकिल को लेकर खुली सड़क पर।



दमखम के बारे में क्या बताऊं, सिर्फ़ ये कह सकता हूं कि काफ़ी है। 162 हॉर्सपावर की ताक़त आ रही है 1200 सीसी के इंजिन से। तुलना आप कर सकते हैं स्विफ़्ट के साथ। स्विफ़्ट में भी 1200 सीसी का इंजिन लगा है और उससे दुगनी ताक़त देने वाली और पांच गुना हल्की मोटरसाइकिल को चलाने का क्या रोमांच हो सकता है, इसका अंदाज़ा आप लगा सकते हैं। अगर नहीं तो बताने की कोशिश करता हूं। ऐक्सिलिरेटर को घुमाते ही ये मोटरसाइकिल हवा से बातें करने लगेगी, इतनी तेज़ आगे जाएगी कि लगेगा कि अगला पहिए अब अपनेआप हवा में उठने वाला है, अचानक बढ़ी रफ़्तार आपको मोटरसाइकिल से पीछे धकेल रही है और आमतौर पर जितने वक्त में हमें जो दूरी तय करने की आदत होती है उससे कहीं आगे हम कहीं जल्दी पहुंच जाते हैं। ये वो रफ़्तार होती है जिस पर चलने की हमें क्या किसी को भी आदत नहीं होती है, और अगर इस जोश में होश खो बैठे तो अनर्थ हो जाता है, और संभले रहे तो रोमांच का अलग एहसास होता है, कुछ वक्त के लिए दीन-दुनिया को आप भूल जाते हैं। एक पैरलल दुनिया होती है ये। लेकिन केवल डियावेल में ये ख़ूबी नहीं होती है, कई अच्छी सुपरबाइक्स आपको ये एहसास दिलाती हैं। तो फिर ऐसे में क्यों ऐसा है कि डियावेल की क़ीमत 25 लाख रु है।
सबसे पहले ये बता दूं कि इस मोटरसाइकिल के कई वेरिएंट हैं, जिनकी शुरूआत बीस लाख रु से शुरू होती है। जिस वेरिएंट को मैं चला रहा था वो डियावेल कार्बन कहलाती है, जिसमें कार्बन फ़ाइबर का काफ़ी इस्तेमाल है, वो 25 लाख रु की है। वो भी एक्स शो रूम क़ीमत। फ़ीचर्स कई सारे ऐसे हैं जिनके बारे में जानकर अचरज होगा। जैसे राइडिंग मोड, यानि अलग अलग तरह की राइड के लिए अलग मोड। सिर्फ़ एक बटन दबाइए और बाइक में लगा कंप्यूटर इंजिन से निकलने वाली ताक़त को कम या ज़्यादा कर देगा, 163 हॉर्सपावर को घटा कर 100 हॉर्सपावर कर देगा, या इसका उल्टा भी। हैंडलिंग को सख़्त या मुलायम कर देगा। शहरी माहौल के लिए अलग मोड, हाईवे के लिए अलग और तेज़ रफ़्तार सुपरबाइकिंग के लिए अलग। टंकी पर लगा छोटा सा डिस्प्ले वो सब जानकारी देगा जो कई महंगी कारें नहीं देती हैं। यहां तक की टायर में हवा का प्रेशर है कि नहीं। लगता है कि दो पहिए पर चलता फिरता ये कंप्यूटर ही है। लेकिन इन सब फ़ीचर्स के बावजूद भी मन में सवाल ज़रूर उठेगा कि इतनी ज़्यादा क़ीमत क्यों है... तो फिर याद कीजिए...इंपोर्ट करने पर इन गाड़ियों की क़ीमत कस्टम की वजह से दुगनी हो जाती है। तब जाकर इसकी क़ीमत का गणित सुलझता है।
बावजूद इस क़ीमत के ये मोटरसाइकिल भारत में बिकती है। साल में 30-40 का आंकड़ा है। जीहां भारत में ये मोटरसाइकिल भी बिक रही है।
((पुराना लिखा है, फ़ोटो देख रहा था बाइक की तो याद आई इसकी ))
www.twitter.com/krantindtv

July 31, 2012

।।। युगे-युगे ।।।

तो बहुत दिनों के बाद मौक़ा लगा मुझे सौ सीसी की बाइक चलाने का। आमतौर पर सुपरबाइक के ग्लैमर और रोमांच में हम करीने से इन मोटरसाइकिलों को अपनी सोच के कोने में रख देते हैं। ऐसी बात नहीं कि ये नहीं मालूम हो कि भारतीय मोटरसाइकिल बाज़ार के ब्रेड एंड बटर यही कहे जाते हैं। पता है। लेकिन फिर भी ये लिस्ट में निचले स्थानों पर रहते हैं। जिसके पीछे एक ख़ास वजह है इन मोटरसाइकिलों का नयापन या कहूं कि नएपन की कमी। दरअसल इस सेगमेंट में सालों से एक ही कंपनी ने क़ब्ज़ा कर रखा है ( हम हीरो के अलावा और किसकी बात कर सकते हैं) और वो भी अपने सालों पुराने प्रोडक्ट के साथ। हो भी क्यों ना, ग्राहकों को कोई परेशानी नहीं है तो फिर उनमें बदलाव क्या करना। और इसी वजह से हम हर साल हीरो की बाइक्स के नए ग्राफ़िक्स के साथ नए वर्ज़न देखते हैं जो मेकैनिकली लगभग वैसी ही होती है जो पिछले साल थी। तो ऐसे कम बदलावों के साथ नई सौ सीसी या एंट्री मोटरसाइकिलों को चलाने का बहाना नहीं मिल पाता। वैसे हाल फ़िलहाल में बजाज ने इस सेगमेंट में थोड़ी पकड़ बनाई अपनी डिस्कवर 100 के साथ। इस सेगमेंट को देखें तो समझ में आ जाएगा कि देसी ग्राहकों को क्या चाहिए। वो है बहुत ही सिंपल किफ़ायत और भरोसा। और इसी वादे के साथ एक नई एंट्री हुई है एंट्री सेगमेंट में। ये है हौंडा नई ड्रीम युगा। जो दरअसल 100 सीसी नहीं बल्कि 110 सीसी की है लेकिन हां बात तो मैं उसी एंट्री सेगमेंट का कर रहा हूं। एक तो बिल्कुल नई सवारी ऊपर से हौंडा के लिए इतनी अहम क्योंकि कंपनी अब भारत में हीरो को पछाड़ कर नंबर एक बनना चाहती है। इसीलिए एक सस्ती, किफ़ायती और ठोस मोटरसाइकिल लाने का प्लान बनाया हौंडा ने। जिसमें बहुत हद तक सफल भी हुई है। सेगमेंट के हिसाब से सस्ती ही कही जाएगी जहां पर साढ़े 44 से साढ़े 46 हज़ार में मौजूद है नई युगा।
इसके अलावा इस मोटरसाइकिल के 110 सीसी के इंजिन से कंपनी का दावा है कि माइलेज भी 72 किमी प्रतिलीटर का आएगा। ख़ैर चलाने पर मुझे ये अच्छी सवारी लगी। वो जिसका संतुलन भी ठीक था और इंजिन भी इसका सुलझा-स्मूद था। हालांकि किसी सुपरबाइक की तरह मैं नहीं बात कर रहा हूं, लेकिन इस सेगमेंट की मोटरसाइकिलों से जैसी उम्मीद की जाती है, उसमें ये खरी उतरी मेरे हिसाब से । हैंडलिंग भी मुझे संतुलित लगी, जो आड़े-तिरझे रास्तों पर आराम से भाग रही थी। कंपनी का ध्यान इसे ठोस बनाने में भी लगा था, जिससे की कस्बाई इलाक़ों में अगर इस पर सामान भी लाद कर ले जाते हैं तो कमज़ोर ना पड़े। हां ये बात अलग है कि देखने में हो सकता है पहली नज़र में थोड़े पुराने-डिज़ाइन की लगे, बोरिंग लगे। मेरे हिसाब ने इसे स्टाइल देने और डिज़ाइन करने में कुछ ज़्यादा ही सादगी और गंभीरता से काम लिया है, क्योंकि भले ही इस सेगमेंट में लोगों को पैसा वसूल सवारी की दरकार होती है, लेकिन यहां भी थोड़े बहुत स्टाइल की मांग तो हो ही गई है। ख़ैर इसका लुक हो सकता है बेमानी हो जाए अगर लंबे वक्त तक ग्राहकों को ड्रीमयुगा तसल्ली दे। कंपनी को बस करना है कि इस मोटरसाइकिल के साथ भी वैसी ही मानसिक शांति का इंतज़ाम कर दे ग्राहकों के लिए जो हीरो की ख़ूबी रही है। जिसके लिए सस्ते रखरखाव के साथ साथ देश के कोने कोने में नेटवर्क और अच्छी आफ़्टर सेल्स सर्विस ज़रूरी है

December 06, 2011

स्कूटरनामा



हर बारिश के मौसम में मेरी दोस्ती होती थी विजय से। वो मौसम, जिसमें एशिया की सबसे बड़ी कॉलनी कहे जाने वाले पटना के बहुगर्वित कंकड़बाग कॉलनी का ट्रांसफ़ॉर्मेशन होता था, एशिया की सबसे बड़ी कॉलनी से इंसान के रिहाइश वाली झील मे। और इसी मौसम में अशोक नगर में रहने वाले मेरे चाचाजी विजय को हमारे घर छोड़ जाते थे। सड़क पर जमा पानी में ना चल पाना उसका नखरा नहीं, उसकी मेकैनिकल मजबूरी थी। क्योंकि विजय का पूरा नाम था विजय सुपर। 80 के दशक का स्कूटर। जीहां शुरूआत थोड़ा नाटकीय रखा  है मैंने आज, क्योंकि स्कूटरों की कहानी मुझे थोड़ी नाटकीय लगती है। स्कूटर चल रही है या चल रहा है इस दुविधा में मैंने लगभग एक दशक निकाल दिया है। बिहार प्रदेश का होने की वजह से मुझे शंका तो हमेशा रही हालांकि पुकारा हमेशा पुल्लिंग ही है। लेकिन तीस-चालीस पहले जाएं और पुरानी वेस्पा स्कूटर को देखें तो वो ऑटोमैटिकली ख़ूबसूरत और कमनीय लगेगी, लगेगा नहीं। हालांकि भारत में प्रिया या बजाज सुपर तक तो वो नैन-नक्श बचे थे लेकिन लैंब्रेटा, विजय सुपर और बजाज चेतक ने स्कूटर को पूरा मेल डोमेन में डाल दिया था। एक ट्रांसफ़ोर्मेशन पूरा हुआ।
1972 में भारत सरकार ने लैंब्रेटा की फ़ैक्ट्री और ब्रांड ख़रीद कर जब भारत में स्कूटरों का नया युग शुरू किया था, स्कूटर इंडिया लिमिटेड के नाम से। तब वजह तो एक ही थी, सस्ता ट्रांसपोर्टेशन। जो कार नहीं ख़रीद सकते थे वो स्कूटर ले लें। गरीबी और बुनियादी ढांचे की कमी झेल रहे देश में ऐसी सवारी की तो ज़रूरत थी ही। इसी कंपनी ने विजय सुपर भी बनाया और एक पूरी पीढ़ी को एक जगह से दूसरी जगह पर पहुंचाया। उसी दौरान एक और कंपनी लगी हुई थी ऐसे ही ट्रांसपोर्टेशन में । बजाज जिसकी कहानी शुरू हुई थी वेस्पा स्कूटरों को भारत में बेचने से। और इसी कंपनी ने सबसे लंबे वक्त तक स्कूटर के झंडे को उठाए रखा था भारत में। बजाज चेतक, सुपर, प्रिया, क्लासिक वगैरह। और बजाज को हमारा बजाज बनाने वाला चेतक, जो देश में स्कूटरों का पोस्टरब्वॉय था, उसका सफ़र भी बड़े नाटकीय ढंग से ख़त्म हुआ। बेटे राजीव बजाज ने कहा कि नहीं बनाएंगे अब पिता ने कहा कि हां बनाएंगे। वो कहानी भी ख़त्म हुई।
मुझे वो वक्त तो याद है जब हीरो हौंडा की एंट्री हुई थी। जब सीडी 100 आई थी, जो मुझे येज़डी और बुलेट की भीड़ में अजीब सी सवारी लगती थी। लेकिन उस वक्त नहीं पता था कि यही बाइक कहानी ख़त्म करेगी स्कूटरों की भारत में। हीरो हौंडा ने जिस तरीके से भारत का मोटरसाइकिलीकरण किया, वो आज तक जारी रहा है। लेकिन एक और विडंबना ये है कि जिस हौंडा ने भारत में स्कूटरों को ख़त्म किया, वही उसे वापस लाई भी। जब एलएमएल वेस्पा से लेकर बजाज ने अपने हाथ खड़े कर दिए थे वहीं हौंडा मोटरसाइकिल्स एंड स्कूटर्स ने भारत में स्कूटरों में अपना भविष्य देखा। फ़ोर स्ट्रोक और बिना गियर की ऐक्टिवा आज देश के लगभग सभी शहरों में दिखेगी, और ग्राहक इसके लिए तीन-चार महीने इंतज़ार भी कर रहे हैं। और इसी के साथ शुरू हो चुका है स्कूटर का यू-टर्न।
वैसे स्कूटरों की बात अधूरी रहेगी अगर काइनेटिक हौंडा का ज़िक्र ना हो। यंगस्टर्स के बीच जो पुकारी जाती थी काईनी। बिना गियर की काईनेटिक हौंडा इतनी हिट हुई थी, हालांकि तबके स्कूटरों के मुक़ाबले उसकी हल्की बॉडी का हमेशा मज़ाक होता था। मेरे एक मित्र की फेवरेट कहानी है कि वो और उनके पिताजी, पुरानी लैंब्रेटा से जा रहे थे और सामने से एक काइनेटिक हौंडा आ गई...दोनों की कमर लड़ी, काइनेटिक पलट गई लेकिन लैंब्रेटा मस्त चाल में चलती रही। उसकी चाल में कोई फर्क नहीं आया। लेकिन उस किस्से को अब बहुत दिन हो गया है...

*Published




November 20, 2011

Bajaj Boxer


उलझन तब होती है जब पैमाने बदलने पड़ते हैं। वो पैमाने जो हर हफ़्ते आने वाली कार या मोटरसाइकिलों को परखने के लिए इस्तेमाल होते हैं। कभी ताक़त की बात हो सकती है, तो कभी माइलेज और हैंडलिंग की। लेकिन हाल फ़िलहाल में सवारियों में फ़ीचर्स, पर्फोर्मेंस और रिफ़ाइनमेंट का ऐसा स्टैंडर्ड देखने को मिल रहा है, कि सभी सवारियों को एक ख़ास खाके में रखा जा सकता है, एक ही इंची-टेप से मापा जा सकता है । लेकिन ये बाइक ऐसी है जो आज कल की औसत प्रोडक्ट से बहुत अलग है। स्टाइलिंग पुरानी, फ़ीचर्स की लिस्ट छोटी और बनावट बहुत मोटी। बजाज की नई बॉक्सर। जो आई है पांच छह साल पुराने डिज़ाइन वाले हेडलैंप, चौड़ी सीटिंग, काम के बहुत थोड़े फ़ीचर्स के साथ । सीट के पीछे कैरियर । इसे देखकर एक सेकेंड के लिए राजदूत की याद आ गई । इसे लेकर सबसे बड़ा सरप्राइज़ तो यही है कि बजाज जो डेढ़ सौ सीसी के इलाक़े में पल्सर जैसी ट्रेंडी बाइक बनाती है वो ऐसी बाइक क्यों लेकर आई ?
.हर कंपनी के पास कुछ ऐसे प्रोडक्ट होते हैं दो फ़्लैगशिप प्रोडक्ट होते हैं। यानि ग्लैमरस, ख़ूबसूरत और नामी प्रोडक्ट जिसके बारे में चर्चा होती है और कंपनी का नाम होता है। वहीं कुछ ऐसी सवारियां होती हैं जो कंपनी की बिक्री के लिए बहुत ज़रूरी होती है , जो भले ही ग्लैमरस ना हों । और भले ही एक्सीड जैसी कोशिश फ़्लॉप रहे हैं लेकिन राजीव बजाज की ख़ूबी रही है कि वो आमतौर पर कुछ ना कुछ नया सोचते रहते हैं। और इसी सोच का नतीजा लग रही है बॉक्सर । 
इस बाइक को लेकर सभी बहस एक प्वाइंट पर आकर रुक से जाते हैं। वो प्वाइंट है इसकी क़ीमत। बजाज बॉक्सर जो डेढ़ सौ सीसी की एक बाइक है , उसकी क़ीमत है 42 हज़ार रु। दरअसल इसे देखने के लिए नज़र भी अलग चाहिए और यही क़ीमत इस बाइक को देखने के नज़रिए को बदल देती है।  


150 सीसी बाइक, जिसकी ताक़त लगभग 12 बीएचपी की और टॉर्क भी लगभग इतना ही। फ़िलहाल माइलेज का दावा है कि वो 55 से 60 किमी प्रतिलीटर है। इसकी राइड के बारे में, पर्फोर्मेंस के बारे में बहुत कुछ कहने के लिए नहीं, क्योंकि आमतौर पर बजाज की डेढ़ सौ सीसी पल्सर वाली तेज़ी या पकड़ नहीं दिखेगी, ठोस राइड है। 
कंपनी ने बॉक्सर के लिए कई विशेषण रखे हैं, जैसे दो पहियों पर एसयूवी और असल 'भारत बाइक' । इन सबका मतलब यही है कि इस मोटरसाइकिल का बाज़ार हैं उन जगहों पर जहां पर आम सड़क हैं टूटी-फूटी। उन ग्राहकों के बीच, जो मोटरसाइकिल का इस्तेमाल कॉलेज-ऑफिस के लिए ना करके, अपने काम के लिए करते हैं, यानि सामान लाने-ले जाने के लिए । और 42 हज़ार रू की क़ीमत बहुत ही आकर्षक कही जाएगी, इस बाज़ार और उस ग्राहक के लिए। जिस ग्राहक को बस काम से काम है, लाइफ़स्टाइल बाइकिंग से उसका कोई वास्ता नहीं है। 
हालांकि कुछ सालों पहले इस तरह की बाइक शहरों में दिखती थीं, लेकिन अब हर सेगमेंट के ग्राहक, यहां तक की सौ सीसी के ग्राहक भी थोड़े बहुत स्टाइल की उम्मीद करते हैं कंपनी से। तो ऐसे में बॉक्सर का लुक वाकई काफ़ी बेसिक है। क़ीमत को कम रखना वाकई बड़ी चुनौती है लेकिन अगर स्टाइल के मामले में ये थोड़ी और आकर्षक होती तो हो सकता है कि डेढ़ सौ सीसी की बॉक्सर आते ही सौ सीसी मोटरसाइकिलों का भी पसीना छुड़ा देती ।

November 02, 2011

नंबर 1 फ़ॉर्मूला


(24-10 को लिखी रिपोर्ट)

खेल कभी खेल नहीं रह जाते हैं जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हों। कभी महायुद्ध बन जाता है, जैसा कुछ साल पहले तक होता था जब भारत-पाकिस्तान आमने सामने होते थे। या फिर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नामी-बदनामी के लिए अहम ब्रांडिंग बन जाता है, जैसे पिछले साल हुए कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान हुआ था। और ऐसी ही कुछ कहानी है फ़ॉर्मूला वन की भी। जो मोटरस्पोर्ट्स के एक ईवेंट से कहीं ज़्यादा है, कहीं बड़ा बन चुका है। रफ़्तार, इंजीनियरिंग और टेक्नॉलजी से बढ़कर ये मार्केटिंग, ब्रांडिंग, नेटवर्किंग से लेकर ग्लैमर और लाइफ़स्टाइल का ईवेंट बन चुका है। और ऐसे ही रफ़्तार के महाकुंभ का भारत एडिशन भी बन चुका है। इंडियन ग्रां-प्री। भारत का पहला फ़ॉर्मूला वन रेस।

आमतौर पर जैसा हमने देखा है वैसा ही इस रेस के साथ भी हुआ है भारत में। शुरूआत से ही कई विवाद रहे, उहापोह रहा और जब तक कि बुद्धा इंटरनैशनल सर्किट का उद्घाटन नहीं हो गया, डर यही था कि कॉमनवेल्थ वाली किरकिरी ना हो जाए, एफ1 के साथ भी। इसके अलावा ग्रेटर नौएडा के किसानों का आंदोलन, ज़मीन अधिग्रहण को लेकर होने वाली मारामारी के बीच आशंका ये भी रही कि ये रेसट्रैक भी उस खींचतान के बीच आएगा। लेकिन अभी तक आयोजक ये भरोसा ज़रूर दिला रहे हैं कि उस विवाद का रेसट्रैक की ज़मीन से कोई लेना देना नहीं है।

ख़ैर मोटरस्पोर्ट्स प्रेमियों  के लिए तात्कालिक राहत की बात ये है कि रेसट्रैक तैयार है। दुनिया भर के चुनिंदा रेस ड्राइवरों के लिए तैयार है बुद्धा इंटरनैशनल रेस सर्किट...जहां पर भागने वाली हैं दुनिया की सबसे दमदार फ़ॉर्मूला वन कारें। जहां पर एक एक मोड़ पर होंगी सबकी नज़रें और कई किलोमीटर दूर तक सुनी जाएगी आवाज़ें , उन रेसिंग कारों की जो सबसे प्रतिष्ठित, सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले खेल का हिस्सा हैं। 30 अक्टूबर 2011 है वो तारीख़ जब दुनिया के सबसे तेज़ तर्रार 24 ड्राइवर पहली बार होंगे इकट्ठा दिल्ली से सटे ग्रेटर नौएडा में और सभी रेस करेंगे एक दूसरे से। 5 हज़ार मज़दूर, 300 इंजीनियर और चौबीसों घंटे चले काम ने तैयार किया है ये रेस सर्किट जो 350 हेक्टेयर में फैला है। और इन सबके लिए ख़र्च हुए हैं 2 हज़ार करोड़ रु। और इस रेस के लिए लगभग 6 हज़ार टन सामान आएगा।

5.14 किमी लंबे रेसट्रैक में कई ऐसे स्ट्रेच दिए गए हैं जहां पर ओवरटेकिंग करने की गुंजाइश है। वहीं इस सर्किट की एक ख़ासियत है इसका स्ट्रेट, जहां पर टॉप स्पीड जाएगी 318 किमी प्रतिघंटे की।
14 मीटर का एलिवेशन यानि चढ़ाई ...जो दुनिया में शायद ही कहीं और है। कई रेसर जिनमें भारत के पहले एफ़ 1 रेसर नरैन कार्तिकेयन शामिल हैं उनके मुताबिक बुद्धा इंटरनैशनल सर्किट दुनिया के बेहतरीन ट्रैक में से एक होगा। भारत जैसे देश में फ़ॉर्मूला वन रेस की ज़रूरत को लेकर तमाम चर्चाएं चल रही हैं, जिसके पक्ष औऱ विपक्ष में हज़ारों दलीलें हवा में लहरा रही हैं, किसानों की ज़मीन पर क़ब्ज़े को लेकर शक जताया जा रहा है, जिसमें मैं पार्टी नहीं हूं, मैंने ना तो इन पहलुओं पर ठीक से पढ़ाई की है और ना किसानों से जाकर बात की है। मुझे सिर्फ़ एक चीज़ फिलहाल नज़र आ रही है और वो है एफ़ 1 देखने का मौक़ा। अपने तमाम हाइप, ग्लैमर और मार्केटिंग के बीच एफ-1 के बीचोबीच एक ऐसी दुनिया है, जो सिर्फ़ रफ़्तार और रोमांच की है, जो ऐसी तेज़ी से चलती है कि सबकुछ पीछ छूट जाता है। और वो ऐसी आवाज़ निकालती जाती हैं जो जो ज़िंदगी भर के लिए दिमाग़ के मेमोरी कार्ड में छप जाता है।
www.ndtv.com/kranti
*Published last week




October 24, 2011

its (E)on...


तो पिछली बार की कहानी से आगे की बात आज करता हूं। वो इसलिए क्योंकि बीते हफ़्ते ह्युंडै ने अपनी ईयौन लौंच कर दी है, और हफ़्ता ख़त्म होने से पहले मुझे इस कार को उदयपुर में टेस्ट ड्राइव करने का भी मौक़ा मिला। जिसके बाद इस कार के सबसे चर्चित पहलू के बारे में और बारीकी से सोच पाया। पहले इसकी क़ीमत और फ़ीचर्स। ईयौन भारत में ह्युंडै की सबसे छोटी और सबसे सस्ती कार है। 814 सीसी के इंजिन वाली ईयौन के छह वेरिएंट आए हैं, 2 लाख 69 हज़ार रु से 3 लाख 71 हज़ार रु के एक्सशोरूम क़ीमत के साथ। कई ऐसे फ़ीचर्स के साथ जो 800 सीसी सेगमेंट में आम नहीं हैं, जिनमें से एक लगा मुझे एडजस्टेबल स्टीयरिंग, बहुत आरामदेह आगे की सीटें। इसका आकार बड़ा है अपने सेगमेंट के हिसाब से। ह्युंडै की वैल्यू-फॉर-मनी डिज़ाइन के तरीके ने इस कार में कई प्रैक्टिकल जगहें भी निकाली है, डैश के ऊपर, बड़ा ग्लव-बॉक्स, पानी के बॉटल के लिए जगह वगैरह। लगेज स्पेस भी बेहतर लगेगी अपने सेगमेंट से। लेकिन उदयपुर से आबू रोड की तरफ़ हाइवे पर इसे लेकर निकला तो फिर याद आ गया कि इसमें लगा है 814 सीसी इंजिन, जिसकी ताक़त सिर्फ़ 55 बीएचपी की है। इसे लेकर मैं निकला था उदयपुर से आबू रोड पर। बहुत अच्छा-ख़ूबसूरत हाईवे लेकिन उल्टी दिशा से आने वाली गाड़ियों से भरी। लेकिन ज़्यादा दिक्कत नहीं रही क्योंकि ये कार आराम-आराम से रफ़्तार पकड़ती है और सौ की रफ़्तार तक जाते-जाते वक्त लगाती है, साफ़ था कि बनावट, ड्राइव और फ़ीचर्स इस कार को एक शहरी कार बनाते हैं, हाईवे की गाड़ी नहीं।


इस कार को ध्यान से देखकर, बारीकी से जांचकर ये लगा कि मीडिया में या ज़्यादातर पत्रकारों के बीच इस कार को लेकर जो धारणा थी वो सही नहीं थी। दरअसल इसके इंजिन क्षमता के ऊपर कुछ ज़्यादा ही ध्यान जा रहा था, जिसे देखकर ये सोचना बहुत स्वाभाविक था कि सभी इसकी तुलना मारुति 800 या ऑल्टो से होगी। और चूंकि मारुति 800 अब मेट्रो से निकल चुकी है, सब यही सोच रहे थे कि ईयौन आते ही खेल ख़त्म कर देगी ऑल्टो को। इसके पीछे ह्युंडै के डिज़ाइन और इंजीनियरिंग पर भरोसा भी था और साथ में ये सच्चाई भी कि ऑल्टो अब पुरानी हो चुकी है। लेकिन मुझे ये लगा कि ये तुलना थोड़ी ग़लत है। ईयौन ऑल्टो को पीटने के लिए नहीं बनी है, ऑल्टो ख़रीदने वालों की उम्मीदें और ज़रूरतें कुछ और होती है, वो वैल्यू फॉर मनी के पुजारी होते हैं।
अगर हम देखें ईयौन की क़ीमत तो पता चलेगा कि ये लगभग वही है जो मौजूदा सैंट्रो की है। इयौन आ रही है 2.69 से 3.71 लाख रु के दिल्ली, एक्सशोरूम क़ीमत में, और सैंट्रो आती है 2.80 से 3.95 लाख रु के बीच। और इस क़ीमत से ये समझना आसान है कि कंपनी कहीं ना कहीं इसे सैंट्रो के विकल्प के तौर पर देख रही है, जिसे भारत में आए अब 13 साल हो गए हैं। ऊपर से ईयौन की एआरएआई से मापी माइलेज भी 21.4 किमीप्रतिलीटर की आई है। यानि ईयोन एक तरीके से सैंट्रो की रिप्लेसमेंट हो सकती है, लेकिन कंपनी ने इस बात से इंकार किया है। कंपनी सैंट्रो को बंद नहीं कर रही है, और ये देखना दिलचस्प होगा कि जो ग्राहक हज़ार सीसी की सैंट्रो ख़रीदने निकलेंगे वो क्या 800 सीसी की ईयौन को लेना चाहेंगे ?