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January 11, 2015

मर्सेडीज़ जीएल

लग्ज़री एसयूवी सेगमेंट में मर्सेडीज़ की बड़ी कोशिश है जीएल क्लास में एएमजी अवतार। मर्सेडीज़ का पर्फोर्मेंस विंग है एएमजी, जिनकी कारें अब भारत में कई शहरों में दिखने लगी हैं। ये काफ़ी तेज़ तर्रार स्पोर्टी  कारें होती हैं जो अपने रेगुलर काउंटरपार्ट से काफ़ी ताक़तवर और तेज़ होती हैं, साथ में काफ़ी महंगी भी।
जैसे आम जीएल मिलती है लगभग 72 लाख की एक्स शोरूम क़ीमत के साथ वहीं नई जीएल 63 आई है 1 करोड़ 66 लाख रु की मुंबई एक्स शोरूम क़ीमत के साथ। तो क़ीमत जानने के बाद देखते हैं कि तेज़ तर्रार होने का दावा करने वाली जीएल 63 के आंकड़े क्या कहते हैं। तो इसमें लगा है 5.5 लीटर V8 BITURBO इंजिन, इससे ताक़त मिलती है लगभग साढ़े पांच सौ बीएचपी की और साथ में 760 एनएम का टॉर्क। और ये आंकड़ें पढ़ने में बहुत ज़ोरदार ना हो लेकिन सड़क पर ये बहुत धांसू कहे जाएंगे। वैसे तकनीकी तौर पर इसे सबसे ताक़तवर एसयूवी का ख़िताब तो मिलेगा ही। सौ की रफ़्तार पकड़ने में इसे लगेंगे पांच सेकेंड से भी कम, और टॉप स्पीड है 250 किमीप्रतिघंटा। तो इस कार में इस रफ़्तार के साथ सुरक्शा के भी कई इंतज़ाम हैं। तो फ़िलहाल इसके लौंच की जानकारी है।


*पुरानी छपी हुई है। 

December 21, 2014

गाड़ी शाही- सर्विस नहीं


भारत में लग्ज़री कारों की बिक्री कैसे बढ़ रही है ये किसी से छुपा नहीं है। सड़कों पर मर्सेडीज़, बीएमडब्ल्यू और ऑडी की संख्या इतनी बढ़ चुकी है कि एक वक्त में इन कंपनियों की हर कार को शाही कार मानने वाली सोच भी अब जाती नज़र आ रही है। और ना सिर्फ़ आम लोगों में ये सोच झलक रही है बल्कि ग्राहकों में भी। अब इन कारों के ग्राहक भी ख़ुद वैसा शाही महसूस नहीं कर रहे हैं।

पिछले एक साल में लग्ज़री कारों की बिक्री लगभग दुगनी बढ़ी है। 2013 में लगभग 16 हज़ार कारें बिकी थीं, वहीं इस साल 35 हज़ार से ऊपर कारें, ज़ाहिर है इस बढ़ोत्तरी का दबाव कंपनियों के डीलरशिप और वर्कशॉप पर भी दबाव बढ़ा है। और इस दबाव का असर ग्राहकों की संतुष्टि पर भी पड़ा है जिसे मापने का काम करती है जे डी पावर एशिया पेसिफिक। जिसके 2014 के लग्ज़री सेगमेंट के कस्टमर सर्विस इंडेक्स स्टडी में यही बातें सामने आई हैं। 

कंपनी ने लग्ज़री कारों के 257 ऐसे ग्राहकों से बात की, जिनमें एक से दो साल पुराने मर्सेडीज़, ऑडी और बीएमडब्ल्यू ग्राहक थे। स्टडी में पूछा गया कि सर्विस की क्वालिटी, गाड़ी के पिकप, सर्विस एडवाइज़र, सर्विस फेसिलिटी और सर्विस की शुरूआत से। इन सब पैमानों के लिए अलग अलग अंक दिए गए थे और सभी कंपनियों को कुल हज़ार प्वाइंट के स्केल पर मापा गया। और इस पैमाने पर पिछले साल के मुक़ाबले ग्राहकों कम संतुष्ट हैं। सर्विसिंग की शुरूआत और फेसिलिटी को लेकर ग्राहक सबसे नाख़ुश थे। जिन रेटिंग में पिछले साल के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा गिरावट दर्ज की गई।

इन सबका मतलब ये है कि ग्राहकों को सर्विसिंग के लिए अब पहले से ज़्यादा इंतज़ार करना पड़ता है। सर्विस होकर गाड़ी तैयार होने में भी वक्त ज़्यादा लगता है। ग्राहकों को इस देरी के बारे में सही जानकारी नहीं दी जाती।

इस स्टडी में नंबर एक पर मर्सेडीज़ रही, दूसरे पर बीएमडब्लूय और तीसरे पर ऑडी रही। 

*Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । कहीं ना कहीं छपी हुई है

July 06, 2014

ब्रांड भी थकते हैं...


ब्रिटिश चीज़ों को लेकर हिंदुस्तानियों का लगाव कुछ ज़्यादा ही है। अब चाहे इसे ग़ुलाम मानसिकता कहें, अभिजात्य वर्ग में ट्रांज़िशन का रास्ता कहें या फिर कुछ चीज़ें होती भी लगाव लायक। ऐसे में वो ब्रिटिश ना भी हों तो हमें हो सकता है वो अच्छी लगें। जैगुआर कारों के बारे ऐसी ही दुविधा मुझे लगती है। क्या ये ब्रिटिश है इसलिए हिंदुस्तानी इतने लगाव से इस ब्रांड को देखते हैं, क्या इसलिए क्योंकि दरअसल हिंदुस्तानी कंपनी टाटा ने जैगुआर लैंडरोवर को ख़रीद रखा है या फिर इसलिए क्योंकि ये कारें वाकई इतनी ख़ास और ख़ूबसूरत दिखती हैं। हो सकता है तीनों का कांबिनेशन हो, जो मुझे देखने को मिला ग्रेटर नौएडा के पास बनती सड़क किनारे खड़े नौजवानों से बात करके। जो जानते थे कि ये जैगुआर कार है, जानते थे कि कार के बोनट पर एक शेरनुमा कुछ निशान बना रहता है। और ये भी कि ये ऑडी बीएमडब्ल्यू से अलग टाइप की कार है।
तो इन सब नौजवानों और अपने सवालों से मिलने के बाद मैं निकला देखने कि जिस जैगुआर पर इतनी चर्चा हो रही थी वो दरअसल चलाने में थी कैसी और क्या ये सफल होगी उस कोशिश में जहां पर कंपनी यानि जैगुआर की नज़र है। 
ये जैगुआर एक्स एफ़ २.२ थी। जिसे चलाने निकला था और ज़ेहन में वही सवाल था कि इस सेगमेंट में जो पैमाना तीनों जर्मन कारों ने सेट किया है, जो आदत जर्मन कारों ने ग्राहकों को डाल दी, उसमें क्या कुछ नया करने की क्षमता है जैगुआर की। जिस कार को लेकर निकला वो २.२ लीटर डीज़ल इंजिन से लैस एक ऑटोमैटिक कार थी। इससे पहले इसमें ३ लीटर वाला विकल्प तो था लेकिन जैगुआर ने कोशिश की अपनी कार को छोटे इंजिन से लैस करके और क़ीमत को कम करके उन तीनों महारथियों से टक्कर लेने की जो इस सेगमेंट में राज कर रहे थे। मर्सेडीज़, बीएमडबल्यू और ऑडी। 
एक्स एफ़ मोटे तौर पर सबसे सस्ती जैगुआर कारें हैं भारत में जहां एक्स एफ़ फ़िलहाल तीन इंजिन विकल्पों के साथ मौजूद हैं। एक तो २ लीटर पेट्रोल इंजिन विकल्प है, २.२ लीटर डीज़ल इंजिन है और तीसरा ३ लीटर डीज़ल इंजिन विकल्प। 
जहां एक्सएफ़ पेट्रोल ४८.६ लाख की है वहीं एक्सएफ़ २.२ डीज़ल ४८.९ लाख रु की है। और ३ लीटर डीज़ल विकल्प सबसे महंगी ५४.९ लाख रु की है, और एक्सएफ़ २.२ 
के ज़रिए इसी प्राइस बैंड को कम करने की कोशिश की थी जैगुआर ने।
हालांकि छोटे इंजिन के बावजूद ताक़त और प्रदर्शन में कोई कमी नहीं कह सकते हैं। काफ़ी तेज़ तर्रार है, और हैंडलिंग के मामले में अपने सेगमेंट के मुताबिक प्रदर्शन ज़रूर करती है, हां स्पोर्ट्स कार जैसी नहीं कहेंगे स्टीयरिंग और सस्पेंशन के मामले में क्योंकि इसमें ज़्यादा तरजीह आराम को ही दिया गया है। तो जर्मन कारों की हैंडलिंग की आदत में ये थोड़ा अलग लगेगा, क्योंकि उनकी हैंडलिंग का स्तर थोड़ा ज़्यादा स्पोर्टी ज़रूर लगता है। लेकिन ये अलग मूड की कार है। और कार को अंदर से भी देखें तो मौजूदा विकल्पों के मुक़ाबले थो़ड़ा पुराना डिज़ाइन लगता है, बहुत हाईटेक नहीं लगेगा। फ़िनिश में एक शाही टच है लेकिन आजकल यंग होते ग्राहकों के लिए अपटूडेट लुक नहीं कहेंगे। लेकिन एक मुद्दा ये भी है कि जिनके पास पैसे हैं वो ख़र्च करने के लिए नया विकल्प ज़रूर ढूंढ रहे हैं, जर्मन ब्रांडों से एक तरह से थकान भी कह सकते है, ब्रांड भी थकते हैं, ऐसे में उनके लिए जैगुआर एक विकल्प हो सकती है। कार जो महंगी है, लेकिन ख़ूबसूरत भी हैं और ब्रांड भी ब्रिटिश है।

(Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । कहीं ना कहीं छपी हुई है)

May 01, 2013

तजुर्बा तो ज़रूरी है....

कुछ साल पहले तक...किसी भी सुपरबाइकर के साथ एक बात तो तय थी कि जब भी कोई उनकी बाइक को कोई छूए को वो तपाक से रोकते थे । कई बार गुस्से से भी। अपनी प्यारी मोटरसाइकिल पर एक उंगली का निशान भी उन्हें पसंद नहीं होता। साथ में ये भी मुद्दा था ही कि कुछ वक्त पहले तक उन मोटरसाइकिलों के पार्ट-पुर्ज़े काफ़ी मुश्किल से मिलते थे। तो चिंता ज़रूरी था। ऐसे में जब मोटरसाइकिल कंपनियां जब सुपरबाइक्स लाईं, और शोरूम पर उन्होंने डू-नॉट-टच का स्टिकर लगाया तो ज़्यादा लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ । लेकिन बात अटपटी ज़रूर थी, जब मैं देखता था कि स्कूली बच्चों का झुंड बाइक शोरूम के बाहर से लाखों रु की उन मोटरसाइकिलों को निहारते थे लेकिन नज़दीक से छू नहीं सकते थे। ये बात मुझे काफ़ी अटपटी लगती थी, ख़ासकर तब जब कंपनियां भारत में इस तरीके की सवारियों का भारत में बाज़ार ही खंगाल रही थीं। यहां पर बिक्री से ज़्यादा ज़रूरी था बाज़ार को बनाना। और मुझे बाद में लगा कि मैं बहुत ग़लत नहीं था। ग्राहक एक्सपीरिएंस की मांग करते हैं।
इसी पहलू पर एक नए लहजे में देखा हार्ले डेविडसन को जब कंपनी ने भारत में अपनी महंगी मोटरसाइकिलों को लौंच किया। कंपनी के शोरूम में बाइकप्रेमियों पर बहुत बंदिशें नहीं थीं । इसके अलावा कंपनी ने अपनी सवारियों को एक्सपीरिएंस करवाने के लिए कई तरीके की कोशिशें की। कंपनी का वैसे भी नाम मज़बूत था लेकिन इन सब कोशिशों के साथ, कंपनी ने आज की तारीख़ में भारत में भी एक मोटरसाइकिल कल्चर को अपने नाम किया है । ये सच्चाई तो है ही कि आने के दो साल में ही कंपनी ने दो हज़ार मोटरसाइकिलें बेच दी थीं, जो बाकी सुपरबाइक या प्रीमियम बाइक की बिक्री से कही ज़्यादा है।  हर वीकेंड पर देश के कई बड़े शहरों में बाइकर्स एक साथ निकलते हैं और बाइकिंग का मज़ा लेते हैं साथ वक्त गुज़ारते हैं।
मोटरसाइकिलों में तो सिर्फ़ इक्का दुक्का ऐसे उदाहरण हैं, कार कंपनियां इस मामले में कहीं आगे जा चुकी हैं। एक वक्त था जब घर पर मार्केटिंग के लिए धूप-अगरबत्ती और वाटर प्यूरिफ़ायर वाले आते थे। अब लाखों करोड़ों की कार कंपनियां शहर शहर घूम रही हैं, अपनी कारों को बेचने के लिए। भारतीय कार बाज़ार की दुर्गति निकली हुई है, ज़्यादातर कार निर्माता हिचकियां ले रहे हैं। कैसे कार बेचें इसकी तरकीबें सोच रहे हैं। कोई एक के साथ एक फ्री दे रहा है और कोई कार्ड स्क्रैच करने के लिए कह रहा है। ऐसे में लग्ज़री कार कंपनियां भी पीछे नहीं रह रही हैं । आज के दौर में इन कंपनियों ख़ासकर जर्मन कार कंपनियों को जिस आक्रामक मूड में देखा जा रहा है वो अब तक नहीं था। पारंपरिक प्रतिद्वंदी मर्सेडीज़, बीएमडब्ल्यू और ऑडी। ये कंपनियां एक दूसरे से रेस में लगी हैं जिसके लिए पूरे भारत में संभावित बाज़ार ढूंढ रही हैं। जहां पर शोरूम है वहां तो है ही, जहां नहीं है वहां भी कार बेचने की कोशिश ज़ोरदार है। सभी कंपनियां किसी ना किसी तरीके से उन सभी शहरों में अपनी कारों को लेकर पहुंच रही हैं जहां पर पैसे वाले ग्राहकों की संख्या बढ़ी मालूम चली है। और एक समय में संभ्रांत और एक्सक्लूसिव ब्रांड उस गुमान में नहीं दिखते जो कुछ साल पहले था। अब वो सभी ग्राहकों को अपने एक एक फ़ीचर को एक्सपीरिएंस कराने की कोशिश कर रही हैं।
जैसे मर्सेडीज़ और ऑडी अपने ग्राहकों के लिए कुछ अलग तरीके की कोशिश कर रही है। कंपनी ने अपनी कारों की ड्राइव और पर्फोर्मेंस की एक एक बारीकी समझाने के लिए ग्राहकों को रेस ट्रैक पर बुलाने लगे हैं। दोनो ही कंपनी ने कुछ हज़ार रु की फ़ीस लेकर अपनी स्पोर्ट्स कारों का तजुर्बा देने के  लिए प्रोग्राम शुरू किया है। जिन शहरों में रेस ट्रैक नहीं वहां पर ख़ास ट्रैक बना कर ।
कुछ कार कंपनी अपनी कारों के साथ छोटे छोटे ड्राइव भी आयोजित करती हैं। जहां पर पुराने ग्राहक अपनी फ़ैमिली के साथ आते हैं। कस्टमर के साथ ख़ास रिश्ता जोड़ने के साथ कंपनी की ब्रांड बिल्डिंग भी हो जाती है। महिंद्रा का ग्रेट एस्केप रैली ऐसी ही कोशिश है, जहां ग्राहक मुश्किल रास्तों पर अपनी एसयूवी दौड़ाते हैं। टाटा मोटर्स ने भी इसी तरह की कोशिश फ़ुल थ्रॉटल के नाम से शुरू कर रही है।
ऐसी कोशिशों के साथ ना सिर्फ़ ग्राहक बेहतर फ़ैसला कर पाते हैं, बल्कि कार कंपनियों के लिए भी फ़ायदे का सौदा होता है  जहां कई ग्राहक प्रभावित होकर कार ख़रीदने का फ़ैसला तुरंत कर लेते हैं। इसके अलावा ग्राहकों की जानकारी बढ़ती है, मोटरिंग का कल्चर बढ़ता है। सभी तरीके से फ़ाएदेमंद ही कहा जाएगा, जो कार कंपनियां ऐसा नहीं कर रही हैं उन्हें तुरंत शुरू करना चाहिए।


September 05, 2011

खेलेंगे G(55) जान से ....



पहले मज़ाक में कहते थे लेकिन आज की ये सच्चाई है। केवल भारत की नहीं, दुनिया भर  के लोग अब यही पूछ रहे हैं। कितना माइलेज देती है - जिस सवाल से हम हिंदुस्तानी हर गाड़ी को दागते हैं। मारुति ने तो ऐड की पूरी सीरीज़ चला दी इसी सोच के साथ और मुझे तो वो पसंद है ही, मुझे यकीन है आपमें से ज़्यादातर को वो ऐड मज़ेदार लगे ही होंगे जिसमें से एक विजय माल्या की तरह दीखने वाला मालदार इंसान, एक लग्ज़री यॉट ख़रीदने आया है और वो पूछता है कि -कितना देती है, या फिर वो आर्मी जनरल जो रशियन टैंक के माइलेज के बारे में पूछता है कि कितना देती है। कुल मिलाकर ये सच्चाई मान ली गई है कि हम हिंदुस्तानी हर चीज़ में वैल्यू देखते हैं, वो वैल्यू पैसा-वसूल फ़ैक्टर हो सकता है या फिर ब्रांड और लोगो हो। और ये सवाल हर पहलू को कवर करता है। मारुति 800 से लेकर रोल्स रॉयस तक के लिए। 
वैसे ही अमेरिकी ग्राहकों के बारे में ये मानी हुई सच्चाई है कि उन्हें छोटी चीज़ें तो पसंद ही नहीं। यहां तक कि चॉकलेट और बर्गर के साइज़ भी ऐसे होते हैं कि उनमें से एक का नाम है डेथ बाई चॉकलेट । और यही पसंग लागू होती है कारों के मामले में भी। वो तो हाल की तेल क़ीमतों और रिसेशन ने उनका मूड बदला है और अब वो भी छोटी किफ़ायती कारों की ओर आ रहे हैं। नहीं तो हाल हाल तक भीमकाय एसयूवी को छोड़ने में अमेरिकियों के दिल के हज़ारों टुकड़े हो रहे थे, भले ही एक-एक गाड़ी ऐसी जो पूरा तेल का कुआं पी जाए। 
जो हाल अमेरिका का था वही आजकल चीन का हो गया है। चीनी ग्राहक भी अब बड़ी बड़ी गाड़ियों के ज़बर्दस्त फ़ैन हो गए हैं। स्पोर्ट्स यूटिलिटी वेह्किल से लेकर लग्ज़री गाड़ियां तक । जैसे मर्सेडीज़ ने दिलचस्प आंकड़ा दिया कि वहां पर कंपनी की बिक्री एक उल्टे पिरामिड की तरह है। यहां पर मर्सेडीज़ की सबसे मंहगी कारें, सबसे ज़्यादा बिक रही हैं और सबसे सस्ती मर्सेडीज़ सबसे कम। और केवल एक नहीं लगभग सभी बड़ी कार कंपनियों के डिज़ाइनर इसी सोच के साथ काम कर रहे हैं कि दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते  इस बाज़ार के ग्राहकों के लिए सबसे अहम है साइज़ । 

लेकिन आज की ये बातचीत कहां से शुरू हुई। दरअसल हाल ही में मैंने चलाई एक बहुत ही दिलचस्प एसयूवी। जिसका नाम है मर्सेडीज़ G -55 AMG । भारत में ये करोड़ रुपए से थोड़ी मंहगी है। 
एक बहुत ही दिलचस्प एसयूवी। दिखने में आपको पुराने ज़माने की जीप जैसी लगेगी, बनावट, डिज़ाइन और सीट के मामले में। शेप की बात करें तो हो सकता है बोलेरो की याद आए। लेकिन सिर्फ यहीं तक। आगे के आंकड़ें इसके कुछ ज़्यादा ही धमाकेदार हैं । साढ़े पांच लीटर का इंजिन जिसकी ताक़त है 507 हॉर्सपावर की। और जब ये स्टार्ट होती है तो लगता है सड़क को रौंदने वाली है। और जब इसे ड्राइव करना शुरू किया तो लगा कि कोई और ही आत्मा घुस आई है इस रेट्रो सी दीखने वाली जीपनुमा एसयूवी में । ख़ैर इसे लेकर दौड़ाने में ख़ूब मज़ा तो आया क्योंकि इसकी हैंडलिंग आम एएमजी कारों की तरह नहीं है, इसलिए मोड़ने के दौरान इसके पहिए ऑस्ट्रिया के सेल्फेल्डेन के उस वादी में हल्ला मचा रहे थे। लेकिन असल मज़ा आया सड़कों पर। जहां पर भले ही बहुत तेज़ ना चलाया हो लेकिन इसकी आवाज़ ने अचानक मुझे ख़ास बना दिया। और लुक ने लोगों की नज़रें घुमा दीं। ताक़त ऐसी जो माहौल को हिला दे। 
और ऐसे ही वक्त में साथ  में मौजूद मर्सेडीज़ के इंजीनियर ने बताया कि ये गाड़ी कुछ ख़ास ग्राहकों की पसंदीदा गाड़ी हैं। शेख़ों की। वो ग्राहक ऐसे होते हैं जो केवल गाड़ी की साइज़ के ऊपर फ़ैसला नहीं लेते। खाड़ी के देशों के सुपर-रिच को सुपर गाड़ियां ही पसंद आती हैं, जिनकी क़ीमत को ख़ास होती है , साथ में ताक़त के ऊपर भी उनका काफ़ी ज़ोर होता है।  रफ़्तार, ताक़त और सबसे ख़ास एक्सक्लूसिविटी। जिसे वो शान से निकले बुर्ज-अल-अरब की तरफ़। 
कहने का मतलब कि गाड़ियों में पसंद के मामले में भी हर देश के ग्राहकों का एक ख़ास धर्म होता है। जिस पर तमाम आर्थिक और सामाजिक बदलावों का असर पड़ता रहता है। और गाड़ियां केवल अपने ड्राइवरों के बारे में बयान नहीं देतीं, वो उस देश, समाज और वक्त के बारे में भी बहुत कुछ कहती हैं।

(प्रभात ख़बर में पब्लिश्ड)