September 22, 2011

Traffic मसाला डोसा


...रोज़ फेसबुक पर मैं लिख रहा हूं, वो लाइनें जिसे कई बकवास मानते हैं, मैं कहता हूं ट्रैफ़िक मसाला डोसा। जिसकी एंट्री वहां होती है, जिस डब्बे को दिखाकर ज़ूकरबर्ग कहता है कि आपके सर पर क्या सवार है, ये दोस्तों को बताइए। और चूंकि अभी भी चिट्ठी के आख़िर में मैं योर्स ओबिडिएंटली क्रांति संभव ही लिखता हूं तो मैं इस बक्से में भी कुछ लिखने लगा हूं...जिसे कहते हैं स्टेटस मेसेज और जो मेरे जज़्बातों के लिए मसाज का काम भी करता है। वो जज़्बात जो उभर कर आते हैं कई बार सड़कों के बीच में...जब बाईं ओर से स्कॉर्पियो वाला मुझे ओवरटेक करता है, मोबाइल पर बात करने की वजह से जो नहीं दे पाता है इंडीकेटर और उसे लगता है कि टेलिपैथी के ज़रिए मैं समझ जाउंगा कि वो अब ओवरटेक करके अचानक दाएं होने वाला है और फिर स्लो हो जाने वाला है, मानो उसने संकट मोचन मंदिर में यही मन्नत मांगी थी कि देश के किसी मूर्धन्य या फिर धन्य  कुचले पत्रकार को उसकी औक़ात समझा सकूं...वैसे इमानदारी से कहूं तो हाल में मेरी गाड़ी में जितना ख़र्चा लगा है, उसे चुकाने के बाद मैं पहले से कहीं ज़्यादा संवेदनशील हो गया हूं, मैं -कोई मिल गया- का रितिक रौशन हो चुका हूं, कि मुझे पता चल जाता है कि तीन किलोमीटर आगे कैसे कोई सैंट्रो वाला मेरे लिए घात लगाए बैठा है, जो अचानक शाहरुख़ ख़ान की तरह अपनी स्टीयरिंग घुमाएगा और मेरे कलेजे के एक सत्रहवें हिस्से को मेरे मुंह के रास्ते निकलने की वजह देगा। लेकिन कई बार ये सिक्स्थ सेंस बिज़ी होता है।
सैंट्रो के सिग्नल को बीच में इंटरसेप्ट करके एक सफ़ेद कॉलसेंटर सिंड्रोम से पीड़ित टवेरा मुझे पहले दाएं से ओवरटेक करती है, फिर बाएं से, आगे जाकर अचानक ब्रेक मारती है, फिर अचानक पीछे से आकर हॉर्न बजाती है...लग रहा है कि मैं ज्वेल थीफ़ का देव आनंद हूं, गरदन टेढ़ी करके ढोल बजा रहा हूं और वो टवेरा वैजंति माला है और इर्द गिर्द नाचते हुए कह रही है कि होठों पे ऐसी बात मैं छुपा के चली आई.... वैसे बुनियादी सवाल ये है कि वाई शुड आई केयर कि कॉल सेटंर टवेरा क्या बात छुपा सकती है...हाऊ मे आई हेल्प यू मिस्टर बॉब फ्रॉम बाल्टीमोरडैम इट...तो इसी पूर्वाग्रह के साथ मैं विश्वामित्र की तरह स्थिर चित्त एक रफ़्तार में चला जा रहा हूं, ये बात अलग है कि पिछली बारिश में ये गाड़ी भीग गई थी, मंदाकिनी से थोड़ा कम और श्रीदेवी से थोड़ा ज़्यादा, जिसके बाद से मेरी गाड़ी की टॉप स्पीड मेरी मजबूरी है विकल्प नहीं।  वैसे ये काबिलेतारीफ़ बात कही जानी चाहिए और रोटरी क्लब के द्वारा मुझे प्रशस्ति पत्र मिलना चाहिए कि पूरा देश जब इनकसेंस्टेंसी से जूझ रहा है, वहां पर मेरी कंसेस्टेंसी आने वाली नस्लों के लिए एक समाजशास्त्रीय स्टडी हो सकती है। लेकिन फिर ये सोच कर अपनी मांग वापस लेता हूं कि उस सर्टिफिकेट से मुझे एक लीटर पेट्रोल भी नहीं मिलेगा...तो वापस आता हूं उसी स्कॉर्पियो पर, सॉरी टवेरा या सैंट्रो ...आई डोंट नो मेट...लगता है भूल गया...
वैसे कई सारी हैं, सड़कों पर दिमाग़ ज़्यादा चलता है इसलिए कई तरीके के कैल्कुलेशन करता रहता हूं...कई बार नुसरत और कोल्डप्ले सुनते हुए कई बार मैडम अख़्तर को सुनते हुए और कई बार चुप्पी में भी। ख़ैर। फिर से वापस आता हूं। पिछले शुक्ल पक्ष या विपक्ष की बात है....लाजपत नगर की सड़क पर ट्रैफ़िक में दबा सा, मिडिल क्लास के डेली स्ट्रगल को गरिमामंडित करते हुए अपनी धीमी रफ़्तार गाड़ी से सड़क के बीचो बीचे चला जा रहा था....सबसे दाईं वाली लेन में गाड़ियों की क़तार लगती दिखाई दे रही थी...वो जगह ऐसी है जहां पर एक ही सड़क के दो हिस्से एक दूसरे से रूठते हुए मुड़ जाते हैं, एक तो बाईं तरफ़ सेंट्रल मार्केट में चली जाती है, जिस मोड़ के एक तरफ़ एक ज़माने में स्टूडेंट बस पास बनाने वाला सीमेंट का चहलपहल भरा कमरा दीखता था, और उसके दूसरे ओर इतने जूस कॉर्नर हुआ करते थे कि ज्योमेट्री के सारे थ्योरम से इंसानियत का भरोसा उठ जाए, दाएं बाएं तो ठीक, बीच और ऊपर वाले दुकान भी ख़ुद को जूस कॉर्नर ही बताते, जूस सेंटर या सेंटर फ़ॉर्वर्ड नहीं...रूठी हुई सड़क का दूसरा सिरा बहुत ही महत्वाकांक्षी तरीके से एक फ्लाईओवर में तब्दील हो जाता है। वैसे उसकी अकड़ भी जल्द ख़त्म हो जाती है जब 8 लेन का ट्रैफ़िक तीन लेन में अंटने की कोशिश में, इसका करियर नेहरू नगर में जाकर भद्दे तरीके से ख़त्म कर देता है।  लेकिन आज कहानी वहां तक नहीं जा रही है। प्लॉट तो पहले से तैयार हो गया था। एक श्कोडा वाले सज्जन ने ट्रैफ़िक के मोमेंटम के ऊपर अपने हार्मोनल ज़रूरत को तरजीह दी, अधेड़ उम्र में अपने जीवन के माएने खोजने की प्रक्रिया में नज़र एक बाला पर टिकी, और जैसा कि कोई भी 42 साल का शरीफ़ शादीशुदा इंसान करेगा, प्रकृति की उस सुंदर क्रिएटिविटी को इज़्ज़त देगा, ख़ुद को नहीं रोकेगा तो ऐसा ही उन्होंने भी किया। ख़ुद को बिल्कुल नहीं रोका, गाड़ी रोकी। और ज़ाहिर है कि ऐसी अलौकिक प्रक्रिया में कोई भी जानबूझ कर अड़चन नहीं डालेगा, जिसके भी दिल में जज़्बात हैं और कार की स्टीरियो में अन्नू मलिक के गाने हैं वो अप्रिशिएट तो करेगा ही इस जज़बात को, और बल्कि उसी बाला को निहार कर अपना सपोर्ट भी प्रदर्शित करेगा। लेकिन सच्चाई के अनगिनत पहलुओं में से एक पहलू है कलयुग भी और इसी युग के बर्थ सर्टिफिकेट के नशे में चूर एक नौजवान नहीं कद्र कर पाया इस रेयर खगोलीय घटना को और रगेत के मारा अपनी कार, लाल श्कोडा के पीछ लगी 8 गाडियों की कतार में सबसे आख़िर में खड़ी गाड़ी में। रगेत वाला वर्ड हमेशा मुझे फैसिनेट करता है, इट्स फ्रॉम पटना यू नो। अगर दिल्ली वाली हिंदी में बोलूं तो सूत के मारा। वहीं इसका एक बॉलीवुड पैरलल खींचू तो बिल्कुल उसी तरह मारा जैसे आई थिंक इंस्पेक्टर सन्नी या किसी बन्नी ने एक चमड़े के बैट से विलेन के पृष्ठ भाग में ऑटोग्राफ़ दिया था। तो आगे बढ़ते हैं। तो उस सफ़ेद सफ़ारी ने अगली गाड़ी को ठोका, जो न्यूट्रल में थी, उसने उसी चोट को आगे पास किया, फिर आगे और आगे एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया। अचानक 8-9 गाड़ियां जो कुछ सेकेंड पहले तक प्रकृति के साथ एकाकार होते लैंडस्केप का हिस्सा थीं, एक अनचाहे चुंबन का शिकार बनी। जिसमें रत्ती भर भी ब्यूटी नहीं थी, पैशन नहीं था, क्योंकि इसमें होठों की जगह सफ़ारीनुमा हथौड़े का इस्तेमाल था, जो दिल दहलाने वाला और शरीर से लेकर आत्मा तक को चोट पहुंचाने वाला था। और मैं इस घटना का गवाह था। लग रहा था मेरी आंखें एक ऐसे कैमरे की तरह हैं, जो बल्ले से निकले बॉल के साथ चल रहा है, ज़ूम इन या ज़ूम आउट नहीं..साथ में चल रहा है। एक हाई डेफिनिशन वीडियो जिसकी एक एक डीटेल मेरे सामने खुल रही है। ये सब मैंने बताया तो बहुत रायता फैला कर है लेकिन कुल मिलाकर 2-3 सेकेंड में ये लंका-कांड समाप्त हो चुका था।
जैसा कि कहा जाता है कि शरीर तो सिर्फ़ वस्त्र है, और जिस फटे वस्त्र के लिए इंश्योरेंस भी क्लेम कर सकते हैं उसके लिए क्या रोना, क्या फ़ील करना। वैसे भी अपने ईएमआई, पेट्रोल और बिजली बिल का रोना कम है कि उन टिन के वस्त्रों के लिए सोचूं। लेकिन थोड़ा सोचा। फिर ये भी सोचा कि क्या सोचा ये बताने की मजबूरी तो नहीं है, वैसे भी ब्लॉग पर मैं लिख रहा हूं...डज़न्ट मैटर की ये पढ़ कर किसी के जीवन में कुछ ऐड हो या ना हो, मैं तो कमसेकम इसे अपने दिमाग़ के डेटाबेस से सबट्रैक्ट कर लूं। लेकिन फिर भी मैं आम भारतीय की तरह नॉन जवाबदेहिक सलाह तो दे ही दूं...सड़क के सबसे दाईं ओर कम ही चलाएं...वैसे इंटरनैशनली उसका इस्तेमाल ओवरटेकिंग के लिए होता है लेकिन मैं ग़ुलाम मानसिकता वाला भारतीय नहीं हूं इसलिए इंटरनैशनली इसका इस्तेमाल किसी के लिए भी हो, आई डू नॉट केयर। सड़क की बाईं ओर चलाने से व्यू बेहतर होता है दरअसल, बस स्टॉप होता है, ऑटो स्टैंड होता है, और संजय लीला भंसाली से नई हीरोईन खोजने का एकतरफ़ा वायदा आपने कर रखा है वो बेहतर तरीके से निभा पाएंगे। और अगर गाड़ी रोकनी भी पड़े तो अनचाहे चुंबन की आशंका कम ही हो। तो इसी अनमोल एडवाइस के साथ.... शब्बा ख़ैर। 

September 18, 2011

Total Recall .....


रीकॉल का कैसा मतलब निकाला जाता है मीडिया में ....ये सवाल अभी हाल में आया..इस सवाल की टाइमिंग सही रहीहाल फिलहाल के रीकॉल के ऐलानों को देखते हुएउन ऐलानों पर बनने वाली ख़बरों के देखते हुए...और ऊपर से ये सवाल आया किसी कार निर्माता की तरफ़ से...तब जवाब देते वक्त लगा कि कार रीकॉल के सवाल पर अभी भी हमारी राय काफ़ी बंटी हुई हैचाहे वो मी़डिया होआम ग्राहक हो या फिर कार निर्माता ही क्यों ना हों....ग्लोबल स्तर पर रीकॉल के मामले में इतनी मारामारी देखी हमने टोयोटा को लेकरजिस कंपनी को लाखों गाडि़यों का रीकॉल करना पड़ाचाहे एक्सिलिरेटर की शिकायत आई हो या ख़राब कार्पेट की। वहीं कुछ महीने पहले जब सालों से मिडसाइज़ सेडान सेगमेंट में राज करने वाली हौंडा सिटी का एकाधिकार ख़त्म हुआ था,नंबर एक का ताज छिना तो तुरंत उसका रिश्ता हाल में ऐलान हुए हौंडा सिटी कारों के रीकॉल से जोड़ दिया गया। और यहां पर सवाल ये उठता है कि रीकॉल के बारे में हमारी समझ कैसी है और उस समझ का असर क्या होता है।
आमतौर पर अमेरिकी बाज़ार में बहुत ठोस सुरक्षा और ग्राहकों के हितों की रक्षा के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं। जहां अगर कारों में कोई छोटी गड़बड़ी भी हो तो फिर हज़ारों कारों का रीकॉल होना कोई अनोखी बात नहीं ...शायद ही कोई कंपनी ऐसी है जिसकी गाड़ियां वापस नहीं बुलाई गई हो। जहां इसे कार कंपनियों का ज़िम्मेदार रवैया माना जाता है वही लग्ज़री गाड़ियों के रीकॉल जैसे बीएमडब्ल्यू के हाल के रीकॉल पर सवाल भी उठाए ज़रूर जाते हैं।
वैसे यहां पर मैं वो मोटे कनफ़्यूज़न को दूर कर दूं जो कई लोगों के मुंह से सुना था, कि कार को वापस बुलाना मतलब गाड़ी वापस लेना नहीं है...कार कंपनियां कार को वापस वर्कशॉप में बुलाकर खराब पार्ट-पुर्ज़ा बदलती हैंपूरी कार नहीं।
भारतीय कार कंपनियों में फ़िलहाल रीकॉल का डर साफ़ देखा जा सकता है। पहले भी कई कारों के कुछ पार्ट कंपनियों ने ख़ुद बुलाकर बदले थे। लेकिन रीकॉल का नाम नहीं दिया था। लेकिन हाल में हौंडा और मारुति ने थोड़ी हिम्मत तो दिखाई है। हौंडा को अपनी सिटी के इंजिन के एक स्प्रिंग को बदलने के लिए वापस बुलाना पड़ा और मारुति को अपनी कारों के इंजिन के एक बोल्ट को बदलने के लिए गाड़ियां बुलानी पड़ी तो कंपनी बाकायदा ऐलान किया। वहीं टाटा मोटर्स ने नैनो में बदलाव के लिए आफ़र तो दियाकि एक्स्ट्रा सुरक्षा के लिए नई फिटिंग ग्राहक मुफ़्त करवा सकते है लेकिन तुरंत ही ये भी प्रेस नोट जारी कर दिया कि वो रीकॉल नहीं।
कार रीकॉल पर बहस इन्हीं दो सिरों पर झूलती रहेगी। इसके एक सिरे पर तो ग्राहकों के साथ धोखा होगा । चूंकि कार कंपनी सार्वजनिक तौर पर किसी ख़ामी को स्वीकार नहीं करतीं तो उनकी ज़िम्मेदारी नहीं बनती और ऐसे में कई बार ग्राहकों को अपने ख़र्चे पर ख़राब हिस्सा बदलवाते और वर्कशॉप का चक्कर लगाते देखा है हमने।
दूसरी तरफ़ जहां ये समझना ज़रूरी है कि कारों का प्रोडक्शन कोई एक दो पुर्ज़े के बनने से नहीं होताहज़ार हिस्से जुड़कर कार बनती है। जिनमें से कई हिस्से बाहरी कंपनियां भी बनाती हैं। ऐसे में किसी पार्ट बनाने वाली कंपनी की ग़लती से किसी ख़ास लॉट में गड़बड़ी होना नामुमकिन नहीं। तो फिर ऐसे में ज़रूरत है उस जागरूकता कि जिससे कार निर्माता अपने ख़राब प्रोडक्शन के लिए जवाबदेह होंज़िम्मेदार हों। लेकिन साथ में कंपनियों को वो भरोसा भी मिलना चाहिए मीडिया और ग्राहकों से कि वो खुलकर अपनी ग़लती माने। आने वाले वक्त में उम्मीद है कि कंपनियां ज़्यादा पारदर्शिता से अपनी ग़लतियों को सुधारने की कोशिश करेंगी और ग्राहकों के हक़ नहीं मारे जाएंगे।
**Published Already

September 17, 2011

थोड़ा स‌ा रूमानी हो जाएं…

वजहें राग दरबारी के ट्रक की तरह स‌े होती हैं। जितने अलग एंगिल स‌े देखिए तो उसका मतलब बदलता जाता है। किस वजह स‌े हम किसी चीज़ का इस्तेमाल करते हैं, उससे उस चीज़ का मतलब बदल जाता है। उसका वाशिंग मशीन पंजाब में लस्सी बनाने की मशीन बन जाती है और पंपिंग स‌ेट ट्रैक्टर में। जिस गांव में तीन महीने में एक बार पौने घंटे के लिए बिजली आती है वहां पर आटा चक्की मशीन में लगा जेनरेटर पूरे गांव के मोबाईल फ़ोन का चार्जिंग प्वाइंट बन जाता और क्योंकि दस रु के लाइटर में एलईडी लाइट लगा होता है इसीलिए मेरे गांव में भी हज़ारों चाइनीज़ लाइटर आ जाते हैं जहां पर शायद ही किसी को स‌िगरेट-बीड़ी पीते आप देखेंगे। 


कहने का मतलब आप स‌मझ ही गए होंगे। हम किस कार या मोटरसाइकिल को किस वजह स‌े ख़रीदते हैं या पस‌ंद करते हैं, उस स‌वारी का मतलब बदल देता है। दिल्ली की स‌ड़कों पर हज़ारों एसयूवी दौड़ती रहती हैं, जिनमें बैठे स‌ज्जन काले चश्मे के पीछे स‌े ये भाव देते हैं कि देखिए एक ‘माचो’ आपके बगल से गुज़र रहा है …लेकिन उन स‌भी एसयूवी में स‌े 90 फ़ीसदी के पहियों पर स‌ाल के एक बार भी मिट्टी नहीं लगती है, कौंक्रीट में ही मंडराती हैं वो गाड़ियां। और ये इमेज शायद ही कोई तोड़ पाता है, इसीलिए जब कोई एसयूवी वाला ऐसा मिला जो वाकई अपनी एसयूवी का इस्तेमाल कर रहा था तो अटपटा लग जाता है। काफ़ी वक्त पहले जब मैं मिला दिल्ली के एक गूजर नेता स‌े, तो उनकी कई मंहगी गाड़ियो-कारों की लाइन में कई एसयूवी खड़ी थीं, मंहगी-मंहगी। और अगर बिहारी आरिजिन का कोई इंसान अगर पालिटिशयन की एसयूवी की खेप देखेगा उसका एसोसिएशन सीधा सा होगा-नेता-दबंग-एसयूवी। इमेज के लिए ज़रूरी गाड़ी। लेकिन फिर भी जेनरली मैंने पूछ लिया...एसयूवी क्यों ज़्यादा तो जवाब मिला कि भई खेत भी तो हैं हमारे, हर थोड़े ही ना हमेशा दिल्ली में रहते हैं। 
एक जोड़े स‌े मिला था, उनकी गाड़ी बड़ी दिलचस‌्प लगी। पुरानी लैंड रोवर मिट्टी स‌े स‌नी हुई। कोई एक्स्ट्रा ताम झाम नहीं। पति-पत्नी जंगल में ही रहते हैं, एक छोटा स‌ा रिज़ॉर्ट चलाते हैं।और लगता है कि उनके ज़िंदगी का हिस्सा है वो स‌वारी। वो लैंड रोवर उस जोड़े के दिनचर्या की डायरी लगती है, स‌ुबह का नाश्ता कहां हो रहा है और दोपहर के खाने स‌े पहले कहां कहां टहल कर आए हैं, जंगल के किस कोने स‌े किस अनोखे पंछी को देखकर वापस आए हैं। 
ऎसी ही छाप दिखती है कई बाइकर मित्रों की मोटरसाइकिलों में। उनके पहचान छलक कर उनकी स‌वारी पर आ जाती है, किनारे में लगे कैरियर बताते हैं कि दोनों किस लंबे स‌फ़र पर एक स‌ाथ निकले थे। कहां पर वो लड़खड़ाए थे और कहां किस चढ़ाई पर उनका दम फूल गया था। 


लेकिन बड़ा दुख होता है उन गाड़ियों को देखकर जो बेलल्ला स‌ी लगती हैं, थोड़ी खोई स‌ी – अनचाही स‌ी। उन पर कोई निशानी नहीं होती ये बताने के लिए कि वो किसी की ज़िंदगी में शामिल हैं। वो बस प्वाइंट ए स‌े प्वाइंट बी के लिए इस्तेमाल होती हैं। और फिर रुक जाती हैं। कई बार बहुत मंहगी और कई बार स‌स्ती ।
आज की तारीख़ में इमेज बहुत अहम हो चुका है, हम कहां पर, कैसे दिख रहे हैं, पेश हो रहे हैं। आपके हाथ में कौन स‌ा फ़ोन है, आपके शर्ट के आस्तीन पर किसी बड़े ब्रांड कि निशानी है कि नहीं...और आप उतर किस गाड़ी स‌े रहे हैं। ऎसे में बड़ा दुख होता है ऎसी गाड़ियों को देखकर जो स‌िर्फ़ शॉर्टकट या डेस्कटॉप के आइकन की तरह इस्तेमाल में आती हैं। स‌ोशल स‌्टेटमेंट देने के लिए । उम्मीद है आपके घर के बाहर जो स‌वारी है, स‌्प्लेंडर स‌े लेकर मर्सेडीज़ तक, उन पर आपकी छाप है, और लग रहा है कि नहीं है अभी तो फिर हो जाए। लेकर निकल जाइए उसे आज थोड़ी देर के लिए।
(पब्लिश्ड प्लीज़)

September 12, 2011

Brio-genic प्रश्न ???


"लेकिन क्या भारतीय कार ग्राहक इस बात से ख़ुश नहीं होंगे कि इस कार में जो इंजिन लगा है वो वही iVTECहै जो हौंडा सिटी में लगा है, इसकी बनावट ऐसी है जिसे हम जीकॉन बॉडी कहते हैं और जो ज़्यादा सुरक्षित होती है ?" ये सवाल से ज़्यादा उत्सुकता थी, छोटी कारों के ग्राहकों के बारे में एक नए तरीके से जानने की । क्योंकि हौंडा पहली बार भारत में लगा रही है एक ऐसी कार जो छोटी कारों के इलाके में आती है । हौंडा ब्रियो। 
जब तक मेरे कैमरा सहयोगी विशाखापत्तनम के समुद्री किनारे की ख़ूबसूरती को बैकग्राउंड बना कर, हौंडा की नई नवेली हौंडा ब्रियो को सामने रखकर, शूटिंग कर रहे थे तब तक मेरे पास वक्त था कि मैं इस कार के बारे में कुछ बातें कर सकूं, हौंडा कार इंडिया के एक सीनियर अधिकारी के साथ। ज़ाहिर सी बात है कि बातचीत इसकी क़ीमत पर हो रही था जिस पर मेरा कहना था कि इस कार के लिए शुरुआती क़ीमत 3 लाख 80 हज़ार के आसपास होनी चाहिए। जो आंकड़ा लंबे सवाल-जवाब का सबब बना था। दरअसल ब्रियो के बारे में पहला ब्रीफ़ या जानकारी यही आई थी कि हौंडा की आने वाली छोटी कार पांच लाख से कम की होगी और मौजूदा जैज़ से छोटी भी। जिसकी गारंटी तो अभी ही मैं ले सकता हूं, ब्रियो पांच लाख से कम में ही शुरू होगी और साइज़ में जैज़ से छोटी होगी। लेकिन दोनों प्वाइंट का क्या मतलब है आज ? क्या इतना काफ़ी है ? बिल्कुल नहीं।  
ब्रियो में लगा है जैज़ वाला ही 1.2 लीटर i-VTEC इंजिन, 87 बीएचपी की ताक़त है। काफ़ी हद तक जापानी और प्यारे चेहरे वाली ब्रियो अलग ज़रूर दिखती है इस सेगमेंट में। जो ज़रूरी है। साथ में इस कार के अंदर का जगह काफ़ी संतुष्ट करने वाली है। आगे ड्राइवर सीट पर भी और पिछली कतार में भी। जो मुझे काफ़ी अच्छा लगा, कह सकते हैं कि ब्रियो की ये ख़ूबी बहुत पसंद की जाएगी। आजकल जो भी फ़ीचर्स होते हैं इस सेगमेंट में वो सारे हैं। साथ में एक और ख़ूबी मुझे लगी इसकी आसान ड्राइव। पिछले दरवाज़े ( डिक्की) का बड़ा हिस्सा शीशे का है जो रिवर्स करना बहुत आसान कर देता है। तो इन सभी आंकड़ों और फ़ीचर्स के साथ 27 सितंबर की तारीख़ तक ये उतरेगी बाज़ार में। और इन जानकारियों के बाद वापस आते हैं अपने पहले सवाल पर। 
छोटी कारों का बाज़ार ऐसा है जिसे समझना बहुत आसान कभी नहीं रहा है, ऊपर से दिन रात नई रणनीति के साथ उतरने वाली छोटी कारें इसे और कांप्लिकेट कर रही हैं। ऐसे में ब्रियो की क़ीमत क्या होगी ? 
अगर हाल फ़िलहाल में छोटी कारों के बाज़ार को देखें तो तीन सोच या आयाम देख सकते हैं, स्विफ़्ट, फ़ीगो और इंडीका। जिसके बीच में ब्रियो को जूझना पड़ेगा। स्विफ़्ट ने एक ऐसी हैसियत बना रखी है जिसे तोड़ना दूसरी किसी कार के बूते की बात फ़िलहाल नहीं लग रही है। फ़ीगो ने अपनी क़ीमत और किफ़ायत के बल पर एक अलग पैमाना तैयार कर दिया है, वहीं पैसा वसूल कारों के नाम पर इंडीका विस्टा की अलग हैसियत है। सवाल ये है कि ब्रियो कहां खड़ी हो पाएगी (अगर हौंडा सिटी जैसा प्रदर्शन इस सेगमेंट में भी दोहराना है तो ! )? स्विफ़्ट की क़ीमत में वो उतर नहीं  सकती। फ़ीगो को वो छू नहीं सकती। हौंडा का ब्रांड  भारत में प्रीमियम हो चुका है, ऐसे में इंडिका जैसे इलाकों में जाना मुश्किल है। टोयोटा की लीवा, निसान की माइक्रा जैसी कारें इसी कांप्लिकेटेड प्राइसिंग का शिकार हुईं। वहीं ब्रियो के लिए एक और टेंशन है जैज़। जब साढ़े पांच लाख से जैज़ शुरू हो रही है तो उस पैसे में ब्रियो क्यों लूंगा मैं ? तो सवाल है कि टू-बी और नॉट टू बी । 
( प्रभात ख़बर में पब्लिश्ड)

September 09, 2011

'NO SPEED LIMIT'


कल के एक लौंच ने कुछ दिनों पुरानी कहानी याद दिला दी...कल लौंच हुई CLS 350 जिसका बेसिक लेखाजोखा कुछ ऐसा है...


The New CLS 350
V6 Petrol 3498 cc engine 
306 hp@ 6500 rpm of power 
370 Nm @ 3500 - 5250 rpm torque
7G-TRONIC (7Speed Automatic Transmission)
0-100kph is reached in 6.1 seconds
top speed at 250 km/hr 
Priced at Rs. 67.67 Lakhs (Ex-Showroom Mumbai)

लेकिन इस लौंच ने अचानक दिला दी उस कार की...एक आवाज़ की , एक ताक़तवर ड्राइव की...और एक निशान की जिसका मतलब  होता है NO SPEED LIMIT :)
जब इस साइन को सड़क पर देखें तो फिर दबा दीजिए एक्सिलिरेटर :)
जो मैंने किया था दूसरी CLS पर ...जिसके नाम के आगे जुड़ा था AMG भी। एक एक्सपीरिएंस....इन केस आप देखना चाहते हैं तो फिर...देख सकते हैं ...इस लिंक पर    असल CLS drive Autobahn पर :)