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December 31, 2014

इमोशनल अपील


आज का वक्त ऐसा आ गया है जब कारों और मोटरसाइकिलें बहुत हद तक एक जैसे हो गए हैं। अगर तकनीकी और आंकड़ों के हिसाब से देखें तो बहुत हद तक मिलते जुलते। जैसे किसी एक सेगमेंट को ले लीजिए, तो वहां पर इंजिन की क्षमता, बीएचपी से लेकर गाड़ी की माइलेज वगैरह एक जैसे ही नज़र आएंगे। अंतर होगा, लेकिन मामूली। ऐसा नहीं जो क्रांतिकारी हो और आपके ख़रीद के फ़ैसले को बदल दे, या फिर यूएसपी बन जाए। कुछेक ही प्रोडक्ट आजकल ऐसे होते हैं जिनके पास ऐसे एक्सक्लूसिव फ़ीचर्स होते हैं और वो फ़ीचर्स भी जल्द बाकी कंपनियां ले आती हैं। ऐसे में हम कोई प्रोडक्ट क्यों ख़रीदते हैं इस फ़ैसले को किसी नंबर और मीटर पर  नापना बहुत आसान या सीधा काम नहीं है। इसमें काफ़ी हद मार्केटिंग और ब्रांडिंग की चाशनी फैली रहती है और बहुत हद तक इन सबके नतीजतन हमारा फ़ैसला इमोशनल भी हो जाता है। अपने आसपास किसी से भी पूछिए तो जड़ में जो वजहें आती हैं वो कई बार आती हैं जिसे क़ीमत या बीएचपी में समझना मुश्किल है। बहुत हद तक फ़ैसला आ जाता है उसी प्वाइंट पर कि कार को देख कर हम कैसा महसूस कर रहे हैं, गाड़ी के साथ क्या महसूस कर रहे हैं। तो वही बात कि सवारियों की ख़रीदारी में जहां समझदारी का रोल होता है बहुत सा हिस्सा उसकी अपील से जुड़ा भी होता है। ख़ैर ये सब मैं सोच रहा था जब ऑडी की एक कार चलाने का हाल में मौक़ा आया था। और ये सोच इसलिए आ रही थी, क्योंकि मैं सोच रहा था कि इसे चलाने की मुझे ज़्यादा इच्छा क्यों नहीं हई थी अब तक। और इसके पीछे कोई ठोस लॉजिक वाली वजह नहीं थी। ऑडी की टीटी कूपे। दो दरवाज़ों वाली छोटी स्पोर्टी कार जो मुख्य तौर पर स्पोर्टी छोटी कार के तौर पर आती है। हाल में इसके नए किट यानि एस लाइन कही जाने वाले किट की वजह से ऑडी चाहती थी कि मैं इसे चला कर देखूं कि कैसा है ये नया पैकेज। और ये भी समझूं कि कैसा प्रदर्शन होता है इसका। कितनी रोमांचक है ये कार। ऑडी टीटी को अगर देखें पहली नज़र में बहुत अलग सी कार लगेगी, छोटी स्पोर्ट्स कार तो लगेगी ही, क्योंकि है तो टू सीटर ही, पीछे दो सीटें को बस ख़ानापूर्ती के लिए ही हैं। इस छोटे आकार के साथ जो चीज़ सबसे पहले आपके ज़ेहन में जाएगी वो है इसकी बनावट, इसका लाइन। ये किसी भी एंगिल से शार्प या तीखी बनावट वाली कार नहीं लगेगी। हेडलैंप से लेकर टेललैंप तक, छत से लेकर बंपर तक, सबकुछ गोलाई लिए है। जो मेरे पसंद का नहीं है, हालांकि ढेरों कार प्रेमी हैं जिन्हें ये पसंद है डिज़ाइन। ख़ैर। कार को मैंने चलाना शुरु किया और इसको इंजिन की ताक़त औऱ हैंडलिंग ने समां तो बांधा। तेज़ और हल्की कार, बढ़िया हैंडलिंग और ठोस सस्पेंशन से लैस। जितना इसे चलाता गया, उतनी रोमांचक ये कार लगती गई। इसका छोटा आकार औऱ इसका 211 हॉर्सपावर की ताक़त मुझे मज़ेदार लग रही थी।  इसका इंजिन 1984 सीसी की था। तो पैकेज शानदार लग रही थी। और चूंकि ये ऑडी टीटी कूपे का एस लाइन वर्ज़न था तो अंदर ज़्यादा शाही था, सीटें ज़्यादा आरामदेह। कुल मिलाकर ड्राइव का अनुभव अच्छा हुआ और रोमांचक लगा। तो फिर सोचा कि इसका लुक मुझे ज़्यादा पसंद नहीं था शायद इसलिए अपील नहीं करती थी ये कार पहले। लेकिन आजके प्रदर्शन से तो अच्छी ही लग रही थी। और फिर दिल के बाद बारी आई एक दिमाग़ी एंगिल की। वो है इसकी क़ीमत लगभग 56 लाख रु। औऱ फिर बिंदू वहीं जाकर विश्राम करने चली गई। अगर आपको ये कार दिल से अच्छी है तभी लेंगे आप, नहीं तो इस बजट में कई और तरीके के विकल्प मौजूद हैं।

*पुरानी छपी हुई है। 

December 21, 2014

गाड़ी शाही- सर्विस नहीं


भारत में लग्ज़री कारों की बिक्री कैसे बढ़ रही है ये किसी से छुपा नहीं है। सड़कों पर मर्सेडीज़, बीएमडब्ल्यू और ऑडी की संख्या इतनी बढ़ चुकी है कि एक वक्त में इन कंपनियों की हर कार को शाही कार मानने वाली सोच भी अब जाती नज़र आ रही है। और ना सिर्फ़ आम लोगों में ये सोच झलक रही है बल्कि ग्राहकों में भी। अब इन कारों के ग्राहक भी ख़ुद वैसा शाही महसूस नहीं कर रहे हैं।

पिछले एक साल में लग्ज़री कारों की बिक्री लगभग दुगनी बढ़ी है। 2013 में लगभग 16 हज़ार कारें बिकी थीं, वहीं इस साल 35 हज़ार से ऊपर कारें, ज़ाहिर है इस बढ़ोत्तरी का दबाव कंपनियों के डीलरशिप और वर्कशॉप पर भी दबाव बढ़ा है। और इस दबाव का असर ग्राहकों की संतुष्टि पर भी पड़ा है जिसे मापने का काम करती है जे डी पावर एशिया पेसिफिक। जिसके 2014 के लग्ज़री सेगमेंट के कस्टमर सर्विस इंडेक्स स्टडी में यही बातें सामने आई हैं। 

कंपनी ने लग्ज़री कारों के 257 ऐसे ग्राहकों से बात की, जिनमें एक से दो साल पुराने मर्सेडीज़, ऑडी और बीएमडब्ल्यू ग्राहक थे। स्टडी में पूछा गया कि सर्विस की क्वालिटी, गाड़ी के पिकप, सर्विस एडवाइज़र, सर्विस फेसिलिटी और सर्विस की शुरूआत से। इन सब पैमानों के लिए अलग अलग अंक दिए गए थे और सभी कंपनियों को कुल हज़ार प्वाइंट के स्केल पर मापा गया। और इस पैमाने पर पिछले साल के मुक़ाबले ग्राहकों कम संतुष्ट हैं। सर्विसिंग की शुरूआत और फेसिलिटी को लेकर ग्राहक सबसे नाख़ुश थे। जिन रेटिंग में पिछले साल के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा गिरावट दर्ज की गई।

इन सबका मतलब ये है कि ग्राहकों को सर्विसिंग के लिए अब पहले से ज़्यादा इंतज़ार करना पड़ता है। सर्विस होकर गाड़ी तैयार होने में भी वक्त ज़्यादा लगता है। ग्राहकों को इस देरी के बारे में सही जानकारी नहीं दी जाती।

इस स्टडी में नंबर एक पर मर्सेडीज़ रही, दूसरे पर बीएमडब्लूय और तीसरे पर ऑडी रही। 

*Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । कहीं ना कहीं छपी हुई है

July 06, 2014

ब्रांड भी थकते हैं...


ब्रिटिश चीज़ों को लेकर हिंदुस्तानियों का लगाव कुछ ज़्यादा ही है। अब चाहे इसे ग़ुलाम मानसिकता कहें, अभिजात्य वर्ग में ट्रांज़िशन का रास्ता कहें या फिर कुछ चीज़ें होती भी लगाव लायक। ऐसे में वो ब्रिटिश ना भी हों तो हमें हो सकता है वो अच्छी लगें। जैगुआर कारों के बारे ऐसी ही दुविधा मुझे लगती है। क्या ये ब्रिटिश है इसलिए हिंदुस्तानी इतने लगाव से इस ब्रांड को देखते हैं, क्या इसलिए क्योंकि दरअसल हिंदुस्तानी कंपनी टाटा ने जैगुआर लैंडरोवर को ख़रीद रखा है या फिर इसलिए क्योंकि ये कारें वाकई इतनी ख़ास और ख़ूबसूरत दिखती हैं। हो सकता है तीनों का कांबिनेशन हो, जो मुझे देखने को मिला ग्रेटर नौएडा के पास बनती सड़क किनारे खड़े नौजवानों से बात करके। जो जानते थे कि ये जैगुआर कार है, जानते थे कि कार के बोनट पर एक शेरनुमा कुछ निशान बना रहता है। और ये भी कि ये ऑडी बीएमडब्ल्यू से अलग टाइप की कार है।
तो इन सब नौजवानों और अपने सवालों से मिलने के बाद मैं निकला देखने कि जिस जैगुआर पर इतनी चर्चा हो रही थी वो दरअसल चलाने में थी कैसी और क्या ये सफल होगी उस कोशिश में जहां पर कंपनी यानि जैगुआर की नज़र है। 
ये जैगुआर एक्स एफ़ २.२ थी। जिसे चलाने निकला था और ज़ेहन में वही सवाल था कि इस सेगमेंट में जो पैमाना तीनों जर्मन कारों ने सेट किया है, जो आदत जर्मन कारों ने ग्राहकों को डाल दी, उसमें क्या कुछ नया करने की क्षमता है जैगुआर की। जिस कार को लेकर निकला वो २.२ लीटर डीज़ल इंजिन से लैस एक ऑटोमैटिक कार थी। इससे पहले इसमें ३ लीटर वाला विकल्प तो था लेकिन जैगुआर ने कोशिश की अपनी कार को छोटे इंजिन से लैस करके और क़ीमत को कम करके उन तीनों महारथियों से टक्कर लेने की जो इस सेगमेंट में राज कर रहे थे। मर्सेडीज़, बीएमडबल्यू और ऑडी। 
एक्स एफ़ मोटे तौर पर सबसे सस्ती जैगुआर कारें हैं भारत में जहां एक्स एफ़ फ़िलहाल तीन इंजिन विकल्पों के साथ मौजूद हैं। एक तो २ लीटर पेट्रोल इंजिन विकल्प है, २.२ लीटर डीज़ल इंजिन है और तीसरा ३ लीटर डीज़ल इंजिन विकल्प। 
जहां एक्सएफ़ पेट्रोल ४८.६ लाख की है वहीं एक्सएफ़ २.२ डीज़ल ४८.९ लाख रु की है। और ३ लीटर डीज़ल विकल्प सबसे महंगी ५४.९ लाख रु की है, और एक्सएफ़ २.२ 
के ज़रिए इसी प्राइस बैंड को कम करने की कोशिश की थी जैगुआर ने।
हालांकि छोटे इंजिन के बावजूद ताक़त और प्रदर्शन में कोई कमी नहीं कह सकते हैं। काफ़ी तेज़ तर्रार है, और हैंडलिंग के मामले में अपने सेगमेंट के मुताबिक प्रदर्शन ज़रूर करती है, हां स्पोर्ट्स कार जैसी नहीं कहेंगे स्टीयरिंग और सस्पेंशन के मामले में क्योंकि इसमें ज़्यादा तरजीह आराम को ही दिया गया है। तो जर्मन कारों की हैंडलिंग की आदत में ये थोड़ा अलग लगेगा, क्योंकि उनकी हैंडलिंग का स्तर थोड़ा ज़्यादा स्पोर्टी ज़रूर लगता है। लेकिन ये अलग मूड की कार है। और कार को अंदर से भी देखें तो मौजूदा विकल्पों के मुक़ाबले थो़ड़ा पुराना डिज़ाइन लगता है, बहुत हाईटेक नहीं लगेगा। फ़िनिश में एक शाही टच है लेकिन आजकल यंग होते ग्राहकों के लिए अपटूडेट लुक नहीं कहेंगे। लेकिन एक मुद्दा ये भी है कि जिनके पास पैसे हैं वो ख़र्च करने के लिए नया विकल्प ज़रूर ढूंढ रहे हैं, जर्मन ब्रांडों से एक तरह से थकान भी कह सकते है, ब्रांड भी थकते हैं, ऐसे में उनके लिए जैगुआर एक विकल्प हो सकती है। कार जो महंगी है, लेकिन ख़ूबसूरत भी हैं और ब्रांड भी ब्रिटिश है।

(Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । कहीं ना कहीं छपी हुई है)

May 04, 2013

कौन करेगा ओवरटेक R8 V10 plus को ?


"कार में लगे सवा पांच लीटर इंजिन से ताक़त निकलती है साढ़े पांच सौ हॉर्सपावर की। सौ की रफ़्तार ये पकड़ लेती है मात्र साढ़े तीन सेकेंड में"

दुनिया के बाकी देशों में या कहें ज़्यादातर देश में रेस ट्रैक पर जाने का अपना अलग रोमांच होता है। जहां पर ड्राइवर या रेसर अपनी और अपनी गाड़ी का काबिलियत को परखता है, या परखती है। जहां पर गाड़ियों को उनकी आख़िरी सीमा तक खींचा जा सके, टॉप स्पीड का असली मतलब समझा जाए। लेकिन हाल में मैंने महसूस किया कि भारत में रेस ट्रैक पर जाने का एक बोनस और है। वहां पर कुछ एक्स्ट्रा निश्चिंतता मिलती है। जैसे ये कि सड़क ठीक होगी, अचानक कोई गड्ढा नहीं मिलेगा, ये भी कि उल्टी साइड से कोई गाड़ी लेकर नहीं आ जाएगा आपको लघु हार्ट अटैक देने के लिए। थोड़ी व्यंग्य के तौर पर आपको ये पंक्तियां महसूस होंगी लेकिन पिछले हफ़्ते वाकई मैं ऐसा ही महसूस कर रहा था मैं, जब मैं एक नई कार को चलाने के लिए दिल्ली से सटे ग्रेटर नौएडा के फॉर्मूला वन ट्रैक पर पहुंचा था। ये कार थी ऑडी की नई आर 8 । ये ऑडी की सबसे ख़ास स्पोर्ट्स कार है। दो दरवाज़ों वाली और दो सीटों वाली। जो बनी है ख़ासतौर पर रफ़्तार के लिए। हालांकि ये कार पहले से भारत में मौजूद थी। लेकिन इस रोमांचक कार को थोड़ा और रोमांचक बनाया है, ये है ऑडी वी 10 प्लस। वी 10 का मतलब ये इंजिन 10 सिलिंडर  वाला इंजिन है। इसमें प्लस का मतलब कुछ ऐक्स्ट्रा  ताक़त से है। कार में लगे सवा पांच लीटर इंजिन से ताक़त निकलती है साढ़े पांच सौ हॉर्सपावर की। सौ की रफ़्तार ये पकड़ लेती है मात्र साढ़े तीन सेकेंड में। सोचिए शून्य से सौ की रफ़्तार साढ़े तीन सेकेंड में। लेकिन इसकी दुनिया सौ तक ही सीमित नहीं रहती है। ये 317 किमीप्रतिकिमी तक जाती है, यानि इसकी टॉप स्पीड। ये सब आंकड़े इसलिए बता रहा हूं क्योंकि अगर सबसे पहले इसकी क़ीमत बता देता तो आपके ज़ेहन में सवाल आता कि आख़िर ऐसा क्या है इस कार में जो इसकी क़ीमत लगभग सवा दो करोड़ तक पहुंच जाए। जी हां इसकी महाराष्ट्र एक्स शोरूम क़ीमत है दो करोड़ छह लाख रु। लगा ना आपको कि आख़िर ऐसा क्या होता है कि इन कारों की क़ीमत करोड़ों में चली जाती है। 



चलिए इसमें सबसे बेसिक वजह तो है इन कारों पर लगने वाली ड्यूटी जो इन्हीं सुपर-महंगी कार बनाती है। लेकिन इसके अलावा भी इनकी क़ीमत हमेशा से ज़्यादा होती है। जिसके पीछे एक ही सोच होती है, कार को कैसे ज़्यादा से ज़्यादा तेज़ और ज़्यादा से ज़्यादा सुरक्षित बनाया जाए। और ये दो पैमाने ऐसे हैं जो किसी भी इंजीनियर के  लिए किसी तिलिस्म से कम नहीं, जिसका संतुलन करना बहुत मुश्किल होता है। और ऐसा संतुलन आपको हरेक ऐसी स्पोर्ट्स कारों में दिखेगा चाहे हो ऑडी हो, मर्सेडीज़ हो, फ़ेरारी हो या लैंबोर्गिनी। इसीलिए बहुत सी कारों को देखकर लगता है कि सिर्फ़ बाज़ार के लिए एक प्रोडक्ट नहीं बनाया गया है, फ़िज़िक्स के नियमों से लड़ते हुए एक मास्टरपीस भी बनाया गया । जो बेतहाशा भागती है, कितनी भी तेज़ रफ़्तार में बिना हिचके मुड़ती है और कितनी भी तेज़ रफ़्तार से अचानक सटीक रुकती भी है । कार में इस्तेमाल हरेक पार्ट-पुर्ज़े इसी मक़सद से चुने और लगाए जाते हैं। और इन सबके बाद इन्हें चलाना एक अलग अनुभव होता है, जहां पर इनकी काबिलियत का जितना टेस्ट हम कर रहे होते हैं उतना ही टेस्ट ये कारें हमारी कर रही होती हैं। और वैसा ही महसूस कर रहा था मैं बुद्घा इंटर्नैशनल सर्किट पर। साढ़े पांच सौ हॉर्सपावर की कार की ताक़त का मज़ा लेते हुए, बिना इस फ़िक्र के कि करोड़ों की इस कार को कोई स्क्रैच ना लगा दे या कोई ओवरटेक करने के लिए हॉर्न ना मारे। 

May 01, 2013

तजुर्बा तो ज़रूरी है....

कुछ साल पहले तक...किसी भी सुपरबाइकर के साथ एक बात तो तय थी कि जब भी कोई उनकी बाइक को कोई छूए को वो तपाक से रोकते थे । कई बार गुस्से से भी। अपनी प्यारी मोटरसाइकिल पर एक उंगली का निशान भी उन्हें पसंद नहीं होता। साथ में ये भी मुद्दा था ही कि कुछ वक्त पहले तक उन मोटरसाइकिलों के पार्ट-पुर्ज़े काफ़ी मुश्किल से मिलते थे। तो चिंता ज़रूरी था। ऐसे में जब मोटरसाइकिल कंपनियां जब सुपरबाइक्स लाईं, और शोरूम पर उन्होंने डू-नॉट-टच का स्टिकर लगाया तो ज़्यादा लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ । लेकिन बात अटपटी ज़रूर थी, जब मैं देखता था कि स्कूली बच्चों का झुंड बाइक शोरूम के बाहर से लाखों रु की उन मोटरसाइकिलों को निहारते थे लेकिन नज़दीक से छू नहीं सकते थे। ये बात मुझे काफ़ी अटपटी लगती थी, ख़ासकर तब जब कंपनियां भारत में इस तरीके की सवारियों का भारत में बाज़ार ही खंगाल रही थीं। यहां पर बिक्री से ज़्यादा ज़रूरी था बाज़ार को बनाना। और मुझे बाद में लगा कि मैं बहुत ग़लत नहीं था। ग्राहक एक्सपीरिएंस की मांग करते हैं।
इसी पहलू पर एक नए लहजे में देखा हार्ले डेविडसन को जब कंपनी ने भारत में अपनी महंगी मोटरसाइकिलों को लौंच किया। कंपनी के शोरूम में बाइकप्रेमियों पर बहुत बंदिशें नहीं थीं । इसके अलावा कंपनी ने अपनी सवारियों को एक्सपीरिएंस करवाने के लिए कई तरीके की कोशिशें की। कंपनी का वैसे भी नाम मज़बूत था लेकिन इन सब कोशिशों के साथ, कंपनी ने आज की तारीख़ में भारत में भी एक मोटरसाइकिल कल्चर को अपने नाम किया है । ये सच्चाई तो है ही कि आने के दो साल में ही कंपनी ने दो हज़ार मोटरसाइकिलें बेच दी थीं, जो बाकी सुपरबाइक या प्रीमियम बाइक की बिक्री से कही ज़्यादा है।  हर वीकेंड पर देश के कई बड़े शहरों में बाइकर्स एक साथ निकलते हैं और बाइकिंग का मज़ा लेते हैं साथ वक्त गुज़ारते हैं।
मोटरसाइकिलों में तो सिर्फ़ इक्का दुक्का ऐसे उदाहरण हैं, कार कंपनियां इस मामले में कहीं आगे जा चुकी हैं। एक वक्त था जब घर पर मार्केटिंग के लिए धूप-अगरबत्ती और वाटर प्यूरिफ़ायर वाले आते थे। अब लाखों करोड़ों की कार कंपनियां शहर शहर घूम रही हैं, अपनी कारों को बेचने के लिए। भारतीय कार बाज़ार की दुर्गति निकली हुई है, ज़्यादातर कार निर्माता हिचकियां ले रहे हैं। कैसे कार बेचें इसकी तरकीबें सोच रहे हैं। कोई एक के साथ एक फ्री दे रहा है और कोई कार्ड स्क्रैच करने के लिए कह रहा है। ऐसे में लग्ज़री कार कंपनियां भी पीछे नहीं रह रही हैं । आज के दौर में इन कंपनियों ख़ासकर जर्मन कार कंपनियों को जिस आक्रामक मूड में देखा जा रहा है वो अब तक नहीं था। पारंपरिक प्रतिद्वंदी मर्सेडीज़, बीएमडब्ल्यू और ऑडी। ये कंपनियां एक दूसरे से रेस में लगी हैं जिसके लिए पूरे भारत में संभावित बाज़ार ढूंढ रही हैं। जहां पर शोरूम है वहां तो है ही, जहां नहीं है वहां भी कार बेचने की कोशिश ज़ोरदार है। सभी कंपनियां किसी ना किसी तरीके से उन सभी शहरों में अपनी कारों को लेकर पहुंच रही हैं जहां पर पैसे वाले ग्राहकों की संख्या बढ़ी मालूम चली है। और एक समय में संभ्रांत और एक्सक्लूसिव ब्रांड उस गुमान में नहीं दिखते जो कुछ साल पहले था। अब वो सभी ग्राहकों को अपने एक एक फ़ीचर को एक्सपीरिएंस कराने की कोशिश कर रही हैं।
जैसे मर्सेडीज़ और ऑडी अपने ग्राहकों के लिए कुछ अलग तरीके की कोशिश कर रही है। कंपनी ने अपनी कारों की ड्राइव और पर्फोर्मेंस की एक एक बारीकी समझाने के लिए ग्राहकों को रेस ट्रैक पर बुलाने लगे हैं। दोनो ही कंपनी ने कुछ हज़ार रु की फ़ीस लेकर अपनी स्पोर्ट्स कारों का तजुर्बा देने के  लिए प्रोग्राम शुरू किया है। जिन शहरों में रेस ट्रैक नहीं वहां पर ख़ास ट्रैक बना कर ।
कुछ कार कंपनी अपनी कारों के साथ छोटे छोटे ड्राइव भी आयोजित करती हैं। जहां पर पुराने ग्राहक अपनी फ़ैमिली के साथ आते हैं। कस्टमर के साथ ख़ास रिश्ता जोड़ने के साथ कंपनी की ब्रांड बिल्डिंग भी हो जाती है। महिंद्रा का ग्रेट एस्केप रैली ऐसी ही कोशिश है, जहां ग्राहक मुश्किल रास्तों पर अपनी एसयूवी दौड़ाते हैं। टाटा मोटर्स ने भी इसी तरह की कोशिश फ़ुल थ्रॉटल के नाम से शुरू कर रही है।
ऐसी कोशिशों के साथ ना सिर्फ़ ग्राहक बेहतर फ़ैसला कर पाते हैं, बल्कि कार कंपनियों के लिए भी फ़ायदे का सौदा होता है  जहां कई ग्राहक प्रभावित होकर कार ख़रीदने का फ़ैसला तुरंत कर लेते हैं। इसके अलावा ग्राहकों की जानकारी बढ़ती है, मोटरिंग का कल्चर बढ़ता है। सभी तरीके से फ़ाएदेमंद ही कहा जाएगा, जो कार कंपनियां ऐसा नहीं कर रही हैं उन्हें तुरंत शुरू करना चाहिए।