September 08, 2011

ForMula -फ़ीगोएस्टा



जब हमें प्रोसेस के बारे में सटीक जानकारी होती है तो फिर एंड रिज़ल्ट को भी हम कंट्रोल कर सकते हैं । उस सूरत में अगर रिज़ल्ट गड़बड़ा गया है तो क्या सही करना हैक्या ग़लत हो गया इसके बारे में हमें ठीक-ठीक अंदाज़ा रहता है। लेकिन मामला तब पेचीदा होता है जब नतीजा तो आ जाता है लेकिन हमें पता नहीं चलता कि हमने सही क्या कियाऔर क्या ग़लत किया । और अगर ये आज के वक्त में हो जब हर कारोबार में स्टडी और सर्वे पर इतना ज़ोर हैतो मामला तिलिस्मी हो जाता है।
जैसे एक कार छह साल पहले आईआते ही काफ़ी हंगामा मचायाबिना देखे हज़ारों ने उसे बुक करवा लियातब भी वेटिंग लिस्ट में रहीआज भी है। लेकिन कंपनी भी कई बार अचरच में रही कि आख़िर ऐसी कौन सी ख़ास बात है कि इस कार को हर महीने 11-12 हज़ार लोग ख़रीद रहे हैंसेगमेंट में सात आठ और विकल्प होने के बावजूद इस कार ने मार्केट का पच्चीस फीसदी हिस्सा अपने नाम कर रखा है। ये थी मारुति स्विफ़्ट । जिसका नया अवतार भी हम जल्द देखने जा रहे हैं।
इससे थोड़ी अलग केस स्टडी थी फीगो। फ़ोर्ड ने जब इसे लौंच किया भारत में तो इस कार ने फ़ोर्ड की भारत में जान बचाई । लेकिन इस कार की सफलता अलग-अलग स्टेप में आई थी और जिनमें से ज़्यादातर पर फ़ोर्ड की पकड़ थी। कंपनी ने इस कार को उतारने से पहले मार्केटिंग और आफ़्टर सेल्स पर तो काफ़ी काम किया ही था। एक एक दिन में कंपनी ने दर्जन से ज़्यादा डीलरशिप देश के अलग अलग हिस्सों में खोलेपार्ट-पुर्जों की क़ीमतों को कम किया और ऊपर से इन सभी कोशिशों के बारे में ग्राहकों के बीच भरपेट प्रचार किया । लौंच से पहले प्रोडक्शन फुल-स्पीड में कर दिया जिससे कि ग्राहकों को इंतज़ार ना करना पड़े। और इन सबके बाद ऐसी क़ीमत पर उतारा जिसने ग्राहकों को खींचा अपनी ओर। तुरंत गाड़ियां सड़कों पर दिखने लगींजैसा नुकसान शुरुआत में फोक्सवागन पोलो को हुआजिसकी डिलिवरी में कई हफ़्ते लग रहे थे। जबकि हम सबको पता है कि हम भारतीय ग्राहक जब तक सड़कों पर ढेर सारी कार नहीं देखतेनई कार पर हमारा भरोसा ज़्यादा नहीं होता। भारतीय सड़कों पर लाख से ऊपर फ़ीगो उतर चुकी है।

ख़ैर ये तो दो पहलू हो गए। लेकिन इसके बाद की कहानी भी दिलचस्प है। फ़ोर्डजिसने फ़ीगो के वक्त कई दांव खेले थे और सभी लगभग सही पड़े थे वो ही पलट गई अपने स्टैंड से। नई फ़िएस्टा जो फ़ोर्ड ने लौंच की वो हो गई है अपने सेगमेंट की सबसे मंहगी कार। बेस वेरिएंट की क़ीमतलाख 23 हज़ार से शुरु होती है और टॉप वेरिएंट की क़ीमत 10 लाख 42 हज़ार रु तक जाती है। अब ये क़ीमत कई मामलों में चौंकाने वाली है।
एक वजह तो ये कि फ़ीगो को देखते हुए लग रहा था कि फ़ोर्ड की रणनीति बदल चुकी है भारत में। वो ग्राहकों को पैसा वसूल कार देने का मूड बना चुकी हैऔर फ़ीगो के साथ वो इमेज पक्का भी हुआ थाऔर बिक्री भी ज़ोरदार मिली थी। लेकिन फ़िएस्टा के साथ कंपनी नए रास्ते पर निकल गई है।
दूसरी वजह इस सेगमेंट में होने वाली उथल-पुथल है। एक तो दशक भर से नंबर एक हौंडा सिटी को पछाड़ा वेंटो नेएसएक्स आई डीज़ल अवतार में। इन सबको हिला दिया ह्युंडै की नई वर्ना ने । 20 हज़ार बुकिंग के साथ। फिर हौंडा का बंपर दांव आयासिटी की क़ीमत में66 हज़ार रु तक की कटौती। यानि सेगमेंट का पूरा खेल बदल चुका हैऊपर से कार बाज़ार में मंदी आ गई।
और इस सब बैकग्राउंड में फ़ोर्ड का ये दांव थोड़ा अटपटा लग रहा है। भले ही नई फ़िएस्टा पहले ख़ूबसूरत होकाइनेटिक डिज़ाइन इसे आकर्षक और आक्रामक बनाता हो। कई ऐसे फ़ीचर्स हों जो इस सेगमेंट में पहली बार आए हों। जिसमें सबसे दिलचस्प है इसका वॉयस कंट्रोल फ़ीचर। जिससे आप सिर्फ़ आवाज़ देकर कार के म्यूज़िक सिस्टमफोन एसी वगैरह को कंट्रोल कर सकते हैं। कार में जगह ठीक-ठाक है और चलने में तो मज़ेदार है ही। लेकिन इन सबके बावजूद क्या नई फ़िएस्टा की बिक्री फ़ैंटास्टिक हो पाएगी फ़ोर्ड के लिए। अभी के माहौल में मेरे मन में थोड़ा शक है।
(प्रभात ख़बर में पब्लिश्ड)

September 06, 2011

Razor Sharp आफ़ रोडिंग !

आप तो वहीं हैं ना जो टीवी पर माइलेज बताते रहते हैं...आपके बताने पर ही  मैंने स्कौर्पियो  ली थी लेकिन मज़ा नहीं आ रहा...और ये लाइन मुझे टेंशन देने के लिए काफ़ी होता, पहले भी बातों के ऐसे थप्पड़ खा चुका था मैं । लेकिन आज नहीं क्योंकि आज मैं कुछ बहुत ही दिलचस्प सवारियों के साथ खड़ा था, जिसे देखकर ही वो सज्जन बीच सड़क पर गाड़ी रोककर मैदान में उतरे थे। वो सवारियां जो शौकीनों की सवारी का अगला लेवल है। ये हैं पोलैरिस की ऑफ़ रोडिंग सवारियां। 


ऑफ़ रोडिंग का मतलब तो साफ़ है कि रोड से हटके। यानि उन जगहों के लिए जहां सड़कें नहीं बनी हैं, ऊबड़-खाबड़ जंगली रास्ते, मुश्किल बर्फ़ीले रास्ते। ये कौंसेप्ट हमारे लिए थोड़ा एलियन है, या कहें कि इस पर कभी ज़्यादा ध्यान हमने दिया नहीं। भले ही अब भारत की सड़कों का एक बड़ा हिस्सा, बनावट और समतल होने के मामले में  दुनिया भर बड़े देशों की बराबरी करता हो लेकिन उन हाईवे से बाहर जो सड़क निकल कर आती है, वो ऑफ़रोडिंग से कम नहीं, जहां पर हमारी आपकी सस्ती-टिकाऊ गाड़ियां तो चल ही जाती हैं, तो ऐसे में ऐसे कौंसेप्ट के बारे में हम क्यों सोचेंगे। ख़ैर मेरे जैसों को तो ज़रूरत भी नहीं। हां विदेशियों की ज़रूरतें अलग होती हैं, लाइफ़स्टाइल अलग होता है, जिसके लिए उन्होंने ये बाइक्स और गाड़ियां तैयार कीं। खेतों में काम करने के लिए, रेत में जाने के लिए, बर्फ़ पर चलने के लिए, जंगली रास्तों पर तेज़ भागने के लिए और आर्मी के इस्तेमाल के लिए। 
बड़े-बड़े चौड़े पहिए जो कीचड़ से लेकर रेत में पकड़ बनाए रखे, हल्की बॉडी जो किसी भी मुश्किल हालत में बोझ ना बने इंजिन के लिए, मज़बूत सस्पेंशन जो तमाम तरीके की उछल-कूद को बर्दाश्त कर सके। और ऊपर से इंजिन जिसकी प्राथमिकता, मुश्किल से मुश्किल रास्तों में बेहतर पावर और टॉर्क देने की है माइलेज नहीं। 
जैसे एटीवी, ऑल टेरेन वेह्किल जिसे कहते हैं क्वाड बाइक भी। वो इसलिए क्योंकि ये चार पहियों की बाइक होती है, हैंडिल के साथ।  रेत, मिट्टी, पत्थर पर आराम से भागती है। इसके कई वर्ज़न भारत में लौंच हुए हैं।
वहीं रेंजर गाड़ियां होती हैं, स्टीयरिंग व्हील के साथ, दो लोगों के साथ, सामान रखने के लिए जगह के साथ। इसके भी कई अवतार आए हैं। 
साथ में आई हैं स्नो-मोबील। अब ये उन देशों के लिए बहुत ज़रूरी हैं जहां साल के ज़्यादातर हिस्से में बर्फ़ जमी होती है। बर्फ़ पर कोई भी सवारी चलाना हमेशा से बहुत पेचीदा काम रहा है, ऐसे में ये सवारियां बहुत काम में आती हैं। 
वैसे है तो ये शौकीनों के शौकीन के लिए। जहां पर इनका ना तो रजिस्ट्रेशन होता है और ना ही लाइसेंस की ज़रूरत होती है, आम सड़कों पर इन्हें चला भी नहीं सकते हैं। और इन सबका मतलब ये कि आप इन्हें भगा सकते हैं, अपने प्राइवेट फ़ार्महाउस में या किसी रिज़ॉर्ट में । 
या आप वो न्यू एज किसान हो, जैसे वो भाई जो इस कॉलम की शुरूआत में मिला था। करोड़ों की ज़मीन का मालिक जो अपनी खेतीबाड़ी के सुपरवाइज़री के लिए पसंद कर सकता है ये एटीवी। 
ये गाड़ियां फ़िलहाल भारत में कुछ रिज़ॉर्ट्स और प्राइवेट फ़ार्म हाउसों में देखने को मिलती हैं।  और उसी चुनिंदा ग्राहकों के लिए पोलैरिस भारत आई है। और आई है कुछ नए ग्राहक बनाने के लिए भी। क्योंकि कंपनी ने ऐलान किया है कि अगले 3-5 सालों में कंपनी भारत में असेंबली प्लांट लगाएगी, और आरएंडडी सेंटर भी खोलेगी। इन सबका मतलब ये कि फ़िलहाल जो सवारियां 2 से लेकर 20 लाख रु की लौंच हुई हैं, वो सस्ती भी हो जाएंगी। तब हो सकता है कि मैं ख़रीद लूं ऐसी सवारी , जिसे अपने गांव ले जा सकूं। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक मैं याद करूंगा अपनी इसी राइड को जो मैंने की थी। ख़ासकर RZR की, जिसे लेकर मैं मिट्टी और कीचड़ में भागा था । कितना मज़ा आया था ये बयान करने के लिए मेरे पास फ़ौंट नहीं है इस कंप्यूटर में :) 


(Published in Prabhat Khabar)


September 05, 2011

खेलेंगे G(55) जान से ....



पहले मज़ाक में कहते थे लेकिन आज की ये सच्चाई है। केवल भारत की नहीं, दुनिया भर  के लोग अब यही पूछ रहे हैं। कितना माइलेज देती है - जिस सवाल से हम हिंदुस्तानी हर गाड़ी को दागते हैं। मारुति ने तो ऐड की पूरी सीरीज़ चला दी इसी सोच के साथ और मुझे तो वो पसंद है ही, मुझे यकीन है आपमें से ज़्यादातर को वो ऐड मज़ेदार लगे ही होंगे जिसमें से एक विजय माल्या की तरह दीखने वाला मालदार इंसान, एक लग्ज़री यॉट ख़रीदने आया है और वो पूछता है कि -कितना देती है, या फिर वो आर्मी जनरल जो रशियन टैंक के माइलेज के बारे में पूछता है कि कितना देती है। कुल मिलाकर ये सच्चाई मान ली गई है कि हम हिंदुस्तानी हर चीज़ में वैल्यू देखते हैं, वो वैल्यू पैसा-वसूल फ़ैक्टर हो सकता है या फिर ब्रांड और लोगो हो। और ये सवाल हर पहलू को कवर करता है। मारुति 800 से लेकर रोल्स रॉयस तक के लिए। 
वैसे ही अमेरिकी ग्राहकों के बारे में ये मानी हुई सच्चाई है कि उन्हें छोटी चीज़ें तो पसंद ही नहीं। यहां तक कि चॉकलेट और बर्गर के साइज़ भी ऐसे होते हैं कि उनमें से एक का नाम है डेथ बाई चॉकलेट । और यही पसंग लागू होती है कारों के मामले में भी। वो तो हाल की तेल क़ीमतों और रिसेशन ने उनका मूड बदला है और अब वो भी छोटी किफ़ायती कारों की ओर आ रहे हैं। नहीं तो हाल हाल तक भीमकाय एसयूवी को छोड़ने में अमेरिकियों के दिल के हज़ारों टुकड़े हो रहे थे, भले ही एक-एक गाड़ी ऐसी जो पूरा तेल का कुआं पी जाए। 
जो हाल अमेरिका का था वही आजकल चीन का हो गया है। चीनी ग्राहक भी अब बड़ी बड़ी गाड़ियों के ज़बर्दस्त फ़ैन हो गए हैं। स्पोर्ट्स यूटिलिटी वेह्किल से लेकर लग्ज़री गाड़ियां तक । जैसे मर्सेडीज़ ने दिलचस्प आंकड़ा दिया कि वहां पर कंपनी की बिक्री एक उल्टे पिरामिड की तरह है। यहां पर मर्सेडीज़ की सबसे मंहगी कारें, सबसे ज़्यादा बिक रही हैं और सबसे सस्ती मर्सेडीज़ सबसे कम। और केवल एक नहीं लगभग सभी बड़ी कार कंपनियों के डिज़ाइनर इसी सोच के साथ काम कर रहे हैं कि दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते  इस बाज़ार के ग्राहकों के लिए सबसे अहम है साइज़ । 

लेकिन आज की ये बातचीत कहां से शुरू हुई। दरअसल हाल ही में मैंने चलाई एक बहुत ही दिलचस्प एसयूवी। जिसका नाम है मर्सेडीज़ G -55 AMG । भारत में ये करोड़ रुपए से थोड़ी मंहगी है। 
एक बहुत ही दिलचस्प एसयूवी। दिखने में आपको पुराने ज़माने की जीप जैसी लगेगी, बनावट, डिज़ाइन और सीट के मामले में। शेप की बात करें तो हो सकता है बोलेरो की याद आए। लेकिन सिर्फ यहीं तक। आगे के आंकड़ें इसके कुछ ज़्यादा ही धमाकेदार हैं । साढ़े पांच लीटर का इंजिन जिसकी ताक़त है 507 हॉर्सपावर की। और जब ये स्टार्ट होती है तो लगता है सड़क को रौंदने वाली है। और जब इसे ड्राइव करना शुरू किया तो लगा कि कोई और ही आत्मा घुस आई है इस रेट्रो सी दीखने वाली जीपनुमा एसयूवी में । ख़ैर इसे लेकर दौड़ाने में ख़ूब मज़ा तो आया क्योंकि इसकी हैंडलिंग आम एएमजी कारों की तरह नहीं है, इसलिए मोड़ने के दौरान इसके पहिए ऑस्ट्रिया के सेल्फेल्डेन के उस वादी में हल्ला मचा रहे थे। लेकिन असल मज़ा आया सड़कों पर। जहां पर भले ही बहुत तेज़ ना चलाया हो लेकिन इसकी आवाज़ ने अचानक मुझे ख़ास बना दिया। और लुक ने लोगों की नज़रें घुमा दीं। ताक़त ऐसी जो माहौल को हिला दे। 
और ऐसे ही वक्त में साथ  में मौजूद मर्सेडीज़ के इंजीनियर ने बताया कि ये गाड़ी कुछ ख़ास ग्राहकों की पसंदीदा गाड़ी हैं। शेख़ों की। वो ग्राहक ऐसे होते हैं जो केवल गाड़ी की साइज़ के ऊपर फ़ैसला नहीं लेते। खाड़ी के देशों के सुपर-रिच को सुपर गाड़ियां ही पसंद आती हैं, जिनकी क़ीमत को ख़ास होती है , साथ में ताक़त के ऊपर भी उनका काफ़ी ज़ोर होता है।  रफ़्तार, ताक़त और सबसे ख़ास एक्सक्लूसिविटी। जिसे वो शान से निकले बुर्ज-अल-अरब की तरफ़। 
कहने का मतलब कि गाड़ियों में पसंद के मामले में भी हर देश के ग्राहकों का एक ख़ास धर्म होता है। जिस पर तमाम आर्थिक और सामाजिक बदलावों का असर पड़ता रहता है। और गाड़ियां केवल अपने ड्राइवरों के बारे में बयान नहीं देतीं, वो उस देश, समाज और वक्त के बारे में भी बहुत कुछ कहती हैं।

(प्रभात ख़बर में पब्लिश्ड)

September 04, 2011

Good (and Fast) things..छोटे पैकेज में



वो लड़के भी मुझे याद हैं जो दिल्ली से सटे नौएडा-ग्रेटर नौएडा एक्सप्रेस-वे पर सुबह सुबह निकले थेकाफ़ी ख़ुश थे क्योंकि बहुत लंबे इंतज़ार के बाद उन्हें मिली थी एक सुपरबाइक चलाने के लिए। और शायद यही ख़ुशी और जोश था जिसके चलते इन लड़कों ने कई बेसिक बातें नज़रअंदाज़ कर दींजो किसी के लिए भी जानलेवा साबित हो सकती हैं। और किसी भी ग़लती को माफ़ नहीं करने वाली,तीन -साढ़े तीन सेकेंड में से 100 की रफ़्तार पकड़ने वाली सुपरबाइक्स बाइक्स दरअसल क्या पाठ पढ़ाती हैंवो पढ़ने के लिए दोनों लड़के बच नहीं पाए। एक्स्प्रेसवे के एक मोड़ पर वो बाइक को संतुलित नहीं कर पाए और रफ़्तार इतनी ज़्यादा थी कि कोई गुंजाइश नहीं रही और दोनों ने अपनी जान गंवा दी।
वो लड़का भी याद है जिसके पिताजी आए थे एक बड़ी बाइक के शोरूम में। और अपने अभी अभी लाइसेंस पाए बेटे के लिए एक सुपरबाइक फ़ाइनल कर रहे थे।
और ऐसे सभी मामलों में मुझे हमेशा कमी खलती थी ऐसी मोटरसाइकिलों की जो नए राइडरोंयंगस्टर्स के लिए एक ऐसा विकल्प हो जो ताक़तवर बाइक्स चलाने का शौक रखने वालों के लिए स्पोर्ट्स बाइक हो और बड़ी बाइकसुपर स्पोर्ट्स कैटगरी की मोटरसाइकिलों के लिए प्राइमरी स्कूल साबित हो। यानि वो स्पोर्ट्सबाइक जो ख़ूब पावरफ़ुल हो लेकिन इतनी ज़्यादा नहीं कि आम बाइकर्स को उन्हें संभालना मुमकिन ना हो। अब तक हमें जैसे बाइक्स की आदत नहीं उसकी रफ़्तार को हम समझ सकें। कैसे भागती हैकैसे मुड़ती है और कैसे रुकती है। अभी तक हो ये रहा कि भारत में आमतौर पर 100-150 सीसी की बाइक्स बन रही थीं और इंपोर्टेड बाइक्स के मामले में सिर्फ़ उन बाइक्स पर छूट जिनमें 800 सीसी से बड़ा इंजिन लगा होनहीं तो इससे छोटी बाइक्स को इंपोर्ट करने पर क़ीमत दुगने से ज़्यादा।
तो ज़रूरत ये थी कि बीच की दूरी या कहें कि वैक्यूम को ख़त्म करने की ज़रूरत हैभारतीय बाइक मार्केट में। सौ और हज़ार के बीच के वैक्यूम को।
ऐसे में हाल में आई दो तीन बाइक्स भारत में बाइकिंग और बाइकर्स को एक नए रास्ते पर ले जा सकती हैं। जिनमें हौंडा की सीबीआर 250 तो है हीजो आई है 250 सीसी के इंजिन और डेढ़ से पौने दो लाख रु के एक्स शोरूम क़ीमत के साथवहीं हाल में आई है नई ह्योसंग की जीटी 650आरऔर इसकी क़ीमत पौने पांच लाख रु की है। ह्योसंग आई है भारत कई साल बादपहले आई थी 250 सीसी बाइक्स लेकर । तो नई 650 सीसी की स्पोर्ट्स बाइक के पीछे कंपनी को लग रहा था कि बाज़ार बिल्कुल रफ़्तार पकड़ने वाला है। लेकिन यहीं पर एंट्री हो गई है एक बिल्कुल नई बाइक की जिसका इंतज़ार लंबा हो चुका था। नई कावासाकी निंजा 650। भारत में बजाज के साथ साझेदारी के ज़रिए कावासाकी पहले भी 250 सीसी की निंजा ला चुकी है। और अब इस 650 सीसी की निंजा के साथ ज़रूर हलचल मचाएगी।
नई निंजा 650 में लगे 650 सीसी इंजिन से ताक़त मिलती है 72 बीएचपी की और ये अपने सेगमेंट में सबसे नामी स्पोर्ट्सबाइक में से एक है। और भारत में इस बाइक की क़ीमत रखी गई है लाख 57 हज़ार रु। और ये क़ीमत ऐसी है जो बजाज-कावासाकी को ख़ुश और ह्योसंग-हार्ली डेविडसन को नाख़ुश कर सकती है। भले ही साढ़े चार लाख रु की क़ीमत ज़्यादा लग रही होलेकिन ग्राहकों और बाइकरों का एक ख़ास तबका है जो इंतज़ार कर रहा है छोटी स्पोर्ट्सबाइक का। और जैसे जैसे ये सेगमेंट बढ़ेगा,यानि छोटी सुपरबाइक्स की संख्या बढ़ेगी भारतीय मोटरसाइकिलिंग की दुनिया और मैच्योर होगी।

(प्रभात ख़बर में पब्लिश्ड)

मुझको भी तो Swift करा दो !


बड़ी दुविधा में कि लिखूं या नहीं, उस कार के बारे में जिसके बारे में पहले भी लिखा है, जिसके बारे में बहुत कुछ बोल चुका हूं, या उस पोलारिस एटीवी के बारे में जो जल्द भारत में लौंच होने वाली है, दिखने में दिलचस्प है, भारत के लिए कौंसेप्ट नया है और लगा कि दिलचस्पी ज़्यादा होगी इस सवारी को लेकर। अगर आमतौर पर थोड़े से बदलाव के साथ स्विफ़्ट आ जाती तो फिर दुविधा नहीं होती। लेकिन कार की क़ीमत और बुकिंग होने वाली स्विफ़्ट की संख्या ने कोई विकल्प नहीं छोड़ा है। 4 लाख 22 हज़ार से शुरू होकर नई स्विफ़्ट की क़ीमत 6 लाख 38 हज़ार रु तक जाती है। जिसमें पेट्रोल और डीज़ल दोनों विकल्प शामिल हैं। और ऊपर से जिस दिन कार का ऑफ़िशियल लौंच था, उस दिन तक देश भर में 50 हज़ार स्विफ़्ट बुक हो चुकी थी। 
तो इसका मतलब साफ़ है कि क़ीमत अभी भी काफ़ी आक्रामक है और इतनी बारी बुकिंग के बावजूद स्विफ़्ट बहुत जल्द नहीं मिलने वाली है। हालांकि लौंच से पहले ही कंपनी ने साफ़ कर दी थीं कोशिशें वेटिंग पीरिएड घटाने की। 15-18 हज़ार के आसपास डीज़ल इंजिन जो कंपनी एक्सपोर्ट कर रही थी सालाना उसे वो भारतीय बाज़ार के लिए रखने का ऐलान कर चुकी थी। अलग अलग प्लांट के प्रोडक्ट में जोड़-घटाव करके महीने भर में कुल 18 हज़ार के आसपास स्विफ़्ट के प्रोडक्शन का दावा कर चुकी थी। लेकिन इस कार के लिए ग्राहकों की उत्सुकता ने शायद फ़िलहाल ये मुमकिन नहीं होने दिया है। अभी भी इंतज़ार तो रहेगा ही। 

मारुति स्विफ़्ट (पेट्रोल)
क़ीमत- 4.22 से 5.53 लाख रु  
1.2 लीटर इंजिन, 86 बीएचपी ताक़त 
माइलेज * 18.6 kmpl


मारुति स्विफ़्ट (डीज़ल) 
क़ीमत- 5.17 से 6.38 लाख रु  
1.3 लीटर इंजिन, 75 बीएचपी ताक़त 
माइलेज * 22.9 kmpl



इस  कार के लिए सबसे बड़ी चुनौती इसकी लोकप्रियता ही थी, जो ग्राहकों के खींच कर इसकी तरफ़ लाती थी। जुझारू ग्राहक इसके लिए इंतज़ार करते रहते थे और बाकी निकल जाते थे दूसरी कार शोरूम की तरफ़। और इसी माइग्रेशन को रोकने की कोशिश थी मारुति की । क्योंकि हाल फिलहाल में कार बाज़ार जैसे गोते खा रहा है वैसे में एक भी ग्राहक को खोना कोई भी नहीं चाहेगा। लेकिन अभी से ही कई हफ़्तों के इंतज़ार की ख़बर आने लगी है। 
चूंकि मेरी दुविधा थी कि इस कार के बारे में बहुत सारी बातें मैं लौंच से पहले ही बता चुका हूं, लेकिन कार ऐसी है तो उसके कुछ ख़ास पहलू पर नज़र डाल लेते हैं। जैसे सबसे पहले इसका प्लैटफ़ॉर्म , जिस पर कार दरअसल खड़ी होती है। नई स्विफ़्ट का प्लैटफ़ॉर्म नया है जिससे इस कार की लंबाई 90 एमएम बढ़ गई है। इससे पिछली सीट पर जगह अब थोड़ी बढ़ गई है। जो पिछले वर्ज़न स्विफ़्ट में मुझे एक बड़ी कमी लगती थी। अब पिछली सीट का माहौल थोड़ा खुला-खुला लगेगा। हालांकि मोटी बनावट वाली सीटें ना होती तो माहौल और खुला-खुला होता । 
वहीं कार के डैशबोर्ड में भी कई तब्दीलियां मिलेंगी। रंग-रूप बदला है । पहले से ज़्यादा गहरे रंग का डैशबोर्ड है, साथ में म्यूज़िक सिस्टम के किनारे मेटल का इस्तेमाल लुक को बहुत स्मार्ट बनाता है। कप होल्डर अब डैशबोर्ड से निकल कर आते हैं और म्यूज़िक सिस्टम को आप स्टीयरिंग पर लगे स्विच से कंट्रोल कर सकते हैं। 
अगर तकनीकी की बात करें तो पेट्रोल इंजिन नया है, जिसकी ताक़त 86 हॉर्सपावर की है। वहीं डीज़ल इंजिन पुराना ही है। दोनों ही अवतार में बेहतर माइलेज लेकर आई है मारुति। 
अंदर में बेशक कई बदलाव हैं, लेकिन बाहर से देखने में आपको बहुत नई नहीं लगेगी, हेडलैंप और टेललैंप में बदलाव किया गया है। जो थोड़ा रिफ्रेश्ड चेहरा मोहरा देते हैं नई स्विफ़्ट को। 
लेकिन मुझे इस कार के जिस पहलू ने सबसे इंप्रेस किया वो थी इसकी ड्राइव और हैंडलिंग। नए फ्रेम की वजह से नई स्विफ़्ट की ड्राइव कहीं बेहतर हुई है, पकड़ बढ़ी है और मोड़ते वक्त भी अब ये पहले से ज़्यादा भरोसा जगाती है। 
तो पहले से कहीं बेहतर पैकेज। 

(प्रभात ख़बर में प्रकाशित)