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January 17, 2015

ऑटोमैटिकल्ली Automatic ...

बहुत सालों पहले दिल्ली में एक म्यूज़ियम खुला था। अलग और ख़ास। प्रो बोनो पब्लिको के नाम से। ये म्यूज़ियम था विंटेज और क्लासिक कारों का। एक से एक ख़ूबसूरत, पुरानी और नायाब कारें यहां पर लगी हुई थीं। जिन कारों को अच्छे से रिस्टोर किया गया था, यानि एक-एक पार्ट पुर्ज़े को असल हालत रंग-रूप में रखा गया था। चमका कर और रंग-रोगन करके। वहीं पर था जब एक बहुत ही लाल रंग की ख़ुबसूरत और बहुत ही लंबी कार पर नज़र गई। ये कार थी शेवरले की बेलएयर। जैसे पुरानी फ़िल्मों में हीरो के पास हुआ करती थी। इस म्यूज़ियम को शुरू करने वाले दलजीत टाइटस, जो एक नामी वक़ील हैं उनसे बात हो रही थी तो पता चला कि शेवरले की ५० और ६० की दशक की कारों का उन्हें ख़ास शौक है। और उन्हीं में से एक थी ये कार भी। इसी बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि कैसे एक बार इसमें मैन्युल ट्रांसमिशन आया था यािन गियर वाला और लेकिन ग्राहकों ने इसे बिल्कुल ख़ारिज कर दिया और फिर ये सिर्फ़ ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन में आती थी। ये सुन कर बड़ा अटपटा सा लगा। दरअसल हिंदुस्तानी ग्राहकों और कार बाज़ार की ऐसी आदत है कि ये सुन कर दो मिनट के लिए सोच में पड़ा कि केवल ऑटोमैटिक कारें कैसे । वाकई ये मानने में पहले बहुत दिक्कत होती है कि मैन्युअल ट्रांसमिशन को कोई ख़ारिज क्यों करेगा। लेकिन दो मिनट के बाद ही लगा कि ये तो किसी और कार बाज़ार की कहानी है और वहां पर ज़रूरी नहीं कि भारत जैसे हालात हों। और ये सोच आम ही है भारत में । ऊंची क़ीमत, महंगा रखरखाव और ख़राब माइलेज, ये सब मुद्दे ऐसे हैं जिसके साथ ऑटोमैटिक कारों को कोई क्यों पसंद करेगा भारत में । सिर्फ़ इसलिए कि उन कारों को चलाना आरामदेह होता है। लेकिन अब जो ताज़ा आंकड़े आ रहे हैं उसके मुताबिक मूड कुछ बदला है। मारुति ने अपनी सेलीरियो को पेश किया है और कंपनी की माने तो आधी से ज़्यादा बिक्री सेलीरियो के ऑटोमैटिक कार की हो रही है। इस कार में मारुति ने ग्राहकों की उन चिंताओं को दूर करने की कोशिश की थी जो उन्हें ऑटोमैटिक कारों को ख़रीदने से रोकता है। दो मुद्दे तो अभी ही दिखे, कम क़ीमत और ज़्यादा माइलेज। हालांकि रखरखाव के मामले में क्या हाल है ये तो आगे देखेंगे। तो इस पैकेज को लोगों ने भी हाथोंहाथ लिया है और वो ख़रीद रहे हैं ऑटोमैटिक वेरिएंट ही। अब देश के ज़्यादातर शहरों में गाड़ियों की संख्या तो बढ़ रही है लेकिन ना तो ट्रैफ़िक मैनेजमेंट सही किया जा रहा है और ना सड़कों की योजना तरीके से हो रही है। ट्रैफ़िक बद से बदतर होता जा रहा है, ट्रैफ़िक नियम की तो पूछिए मत। ऐसे में क्लच और गियर बदलते बदलते हाथ और पैर की हड्डियां घिस रही हैं और दिमाग़ गरम हो रहा है। उन्हीं ग्राहकों ने अब सेलीरियो के साथ एक्सपेरिमेंट करने की सोची है। जिसमें दो मुद्दे ख़ास ध्यान रखे गए हैं। एक तो ऑटोमैटिक सेलीरियो और मैन्युअल सेलीरियो में मात्र ४० हज़ार रु का अंतर है, जबकि पहले मैन्युअल और ऑटोमैटिक में लाख-डेढ़ लाख रु का फ़र्क होता था। वहीं माइलेज पर भी फ़र्क नहीं पड़ा है। हालांकि अब तक ऐसी हालत नहीं थी। पहले तो बताया जा रहा था कि बाज़ार का मुश्किल से ४-५ फ़ीसदी हिस्सा ऑटोमैटिक कारों का है, अब कहा जा रहा है कि छोटी कारों में तो २-३ फीसदी ही है। हो भी क्यों नहीं ये सेगेमेंट ही है किफायत पसंद ग्राहकों का, बिना क्लच की कार का आराम तो चाहिए लेकिन कम क़ीमत पर। 
मारुति हो या ह्युंडै सभी कंपनियों ने अपने पास पहले भी ऑटोमैटिक विकल्प रखे थे। मारुति ने तो ज़ेन को उतारा था सालों पहले ऑटोमैटिक अवतार में। लेकिन पारंपरिक ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन महंगे थे और कम किफ़ायती भी। इसीलिए ग्राहक भले ही शोरूम जाकर ऑटोमैिटक कारों का पता करें, लेकिन ख़रीदते मैन्युअल ट्रांसमिशन ही थे। लेकिन अब ये तस्वीर बदलने वाली है।
सेलिरियो तो सिर्फ़ एक शुरूआत है। अभी तो और भी कई कारें आने वाली हैं इन्हीं ख़ासियत के साथ । सस्ती, किफ़ायती और आरामदेह ऑटोमैटिक विकल्प के साथ। कंपनियों को समझ में ये बात तो आ ही गई है कि भारती ग्राहक अब थोड़ा ज़्यादा आराम चाहते हैं। लेकिन हां, वो किफ़ायत भी नहीं छोड़ना चाहते हैं। इसलिए ऑटोमैटिक मैन्युअल ट्रांसमिशन का रास्ता खोजा गया जिससे सबसे बेहतर बैलेंस मिल सके। टाटा मोटर्स ने अपनी बोल्ट और ज़ेस्ट में इसी तकनीक का सहारा लिया है । जल्द ऑटोमैटिक मैन्युअल ट्रांसमिशन में ये कारें आएंगी। साथ में कहा जा रहा है कि सबसे सस्ती ऑटोमैटिक नैनो बनेगी। साथ में कई और कंपनियों ने अपनी अपनी ऑटोमैटिक कारों पर काम शुरू किया है उसे पहले से ज़्यादा आकर्षक पैकेज बनाने के लिए। 
देखना दिलचस्प होगा कि आनेवाले वक्त में कितना स्वरूप बदलेगा बाज़ार का, ग्राहक क्या ज़्यादा ऑटोमैटिक कारें ख़रीदेंगे, क्या हम अमेरिकी जापानी बाज़ार के रास्ते पर हैं जहां पर ऑटोमैटिक कारें कुल बिक्री का ८०-९० फ़ीसदी हैं। 

July 03, 2014

गर्मागर्म ड्राइव


मौसम ऐसा ही है जहां पर हममें से हर कोई नई मंज़िल की तलाश में निकलने की सोच रहे हैं, ये बात अलग है कि छुट्टी मिले या ना मिले अपनी अपनी नौकरियों से। चलिए मान कर चलते हैं कि मौसम है गर्मियों की छुट्टी का, यानि बच्चों की छुट्टियों का तो ऐसे में ज़्यादातर प्लान करके रखते हैं, और उनमें से कई का प्लान होता है पूरे परिवार के साथ ड्राइव करके घूमने जाने का। तो ऐसे ही परिवारों के लिए ख़ासतौर पर आज सोचा कुछ लिखा जाए, वो जानकारियां जो आपके पास होती हैं लेकिन फिर भी फिर से याद दिलाने में कोई नुकसान नहीं है। वैसे गर्मियों में किसी भी तरीके के ड्राइविंग के लिए टिप्स कामके होते हैं, चाहे आप लौंग ड्राइव पर हों, या स्मॉल ड्राइव पर। परिवार के साथ हों या फिर अकेले।

सबसे पहले तो आपको अपनी यात्रा का प्लान करना ज़रूरी है। कब निकलना है, दिन के किस वक्‍त निकलना है, जिससे ट्रैफ़िक कमसेकम मिले। कौन सा रूट पकड़ना है- ये अहम मुद्दा है क्योंकि भारत में सड़कों का कंस्ट्रक्शन कैसे चलता है ये हमें और आपको सबको पता है। ऐसे में कब कहां अटक जाएं ये पता नहीं। और छुट्टी पर जाने के रास्ते ऐसे जाम मज़ा किरकिरा कर देते हैं। इसके लिए सबसे पहले तो अपने दोस्तों-सहकर्मियों से बात करें। ज़्यादातर टूरिस्ट स्पॉट पर लोगों का आना जाना लगा रहता है, और रास्तों के बारे में वो लेटेस्ट जानकारी रख सकते हैं, कईयों के रिश्तेदार दोस्त उन इलाक़ों में रहते हैं। और इसके बाद रामबाण है इंटरनेट, जाइए नेट पर और सर्च कीजिए उन हाईवे और रोड के बारे में । बहुत से ऐसे वेबसाइट और फ़ोरम हैं जहां पर लोग अपनी यात्राओं का अनुभव लिखते हैं, ज़्यादातर मौक़े पर ये अनुभव काम के होते हैं। मेरा तजुर्बा भी यही रहा है कि रास्ते की जितनी जानकारी हो, आप सफ़र के लिए उतना तैयार रहते हैं। 

फिर आते हैं आपकी कार पर। यानि गाड़ी कितनी तैयार है, लंबे सफ़र, देर तक ड्राइव, गर्मी और बुरी सड़कों के लिए। लौंग ड्राइव पर कारों की असली रगड़ाई होती है तो इसके लिए उन्हें अच्छे से तैयार भी करना चाहिए। बिना कार की तैयारी के निकलना बहुत बड़ी भूल होगी। तो इसके लिए ले जाइए वर्कशॉप पर, और चेक करवाइए ट्यूनिंग, बैट्री, बेल्ट वगैरह। किसी पाइप या रबर में कोई लीकेज तो नहीं , चेक करवाइए। ज़रूरत हो तो ऑयल चेंज करवाइए और टायर भी रोटेट करवाइए। एसी की भी सर्विसिंग नहीं करवाई हो तो करवा लीजिए। काम आएगा। एक और ज़रूरी बात, वाइपर को भी चेक कीजिए और वाइपर के साथ वाले वाशिंग के लिए भी पानी भरा होना चाहिए। बारिश हो ना हो, कई बार पहाड़ी इलाक़ों में मौसम बदलता है। वैसे भी ड्राइव के दौरान भी कभी भी शीशा साफ़ करने की ज़रूरत पड़ सकती है।

लगे हाथों लाइट्स भी चेक करवा लीजिए। हाईवे पर एक भी लापरवाही जानलेवा होती है तो बिना हर लाइट का सही तरीके से काम करना ज़रूरी होता है। शहरी ट्रैफ़िक में भले हमें अहमियत पता ना चले लेकिन हाईवे पर सेफ़्टी के लिए लाइट्स का फ़िट होना बहुत ज़रूरी हैं। 

फिर टायर के बारे में तो आपको याद होगा ही। लंबे सफ़र पर टायरों की भूमिका काफ़ी अहम हो जाती है। एक तो टायर को चेक करना ज़रूरी है। अगर ज़रूरत से ज़्यादा घिसे हुए टायर हैं तो फिर वो गर्मी में फट सकते हैं। लंबी दूरी की ड्राइविंग में एक तो पहिया गर्म होता है ऊपर से मौसम की वजह से सड़कें तपी हुई होती हैं, ऐसे में टायर में भरा हुआ हवा गर्म होकर थोड़ा फैलता है, जिसका दबाव घिसे टायर कैसे झेल सकते हैं, तो गर्मियों में टायरों का फटना आम है।और इसी वजह से दूसरा प्वाइंट भी अहम है। टायर अच्छी हालत में होने चाहिए और उनका एयरप्रेशर उतना ही होना चाहिए जितना कंपनी ने निर्धारित किया है। ज़्यादा हवा भरवाएंगे तो गर्मियों में टायरों के लिए जानलेवा हो सकता है। और इन सबको चेक करने के बाद एक और चेकिंग, वो है अापकी गाड़ी की स्टेपनी की, पांचवे टायर की। उसका स्वास्थ्य कैसा है चेक करके रखिए, ज़रूरत है तो हवा भरवा के उसे भी तैयार रखिए।

फिर इससे जुड़ा एक और प्वाइंट। चाहे दो दिन के लिए जाएं या फिर चार दिनों के लिए कितना सामान ले जाना है ये भी ध्यान रखें। बिना मतलब सामान ले जाने कोई मतलब नहीं होता है। उससे ना सिर्फ़ कार में जगह भरता है, एक्सट्रा वज़न टायर पर बेवजह दबाव बढ़ाएगा और माइलेज पर भी । तो सामान पैक करने के वक्त ध्यान रखें। जो चीज़ बिल्कुल ज़रूरी हो वही साथ में ले जाएं। 

अब बात सड़क पर ड्राइविंग की करें तो ये समझना ज़रूरी है कि हाइवे पर ड्राइविंग शहरी ड्राइविंग से बिल्कुल अलग होती है, शहर में कई बार आम ट्रैफ़िक नियमों को तोड़ने पर हम बच जाते हैं तो लगता है कि इन नियमों की ज़रूरत क्या है, लेकिन उनकी असली अहमियत हाइवे पर दिखेगी, जो नियम दरअसल जान बचाने के लिए काम में आते हैं। तो शहर की तरह आड़ी तिरछी, ग़लत ओवरटेकिंग की ग़लतियां मत कीजिए। 
फिर सेफ़्टी के इंतज़ाम भी रखें। जहां हाईवे पर हमारी औसत रफ़्तार कहीं ज़्यादा होती है, ऐसे में सेफ़्टी की ज़रूरत और बढ़ जाती है। पिछली सीट पर भी सीट बेल्ट बांध कर फ़ैमिली को बिठाइए। याद होगा कि हाल में पिछली सीट पर ही बैठे हुए हमारे केंद्रीय मंत्री की दुर्घटना में मृत्यु हुई थी। तो सेफ़्टी हर सीट पर ज़रूरी है। और ये चालान से बचने के लिए नहीं जान बचाने के लिए ज़रूरी है।
और यही सलाह फ़ोन को लेकर भी देंगे, फ़ोन का इस्तेमाल आपकी ड्राइविंग को प्रभावित करता है, चाहे आप कितने भी काबिल ड्राइवर हों। ऐसे में ज़रूरी है कि आप अपनी ड्राइव को सेफ़ बनाएं, फ़ोन का इस्तेमाल ड्राइव के दौरान ना करें।
आप घंटों लगातार ड्राइव करने से बचें। कई बार थकान होने के बवाजूद हम ड्राइव करते रहते हैं, जो ख़तरनाक होता है। तो चाय कॉफ़ी का ब्रेक, हर डेढ़ दो घंटे पर हो तो बेहतर हो।
हां ध्यान रहे, केवल चाय कॉफ़ी के लिए बियर या शराब के लिए नहीं। ये विडंबना ही है कि भारत में १ लाख ३८ हज़ार लोग सड़क हादसों में मरते हैं, जिनमें से अधिकांश हाइवे पर मरते हैं लेकिन सरकारें हैं कि हाइवे पर शराब की दुकानें खोले जा रही है खोले जा रही है। तो आप कृपया इस जाल से बचिएगा, ड्राइविंग के दौरान शराब बिल्कुल मत पीजिएगा।

एक और सुझाव है, सलाह तो नहीं दे सकता क्योंकि हर इंसान की सोच अपनी अपनी होती है। लेकिन मेरे हिसाब से एक और चीज़ ध्यान रखने वाली है हाइवे पर ड्राइव करते वक्त, वो है आपके सर का तापमान। अाजकल देश के ज़्यादातर शहरों में रोडरेज आम बात है, यानि गर्ममिज़ाजी। छोटी छोटी बात पर बहस लड़ाई का रूप ले लेती है, और अंजाम बुरा होता है। शहर में माहौल दूसरा होता है, हाइवे पर दूसरा। तो सुझाव यहीं दूंगा कि कार के साथ अपने दिमाग़ को भी ठंडा रखिए और निकल जाइए मस्त छुट्टियां मनाने।





इमर्जेंसी के लिए कार में क्या ज़रूरी ? 
फ़र्स्ट एड किट
ज़रूरी दवाईयां
जंपर केबल
जैक
रिपेयर टूल
रोड मैप
टॉर्च लाइट

Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । कहीं ना कहीं छपी हुई है।

May 01, 2013

तजुर्बा तो ज़रूरी है....

कुछ साल पहले तक...किसी भी सुपरबाइकर के साथ एक बात तो तय थी कि जब भी कोई उनकी बाइक को कोई छूए को वो तपाक से रोकते थे । कई बार गुस्से से भी। अपनी प्यारी मोटरसाइकिल पर एक उंगली का निशान भी उन्हें पसंद नहीं होता। साथ में ये भी मुद्दा था ही कि कुछ वक्त पहले तक उन मोटरसाइकिलों के पार्ट-पुर्ज़े काफ़ी मुश्किल से मिलते थे। तो चिंता ज़रूरी था। ऐसे में जब मोटरसाइकिल कंपनियां जब सुपरबाइक्स लाईं, और शोरूम पर उन्होंने डू-नॉट-टच का स्टिकर लगाया तो ज़्यादा लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ । लेकिन बात अटपटी ज़रूर थी, जब मैं देखता था कि स्कूली बच्चों का झुंड बाइक शोरूम के बाहर से लाखों रु की उन मोटरसाइकिलों को निहारते थे लेकिन नज़दीक से छू नहीं सकते थे। ये बात मुझे काफ़ी अटपटी लगती थी, ख़ासकर तब जब कंपनियां भारत में इस तरीके की सवारियों का भारत में बाज़ार ही खंगाल रही थीं। यहां पर बिक्री से ज़्यादा ज़रूरी था बाज़ार को बनाना। और मुझे बाद में लगा कि मैं बहुत ग़लत नहीं था। ग्राहक एक्सपीरिएंस की मांग करते हैं।
इसी पहलू पर एक नए लहजे में देखा हार्ले डेविडसन को जब कंपनी ने भारत में अपनी महंगी मोटरसाइकिलों को लौंच किया। कंपनी के शोरूम में बाइकप्रेमियों पर बहुत बंदिशें नहीं थीं । इसके अलावा कंपनी ने अपनी सवारियों को एक्सपीरिएंस करवाने के लिए कई तरीके की कोशिशें की। कंपनी का वैसे भी नाम मज़बूत था लेकिन इन सब कोशिशों के साथ, कंपनी ने आज की तारीख़ में भारत में भी एक मोटरसाइकिल कल्चर को अपने नाम किया है । ये सच्चाई तो है ही कि आने के दो साल में ही कंपनी ने दो हज़ार मोटरसाइकिलें बेच दी थीं, जो बाकी सुपरबाइक या प्रीमियम बाइक की बिक्री से कही ज़्यादा है।  हर वीकेंड पर देश के कई बड़े शहरों में बाइकर्स एक साथ निकलते हैं और बाइकिंग का मज़ा लेते हैं साथ वक्त गुज़ारते हैं।
मोटरसाइकिलों में तो सिर्फ़ इक्का दुक्का ऐसे उदाहरण हैं, कार कंपनियां इस मामले में कहीं आगे जा चुकी हैं। एक वक्त था जब घर पर मार्केटिंग के लिए धूप-अगरबत्ती और वाटर प्यूरिफ़ायर वाले आते थे। अब लाखों करोड़ों की कार कंपनियां शहर शहर घूम रही हैं, अपनी कारों को बेचने के लिए। भारतीय कार बाज़ार की दुर्गति निकली हुई है, ज़्यादातर कार निर्माता हिचकियां ले रहे हैं। कैसे कार बेचें इसकी तरकीबें सोच रहे हैं। कोई एक के साथ एक फ्री दे रहा है और कोई कार्ड स्क्रैच करने के लिए कह रहा है। ऐसे में लग्ज़री कार कंपनियां भी पीछे नहीं रह रही हैं । आज के दौर में इन कंपनियों ख़ासकर जर्मन कार कंपनियों को जिस आक्रामक मूड में देखा जा रहा है वो अब तक नहीं था। पारंपरिक प्रतिद्वंदी मर्सेडीज़, बीएमडब्ल्यू और ऑडी। ये कंपनियां एक दूसरे से रेस में लगी हैं जिसके लिए पूरे भारत में संभावित बाज़ार ढूंढ रही हैं। जहां पर शोरूम है वहां तो है ही, जहां नहीं है वहां भी कार बेचने की कोशिश ज़ोरदार है। सभी कंपनियां किसी ना किसी तरीके से उन सभी शहरों में अपनी कारों को लेकर पहुंच रही हैं जहां पर पैसे वाले ग्राहकों की संख्या बढ़ी मालूम चली है। और एक समय में संभ्रांत और एक्सक्लूसिव ब्रांड उस गुमान में नहीं दिखते जो कुछ साल पहले था। अब वो सभी ग्राहकों को अपने एक एक फ़ीचर को एक्सपीरिएंस कराने की कोशिश कर रही हैं।
जैसे मर्सेडीज़ और ऑडी अपने ग्राहकों के लिए कुछ अलग तरीके की कोशिश कर रही है। कंपनी ने अपनी कारों की ड्राइव और पर्फोर्मेंस की एक एक बारीकी समझाने के लिए ग्राहकों को रेस ट्रैक पर बुलाने लगे हैं। दोनो ही कंपनी ने कुछ हज़ार रु की फ़ीस लेकर अपनी स्पोर्ट्स कारों का तजुर्बा देने के  लिए प्रोग्राम शुरू किया है। जिन शहरों में रेस ट्रैक नहीं वहां पर ख़ास ट्रैक बना कर ।
कुछ कार कंपनी अपनी कारों के साथ छोटे छोटे ड्राइव भी आयोजित करती हैं। जहां पर पुराने ग्राहक अपनी फ़ैमिली के साथ आते हैं। कस्टमर के साथ ख़ास रिश्ता जोड़ने के साथ कंपनी की ब्रांड बिल्डिंग भी हो जाती है। महिंद्रा का ग्रेट एस्केप रैली ऐसी ही कोशिश है, जहां ग्राहक मुश्किल रास्तों पर अपनी एसयूवी दौड़ाते हैं। टाटा मोटर्स ने भी इसी तरह की कोशिश फ़ुल थ्रॉटल के नाम से शुरू कर रही है।
ऐसी कोशिशों के साथ ना सिर्फ़ ग्राहक बेहतर फ़ैसला कर पाते हैं, बल्कि कार कंपनियों के लिए भी फ़ायदे का सौदा होता है  जहां कई ग्राहक प्रभावित होकर कार ख़रीदने का फ़ैसला तुरंत कर लेते हैं। इसके अलावा ग्राहकों की जानकारी बढ़ती है, मोटरिंग का कल्चर बढ़ता है। सभी तरीके से फ़ाएदेमंद ही कहा जाएगा, जो कार कंपनियां ऐसा नहीं कर रही हैं उन्हें तुरंत शुरू करना चाहिए।