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November 05, 2012

Diavel या डेविल कहें ...


दिल्ली में मॉनसून की फ़िल्मी हीरो की तरह यादाश्त चली गई थी, जो अचानक तभी लौटी जब मुझे एक दमदार मोटरसाइकिल चलाने का बहुत दिनों के बाद मौक़ा मिल रहा था। और खटका लगा हुआ था कि कहीं बारिश तो नहीं हो जाएगी। तो सुबह पांच बजे से बादल के ऊपर टकटकी लगाए बैठा था। और फिर लगा कि चांस ले लिया जाए, इटैलियन डुकाटी की एक ऐसी मोटरसाइकिल के लिए जो मैंने आजतक नहीं चलाई थी। ऐसा नहीं कि बारिश में चला नहीं सकता था, लेकिन इस मोटरसाइकिल के लिए रिस्क लेना थोड़ा ज़्यादा हो जाता है। वो इसलिए क्योंकि इस मोटरसाइकिल की क़ीमत है मात्र पच्चीस लाख रु। इसका नाम है डियावेल, जिसमें वही दो पहिए और एक इंजिन लगा है, लेकिन क़ीमत इतनी कि लग्ज़री कारें भी फ़ेल हो जाएं। और जब क़ीमत के बारे में पता चल जाता है तो नज़रिया बदलना तो लाज़िमी है। ख़ैर, बादल के भरोसे पर निकला मैं इस मोटरसाइकिल को लेकर खुली सड़क पर।



दमखम के बारे में क्या बताऊं, सिर्फ़ ये कह सकता हूं कि काफ़ी है। 162 हॉर्सपावर की ताक़त आ रही है 1200 सीसी के इंजिन से। तुलना आप कर सकते हैं स्विफ़्ट के साथ। स्विफ़्ट में भी 1200 सीसी का इंजिन लगा है और उससे दुगनी ताक़त देने वाली और पांच गुना हल्की मोटरसाइकिल को चलाने का क्या रोमांच हो सकता है, इसका अंदाज़ा आप लगा सकते हैं। अगर नहीं तो बताने की कोशिश करता हूं। ऐक्सिलिरेटर को घुमाते ही ये मोटरसाइकिल हवा से बातें करने लगेगी, इतनी तेज़ आगे जाएगी कि लगेगा कि अगला पहिए अब अपनेआप हवा में उठने वाला है, अचानक बढ़ी रफ़्तार आपको मोटरसाइकिल से पीछे धकेल रही है और आमतौर पर जितने वक्त में हमें जो दूरी तय करने की आदत होती है उससे कहीं आगे हम कहीं जल्दी पहुंच जाते हैं। ये वो रफ़्तार होती है जिस पर चलने की हमें क्या किसी को भी आदत नहीं होती है, और अगर इस जोश में होश खो बैठे तो अनर्थ हो जाता है, और संभले रहे तो रोमांच का अलग एहसास होता है, कुछ वक्त के लिए दीन-दुनिया को आप भूल जाते हैं। एक पैरलल दुनिया होती है ये। लेकिन केवल डियावेल में ये ख़ूबी नहीं होती है, कई अच्छी सुपरबाइक्स आपको ये एहसास दिलाती हैं। तो फिर ऐसे में क्यों ऐसा है कि डियावेल की क़ीमत 25 लाख रु है।
सबसे पहले ये बता दूं कि इस मोटरसाइकिल के कई वेरिएंट हैं, जिनकी शुरूआत बीस लाख रु से शुरू होती है। जिस वेरिएंट को मैं चला रहा था वो डियावेल कार्बन कहलाती है, जिसमें कार्बन फ़ाइबर का काफ़ी इस्तेमाल है, वो 25 लाख रु की है। वो भी एक्स शो रूम क़ीमत। फ़ीचर्स कई सारे ऐसे हैं जिनके बारे में जानकर अचरज होगा। जैसे राइडिंग मोड, यानि अलग अलग तरह की राइड के लिए अलग मोड। सिर्फ़ एक बटन दबाइए और बाइक में लगा कंप्यूटर इंजिन से निकलने वाली ताक़त को कम या ज़्यादा कर देगा, 163 हॉर्सपावर को घटा कर 100 हॉर्सपावर कर देगा, या इसका उल्टा भी। हैंडलिंग को सख़्त या मुलायम कर देगा। शहरी माहौल के लिए अलग मोड, हाईवे के लिए अलग और तेज़ रफ़्तार सुपरबाइकिंग के लिए अलग। टंकी पर लगा छोटा सा डिस्प्ले वो सब जानकारी देगा जो कई महंगी कारें नहीं देती हैं। यहां तक की टायर में हवा का प्रेशर है कि नहीं। लगता है कि दो पहिए पर चलता फिरता ये कंप्यूटर ही है। लेकिन इन सब फ़ीचर्स के बावजूद भी मन में सवाल ज़रूर उठेगा कि इतनी ज़्यादा क़ीमत क्यों है... तो फिर याद कीजिए...इंपोर्ट करने पर इन गाड़ियों की क़ीमत कस्टम की वजह से दुगनी हो जाती है। तब जाकर इसकी क़ीमत का गणित सुलझता है।
बावजूद इस क़ीमत के ये मोटरसाइकिल भारत में बिकती है। साल में 30-40 का आंकड़ा है। जीहां भारत में ये मोटरसाइकिल भी बिक रही है।
((पुराना लिखा है, फ़ोटो देख रहा था बाइक की तो याद आई इसकी ))
www.twitter.com/krantindtv

July 21, 2012

छोटी Monster

वैसे गर्मी तो ऐसी है कि हिम्मत नहीं हो रही थी, लेकिन इस मोटरसाइकिल को चलाने के लिए इस गर्मी को झेलने में भी मुझे दो बार सोचना नहीं पड़ा। डुकाटी मॉन्सटर एक ऐसी मोटरसाइकिल है जिसने हमेशा से मुझे आकर्षित किया है। और इसी मोटरसाइकिल को चलाने का इंतज़ार मैं लंबे वक्त से कर रहा था। जनवरी में ही इस नई मॉन्सटर के भारत में एंट्री का ऐलान हो चुका था लेकिन इसे चलाने का मौक़ा नहीं बन पा रहा था। मलेशिया के रेसट्रैक पर इसे राइड करने का मौक़ा मैंने गंवा दिया था, जो बात लंबे वक्त से मुझे चुभ रही थी। ख़ैर मैंने काफ़ी धीरज से इस मोटरसाइकिल का इंतज़ार किया, और मौक़ा मिलते ही लपक लिया। दिल्ली से सटे नौएडा के एक्सप्रेसवे पर सूरज उगने से पहले ही पहुंच गया। लोग भी कम थे, चलाने में आसानी तो थी ही। लेकिन साथ में ये भी बुद्धि लगाई कि सूरज अपने पूरे शबाब पर पहुंचे उससे पहले इसकी राइड ख़त्म कर ली जाए। ये मत सोचिए कि ए सी के लत में जीने वाला इंसान हूं, दरअसल मोटरसाइकिलों को चलाने वाले जैकेट, हेलमेट और ग्लव्स हिंदुस्तानी मौसम के हिसाब से नहीं तैयार होते हैं इसलिए इन्हें पहन कर मोटरसाइकिल चलाना एक बड़ी चुनौती होती है। और अगर दुपहरी में यही लाव-लश्कर के साथ मोटरसाइकिल चलाता हूं तो मज़ा कम सज़ा ज़्यादा हो जाती है। वैसे आपको बता दूं कि सुबह सुबह सूरज निकलने से पहले किसी भी राइड पर निकलिए उसका मज़ा अलग ही होता है। और उम्मीद के मुताबिक ही, बल्कि उससे ज़्यादा ही मज़ा दिया मॉन्सटर की सवारी ने। इस मोटरसाइकिल के अलग वर्ज़न को मैंने पहले भी चलाया था लेकिन ये नई सवारी है। पुराने दो मोटरसाइकिलों को एक में मिला कर इसे तैयार किया गया है। सबसे छोटी डुकाटी का फ्रेम और पिछले मॉन्सटर का इंजिन लगा कर कंपनी ने एक नया दांव खेला है। आठ सौ सीसी का इंजिन जिसकी ताक़त 86 बीएचपी की है।

ये ताक़त ना सिर्फ़ काफ़ी लगी बल्कि रफ़्तार पकड़ने में वक्त भी नहीं लगाती । बड़ी मज़ेदारी लगी ये। और मैं कोई अकेला नहीं था, इस लाल चमचमाती मोटरसाइकिल को जिसने देखा वो मुस्कुराया। और हां किसी ने ये नहीं पूछा कि माइलेज क्या देती है...ये पूछा कि टॉप स्पीड कितनी है...

दरअसल विकसित देशों की क्या हालत है, उनकी अर्थव्यवस्था की क्या दुर्दशा है ये हमें पता ही है। ऐसे में सभी कंपनियां विकासशील देशों के बाज़ार में पकड़ बनाना चाहती हैं। इसी कोशिश का नतीजा है मॉन्सटर 795, जिसे तैयार किया गया है ख़ासतौर पर भारत और एशिया के उभरते मोटरसाइकिल बाज़ारों के लिए। डुकाटी एक ऐसी मोटरसाइकिल कंपनी रही है जो अपनी मोटरसाइकिलों के साथ साथ अपनी एक ख़ास ब्रांड के लिए जानी जाती है। एक प्रीमियम मोटरसाइकिल के तौर पर, जो आम बाइकप्रेमियों से लेकर हॉलीवुडिया एक्टरों की पसंद रही है। और इसी वजह से भारत में जब ये आई थी तो क़ीमत पंद्रह से पचास लाख रु के बीच थी। जीहां मोटरसाइकिलों की क़ीमत 50 लाख रु तक । लेकिन अब कंपनी को समझ में आ चुका है कि भारतीय ग्राहक केवल ब्रांड के नाम पर पटने वाले नहीं हैं। और ये डुकाटी की बिक्री से भी साफ़ था । अब कंपनी ने अपनी मोटरसाइकिलों के दाम कम भी किए हैं और मॉन्सटर 795 के साथ तो वो अलग ही खेल कर चुकी है। 6 लाख रु की एक्स शोरूम क़ीमत के साथ इसने ज़ोरदार चुनौती दी है। आप सोच सकते हैं कि ये क़ीमत ज़्यादा है लेकिन आपको बता दें कि केवल महेंद्र सिंह धोनी ही ऐसी बाइक नहीं ख़रीदते, इस क़ीमत पर मोटरसाइकिल ख़रीदने वालों की कमी नहीं। कंपनी ख़ुश है कि सवा सौ मॉनस्टर मोटरसाइकिलों की बुकिंग हो चुकी है और भविष्य उन्हें उज्जवल लग रहा है।




September 27, 2011

क्यों बदनाम होती है सिर्फ़ SUPERBIKE ???


न्यूज़ की दुनिया सालों गुज़ारने पर कई विडंबनाएं देखने को मिलती हैं, जिनमें से एक मौत भी है। कई बार ख़बरों की महत्ता तय होती है किसी दुर्घटना में मरने वालों की संख्या से या फिर सवारी से, यानि प्लेन क्रैश प्रायोरिटी, हेलिकॉप्टर क्रैश सेकेंड प्रायोरिटी फिर ट्रेन, बस वगैरह। लेकिन ये कोई थंबरूल नहीं है, परम सत्य नहीं है।
भारत में लगभग सवा लाख लोग अपनी जान सड़कों पर गंवा देते हैं। चलते हुए, साइकिल पर, बाइक पर या कारों में। लेकिन वो सिर्फ आंकड़ों में तब्दील हो जाते हैं, जहां पर किसी इंसान का चेहरा नहीं, कुछ नंबर दिखाई देते हैं। और ये नंबर भी दब जाते हैं अगर किसी प्लेन क्रैश में 6 लोगों के मरने की ख़बर आ जाए। यानि अंत के बाद भी इंसान फंसा रहता है क्लास स्ट्रगल में। यानि ये तो ज़ाहिर सी बात है कि प्लेन में उड़ने वाला कोई ना बैठा बड़ा आदमी ही होगा और लोगों को उसके बारे में जानने में ज़्यादा दिलचस्पी होगी, बजाय उस ऐटलस साइकिल पर चलने वाले अधेड़ आदमी के जो एनएच 24 पर ट्रक के नीचे आ गया है। लेकिन इस विडंबना का वास्ता सिर्फ़ क्लास डिफ़रेंस या समाजशास्त्र से है, ये अधूरी बात है। दरअसल इस दिलचस्पी की एक वजह स्वाभाविक इंसानी साइकोलजी भी है, जिसे सनसनीखेज़ रस कह सकते हैं। जब मौत की वजह से ज़्यादा बड़ा और सनसनीखेज़, मौत का तरीका हो जाता है। वो कितना क्रूर, नाटकीय रहा या वीभत्स रहा ये जानने की दबी सी उत्सुकता भी लोगों को इन ख़बरों की तरफ़ भी खींचती है। भूकंप और बाढ़ में हुई मौत एक त्रासदी होती है, सड़क हादसे किसी आम हिंदुस्तानी के मरने को उसका प्रारब्ध मान लिया जाता है लेकिन एरो शो में पायलट की मौत एक विज़ुअल घटना हो जाती है, अपने मंगेतर के साथ मिलकर एक प्रेमिका द्वारा अपने प्रेमी की हत्या एक ईवेंट बन जाता है। जहां मारे गए नीरज ग्रोवर के मौत के ज़िक्र से ज़्यादा बड़ी जिरह हो जाती है कि प्रेमिका ने उसके शरीर के कितने टुकड़े किए, जिस पर ज़्यादा रौशनी डालने के लिए राम गोपाल वर्मा को फ़िल्म बनानी पड़ती है (जिसका प्रोमो उसी दिन लौंच होता है जिस दिन केस का फ़ैसला आने वाला था)
कुल मिलाकर ऐसा ही कुछ होता है जब कहीं भी कोई सुपरबाइक क्रैश करती है। एक तो आम सोच में सुपरबाइक शब्द ही लार्जर देन लाइफ़ होता है, सुपर मैन की तरह सुपरबाइक। और साथ में उस रफ़्तार पर क्रैश जिसके बारे में ज़्यादातर पॉपूलेशन केवल कल्पना कर सकती है, क्योंकि ज़िदगी भर ज़मीन पर ऐसी रफ़्तार या ऐक्सिलिरेशन तो उन्होंने कभी महसूस नहीं किया होगा। और फिर शुद्ध भारतीय सवाल कि शौक के लिए कोई अपनी जान कैसे जोखिम में डाल सकता है ? हां, ब्लू लाइन के नीचे आना या मुंबई की लोकल से बाहर गिरना, या फिर बिजली से चलने वाली ट्रेन की छत से टपकना तो फिर भी मान्य है। इसीलिए जब सुपरबाइक्स गिरती हैं, सोशियोलॉजिस्ट जग जाते हैं, सेफ़्टी एक्सपर्ट आस्तीन चढ़ा लेते हैं और कंप्यूटर के कीबोर्ड घिसे जाने लगते हैं। बड़ी शिद्दत से एक ही कन्क्लूज़न निकाला जाता है कि सुपरबाइक्स बहुत ख़तरनाक हैं। और इस डिबेट में भी क्लास-चर्चा तो आ ही जाती है, क्योंकि अगर किसी दुपहिए की क़ीमत 12 से 15 लाख की हो तो फिर किसी ना किसी बड़े आदमी के बच्चे ने ही वो बाइक ख़रीदी होगी, ज़ाहिर है ऐसे चुनिंदा शौकीन पैसेवाले ही होंगे। और उस क्लास की रिपोर्टिंग तो लाज़िमी है।
ख़ैर इन ख़बरों पर कवरेज को लेकर जो भी प्रोब्लेम मुझे लगे लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पूरी हालत बुरी है। सुपरबाइक्स को लेकर हिंदुस्तान में किसी तरीके की कोई जागरुकता नहीं है। और ये सरकार से लेकर आम लोगों तक में है। जिस वजह से बिना जाने-समझे पहले तो सुपरबाइक भारत में लाए गए, फिर बेचे गए और अब आलोचना का शिकार हो रहे हैं। आख़िर क्या कमी रही है अब तक इस तरह के बाइक्स के कल्चर में, जिसे लाइफ़स्टाइल बाइकिंग भी कहते हैं...
सुपरबाइक्स के लिए कोई रेगुलर ट्रेनिंग की व्यवस्था भारत में नहीं है जिससे देश के सभी इलाके के राइडर सीख पाएं, सुपरबाइक चलाना। कुछ कंपनी दे रही हैं, लेकिन ये मोटरसाइकिलें क्रैश-कोर्स से नहीं सीखी जा सकती हैं...
भारत में सेफ़्टी को लेकर अब तक कोई कल्चर नहीं रहा है। दिल्ली में तो हेलमेट को लेकर एक कड़ाई देखी भी गई, देश के बाकी हिस्सों में हेलमेट तभी निकलते हैं जब कड़े ट्रैफिक कमिश्नर की पोस्टिंग होती है। और इन बड़ी बाइक्स के लिए बहुत ज़रूरी, ग्लव्स और राइडिंग गियर को तो भूल जाइए।
मां-बाप क्यों अपने बच्चों को बिना सेफ़्टी का संदेश दिए, मानो वो बच्चों के बंदूक दे रहे हैं, लेकिन ख़तरनाक बात ये कि ये खिलौना वाला नहीं असल गन है। केवल अफ़ोर्ड करना इकलौता क्राइटीरिया नहीं हो सकता है आपके गिफ़्ट के लिए। 

लेकिन इन सबके अलावा एक और मुद्दा है जो सबसे ख़तरनाक है। भारत में जो स्पोर्ट्स बाइक आईं वो सीधे 1000 सीसी वाली आईं। जिनकी आमतौर पर ताक़त 180 हॉर्सपावर के पास होती है। और ये इतनी तेज़ भागती है जिसका सही अंदाज़ा सालों के प्रैक्टिस के बाद ही हो सकता है। सरकार ने दरअसल 800 सीसी से ऊपर की मोटरसाइकिलों पर से कस्टम ड्यूटी कम किय था, अमेरिका को ख़ुश करने के लिए, जिससे हार्ली डेविडसन को भारत में आसान एंट्री मिले। होना ये चाहिए था कि 250 से 400 से 600 सीसी के इंजिन आते जिस पर बाइकर प्रैक्टिस कर पाते। लेकिन हुआ उल्टा पहले हज़ार सीसी की मोटरसाइकिलें आई हैं और बाद में 250 सीसी वाली। और अलग अलग स्टेज की बाइक्स चलाए बिना कई नौजवान सीधे बड़ी सुपरबाइक्स पर चढ़े, क्योंकि ज़्यादातक मां-बाप को भी नहीं पता था कि ये सुपरबाइक्स मज़ेदार तभी होती है, जब आपने इसे चलाना सीखा हो।
दुनिया के कई देशों में लाइसेंस इंजिन की क्षमता के हिसाब से मिलते हैं। यानि हौंडा ऐक्टिवा के लिए अलग लाइसेंस और हौंडा सीबीआर 1000 के लिए अलग लाइसेंस। लेकिन भारत में सरकार ने उन बाइक्स को आने की इजाज़त दे दी है, लेकिन लाइसेंस के सिस्टम में कोई बदलाव नहीं किया है।
कुल मिलाकर आम राइडर से लेकर उनके मां-बाप, बाइक कंपनियां औऱ सरकार सबकी सोच में एक बड़ा छेद है, और जब तक उसे भरा नहीं जाएगा, विरोधाभासों को दूर नहीं किया जाएगा, एक रोमांचक मशीन ग़लत मक़सद के लिए बदनाम होती रहेगी। लेकिन दिलचस्प सच्चाई ये है भी कि ऐसी दमदार मोटरसाइकिलें अपने सबसे एक्सट्रीम अवतार में होती हैं रेसों में। लेकिन मोटो जीपी या मोटरसाइकिल रेसिंग का पूरा पचास साल से ऊपर का इतिहास देखें तो वहां कुल 24-25 लोगों की मौत हुई होगी। जो नंबर के हिसाब से देखें तो बहुत कम है। वैसे भारत में भी नंबर तो बहुत कम हैं, वैसे भी साल में सौ सवा सौ सुपरबाइक बिक्री में क्या संख्या होगी, लेकिन ख़बरें धड़ाधड़ छपती हैं। असल दो सौ या तीन सौ की रफ़्तार पर होने वाली मौत लोगों को ज़्यादा चकित करती है, एक लीटर में सौ किमी चलने वाली मोटरसाइकिलों में लोगों को ग्लैमर नहीं नज़र आता है, और उन पर सवार लोगों का शरीर सिर्फ़ वस्त्र माना जाता है, जो फट सकता है, उनकी आत्मा तो कभी भी नष्ट नहीं हो सकती है। इसीलिए उनके अंत को इग्नोर किया जा सकता है।
*Published

September 04, 2011

Good (and Fast) things..छोटे पैकेज में



वो लड़के भी मुझे याद हैं जो दिल्ली से सटे नौएडा-ग्रेटर नौएडा एक्सप्रेस-वे पर सुबह सुबह निकले थेकाफ़ी ख़ुश थे क्योंकि बहुत लंबे इंतज़ार के बाद उन्हें मिली थी एक सुपरबाइक चलाने के लिए। और शायद यही ख़ुशी और जोश था जिसके चलते इन लड़कों ने कई बेसिक बातें नज़रअंदाज़ कर दींजो किसी के लिए भी जानलेवा साबित हो सकती हैं। और किसी भी ग़लती को माफ़ नहीं करने वाली,तीन -साढ़े तीन सेकेंड में से 100 की रफ़्तार पकड़ने वाली सुपरबाइक्स बाइक्स दरअसल क्या पाठ पढ़ाती हैंवो पढ़ने के लिए दोनों लड़के बच नहीं पाए। एक्स्प्रेसवे के एक मोड़ पर वो बाइक को संतुलित नहीं कर पाए और रफ़्तार इतनी ज़्यादा थी कि कोई गुंजाइश नहीं रही और दोनों ने अपनी जान गंवा दी।
वो लड़का भी याद है जिसके पिताजी आए थे एक बड़ी बाइक के शोरूम में। और अपने अभी अभी लाइसेंस पाए बेटे के लिए एक सुपरबाइक फ़ाइनल कर रहे थे।
और ऐसे सभी मामलों में मुझे हमेशा कमी खलती थी ऐसी मोटरसाइकिलों की जो नए राइडरोंयंगस्टर्स के लिए एक ऐसा विकल्प हो जो ताक़तवर बाइक्स चलाने का शौक रखने वालों के लिए स्पोर्ट्स बाइक हो और बड़ी बाइकसुपर स्पोर्ट्स कैटगरी की मोटरसाइकिलों के लिए प्राइमरी स्कूल साबित हो। यानि वो स्पोर्ट्सबाइक जो ख़ूब पावरफ़ुल हो लेकिन इतनी ज़्यादा नहीं कि आम बाइकर्स को उन्हें संभालना मुमकिन ना हो। अब तक हमें जैसे बाइक्स की आदत नहीं उसकी रफ़्तार को हम समझ सकें। कैसे भागती हैकैसे मुड़ती है और कैसे रुकती है। अभी तक हो ये रहा कि भारत में आमतौर पर 100-150 सीसी की बाइक्स बन रही थीं और इंपोर्टेड बाइक्स के मामले में सिर्फ़ उन बाइक्स पर छूट जिनमें 800 सीसी से बड़ा इंजिन लगा होनहीं तो इससे छोटी बाइक्स को इंपोर्ट करने पर क़ीमत दुगने से ज़्यादा।
तो ज़रूरत ये थी कि बीच की दूरी या कहें कि वैक्यूम को ख़त्म करने की ज़रूरत हैभारतीय बाइक मार्केट में। सौ और हज़ार के बीच के वैक्यूम को।
ऐसे में हाल में आई दो तीन बाइक्स भारत में बाइकिंग और बाइकर्स को एक नए रास्ते पर ले जा सकती हैं। जिनमें हौंडा की सीबीआर 250 तो है हीजो आई है 250 सीसी के इंजिन और डेढ़ से पौने दो लाख रु के एक्स शोरूम क़ीमत के साथवहीं हाल में आई है नई ह्योसंग की जीटी 650आरऔर इसकी क़ीमत पौने पांच लाख रु की है। ह्योसंग आई है भारत कई साल बादपहले आई थी 250 सीसी बाइक्स लेकर । तो नई 650 सीसी की स्पोर्ट्स बाइक के पीछे कंपनी को लग रहा था कि बाज़ार बिल्कुल रफ़्तार पकड़ने वाला है। लेकिन यहीं पर एंट्री हो गई है एक बिल्कुल नई बाइक की जिसका इंतज़ार लंबा हो चुका था। नई कावासाकी निंजा 650। भारत में बजाज के साथ साझेदारी के ज़रिए कावासाकी पहले भी 250 सीसी की निंजा ला चुकी है। और अब इस 650 सीसी की निंजा के साथ ज़रूर हलचल मचाएगी।
नई निंजा 650 में लगे 650 सीसी इंजिन से ताक़त मिलती है 72 बीएचपी की और ये अपने सेगमेंट में सबसे नामी स्पोर्ट्सबाइक में से एक है। और भारत में इस बाइक की क़ीमत रखी गई है लाख 57 हज़ार रु। और ये क़ीमत ऐसी है जो बजाज-कावासाकी को ख़ुश और ह्योसंग-हार्ली डेविडसन को नाख़ुश कर सकती है। भले ही साढ़े चार लाख रु की क़ीमत ज़्यादा लग रही होलेकिन ग्राहकों और बाइकरों का एक ख़ास तबका है जो इंतज़ार कर रहा है छोटी स्पोर्ट्सबाइक का। और जैसे जैसे ये सेगमेंट बढ़ेगा,यानि छोटी सुपरबाइक्स की संख्या बढ़ेगी भारतीय मोटरसाइकिलिंग की दुनिया और मैच्योर होगी।

(प्रभात ख़बर में पब्लिश्ड)