May 21, 2013

Range Rover Evoque


कहानी इवोक की 
एक नई सवारी और एक नया दिन था मेरे लिए, जब सामने थी मेरे रेंज रोवर इवोक। एक नामी ब्रांड की चर्चित एसयूवी। जो भारत में आजकल काफ़ी दिखने लगी है। तो इस गाड़ी को लेकर मैं निकला मिट्टी वाले उबड़ खाबड़ वाले रास्ते पर। और वहां पर ये गाड़ी मस्त होकर भागना शुरू हो गई। और ख़ास बात ये रही कि जब इसे सड़क पर लेकर गया तो भी उतने ही अच्छे से भागी। यानि मिट्टी में एक एसयूवी और सड़क पर कार की तरह। फिर लगा कि 52 से 58 लाख रु की क़ीमत में अगर ऐसा मज़ा नहीं आएगा तो किन गाड़ियों में आएगा। लेकिन ये गाड़ी है दरअसल शौकीनों के लिए। जो इतने पैसे ख़र्च करें इवोक को ख़रीदने के लिए। अब ये कहना ग़लत नहीं होगा कि इस मुख्य बनावट ऐसी है जो इसे ड्राइवरों के लिए ज़ोरदार बनाएगा। पिछली सीट उतनी आरामदेह और जगह वाली नहीं जैसे हम इस कीमत की गाड़ियों में देखते हैं। तो ऐसे में शौक़ीन ही तो इसे लेंगे जिन्हें ऐसी गाड़ियों को चलाने का मन करता है। हां इसकी क़ीमत का तो मसला ही अलग है। 
लेकिन कई बार कहानी जितना हम सोचते हैं उससे लंबी चली जाती है। यानि जहां से शुरू करने की सोचते हैं वहां से भी पीछे जाना पड़ता है। जैसे रेंज रोवर की गाड़ी चलाते हुए मुझे महसूस हुआ। दरअसल पिछले दिनों मुझे मौक़ा मिला रेंज रोवर की नई गाड़ी इवोक चलाने का। ये एक एसयूवी है, जैसे कि रेंज रोवर की सभी गाडियां होती हैं। और इस गाड़ी का कैसे परिचय करवाया जाए अपने दर्शकों से, यही सोच रहा था। सोच इसलिए क्योंकि इस ब्रांड को लेकर लोगों में कई तरीके की उत्सुकता है। उत्सुकता इसलिए क्योंकि जब से टाटा ने इस ब्रांड को ख़रीदा है लोग इसके बारे में सुन तो रहे हैं लेकिन इसकी कहानी साफ़ नहीं हो पा रही थी। इसी वजह से लग रहा था कि इसकी कहानी को केवल इस कार के ज़रिए नहीं समझाया जा सकता है, इसके इतिहास में जाना पड़ेगा। ऐसे में ज़ाहिर सी बात है कि इस ब्रांड के अब तक के सफ़र को देखना पड़ेगा, वो भी रेंज रोवर के नहीं लैंड रोवर के इतिहास को जिसकी शुरूआत हुई थी 1948 में। क्योंकि यही है वो कंपनी जो रेंज रोवर बनाती है।

दूसरे विश्वयुद्द के बाद अमेरिकी जीप की लोकप्रियता ऐसी थी जिसे चुनौती देना मुश्किल था। जीवन मुश्किल हो रहा था और हालात पेचीदा। गा़ड़ियों की उपलब्धता कम थी और पार्ट-पुर्ज़े की मारामारी अलग। ऐसे में एक ब्रिटिश शख़्स इस चिंता में पड़े थे कि कैसे ऐसी गाड़ी तैयार हो जो जीप का विकल्प हो सके । जिनका नाम था मॉरिस विल्क्स । विल्क्स  परेशान थे क्योंकि उनकी ज़िंदगी जीप पर चल रही थी और उन्हें डर था कि इस गाड़ी के ना होने पर क्या होगा। और यही सोचते हुए उन्होंने तैयार किया डिज़ाइन लैंड रोवर का। एक जीप नुमा यूटिलिटी वेह्किल जो किसी भी माहौल में, कैसे भी रास्ते पर चल सके। किसी भी ज़रूरत के लिए। चाहे किसान इससे खेती करना चाहें या ऑफ़रोडिंग के शौकीन इसे मिट्टी कीचड़ में भगा सकें। और गाड़ी इन सब माहौल में ना सिर्फ चली बल्कि दौड़ी। धीरे धीरे इस गाड़ी ने अपनी काबिलियत की वजह से दुनिया भर में नाम कमाया। दुनिया के सबसे मुश्किल रास्तों पर ये गाड़ी भागी। लैंड रोवर प्रेमियों ने ना सिर्फ़ इसे मिट्टी कीचड़ में भगाया, बल्कि पहाड़ियों से लेकर बर्फ़ीली जगहों तक में ले गए। कितने ही देश की सेना ने इसका इस्तेमाल किया। लोगों के इस भरोसे के साथ कंपनी फलती-फूलती गई। कंपनी अगले क़दम के तौर रेंज रोवर लेकर आई। यानि वो एसयूवी जिनमें कार जैसे फीचर्स थे। 1970 से बनने वाली रेंज रोवर ढेर सारे फीचर्स से लैस आरामदेह एसयूवी बनी। कंपनी के लिए ये बेस्टसेलर साबित हुई। वक्त बदला ज़रूरतें बदलीं और इन सबके साथ कंपनी ने अपने प्रोडक्ट भी बदले। कंपनी के सामने हालांकि चुनौतियां भी बढ़ती गईं। जहां पर कंपनी बिकी, बिकी और फिर बिकी। एक वक्त में रोवर कंपनी के अंदर रहने वाला ये ब्रांड बीएमडब्ल्यू के पास गया। फ़ोर्ड ने भी इस ब्रांड को ख़रीदा। आख़िरकार अब ये टाटा के पास चली आई है। और जब से आई है, इसकी किस्मत चमकी है।   
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May 14, 2013

Sail Sedan सेल सेडान


शेवरले की सेल सेडान
जैसा कि बाज़ार में होता है कुछ प्रोडक्ट का इंतज़ार चल रहा होता है और अचानक से बीच में कुछ और आ जाता है और चर्चा पूरी तरह से बदल जाती है। जैसा कि एक बार फिर से हुआ। सभी बात कर रहे थे छोटी सेडान कारों के बारे में और इंतज़ार चल रहा था हौंडा अमेज़ का। जिसे हौंडा मारुति की डिज़ायर के टक्कर में लेकर आ रही है। लेकिन इससे पहले कि वो लौंच हो और उसकी क़ीमतों का ऐलान हो, बीच में अचानक आ गई शेवरले की नई सेडान कार। वो जिसकी चर्चा तो थी लेकिन सेगमेंट पर उसके असर के बारे में बहुत कुछ कहा नहीं गया था। लेकिन कंपनी ने एक ऐसी क़ीमत के साथ अपनी कार को लौंच कर दिया जिसने छोटी सेडान कार को लेकर होने वाली परिचर्चा को बदल दिया। शेवरले ने लौंच की अपनी कार सेल एक सेडान के तौर पर। यानि सेल कार एक डिक्की के साथ। उन भारतीय ग्राहकों के लिए जो चाह रहे हैं अब बड़ी गाड़ी, या कहें थोड़ी बड़ी कार। जिसमें जगह ज़्यादा हो और वक्त पड़ने पर ज़्यादा सामान के साथ लंबे सफ़र पर भी जाया जा सके। और सबसे ख़ास पहलू जिसका ज़िक्र हम कर रहे हैं वो है इस कार की इंट्रोडक्टरी क़ीमत। कंपनी ने इस कार को लौंच किया है पेट्रोल और डीज़ल इंजिन विकल्प के साथ। जहां पेट्रोल सेल सेडान की क़ीमत 4 लाख 99 हज़ार से शुरू होकर 6 लाख 41 हज़ार रु तक जाती है। वहीं डीज़ल सेल सेडान की क़ीमत शुरू होती है 6 लाख 29 हज़ार रु से और जाती है 7 लाख 1 हज़ार रु तक। फिलहाल ये इंट्रोडक्टरी क़ीमत है। लेकिन इस क़ीमत के बारे में ये ज़रूर कहा जा सकता है कि वो ग्राहकों के ज़ेहन में ज़रूर अटकेगी। कार देखने में आकर्षक है। शेवरले की क्रूज़ के लुक से जो लोग इंप्रेस हुए थे उनके लिए वैसे ही डिज़ाइन परंपरा की कार है। वहीं पिछला हिस्सा भी संतुलित और आकर्षक है, जिसके पीछे एक वजह तो ये है कि इसकी लंबाई को ज़बरदस्ती 4 मीटर से छोटा रखने की कोशिश नहीं की गई है। इसकी लंबाई लगभग सवा चार मीटर है। तो लंबाई के हिसाब से तो ये कार स्मॉल कार की कैटगरी में नहीं आती है लेकिन हां इंजिन के हिसाब से ज़रूर आती है। इसमें लगा है 1.2 लीटर पेट्रोल इंजिन और 1.3 लीटर डीज़ल इंजिन। और इन इंजिन के साथ पहला अंदाज़ा तो यही होता है कि कंपनी जल्द एक छोटा और सस्ता वर्ज़न लेकर आएगी। लेकिन अभी इसकी संभावना से कंपनी ने इंकार किया है। शेवरले की सेल के बारे में आपको पता होगा कि इस कार को शेवरले की सहयोगी चाईनीज़ कंपनीSAIC  द्वारा तैयार की गई कार है। आमतौर पर एशियन कार कंपनियां एशियन ग्राहकों की छोटी-छोटी ज़रूरतों को समझती हैं। जिनमें से एक है ज़्यादा सामान रखने के लिए एक्स्ट्रा स्पेस। सेल सेडान में बूटस्पेस के अलावा पिछली सीट के नीचे भी सामान रखने के लिए एक्सट्रा स्पेस दिया गया है। इसके अलावा शेवरले ने अपनी कार को ज़्यादा पैसा वसूल कार बनाने के लिए कार, इंजिन और ट्रांसमिशन पर अलग अलग वारंटी दी है। कुल मिलाकर कोशिश कि ग्राहकों के ज़ेहन में अमेरिकी कारों और उनके रखरखाव को लेकर जो शंका है वो दूर हो। तो इस कार का प्रदर्शन देखना भी दिलचस्प होगा, ख़ासकर तब जब एक और छोटी जापानी सेडान कार लौंच के मुहाने पर है।
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New Thunderbird


एक ऐसी मोटरसाइकिल जिसके साथ मेरी शुरूआत अच्छी नहीं रही थी। रॉयल एनफ़ील्ड थंडरबर्ड। एक क्रूज़र बाइक, जैसी इनफ़ील्ड की सभी मोटरसाइकिलों को हम मानते हैं, जिसका आकार प्रकार भी क्रूज़र जैसा था। लंबी हैंडिल और कम ऊंचाई वाली सीट । वो शेप जिसे आमतौर पर हम अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में क्रूज़र बाइक के तौर पर देखते आए हैं। जब पहली बार ये बाइक आई थी तो मैं इसे चलाने नौएडा और ग्रेटर नौएडा के बीच एक्सप्रेस्वे पर गया था। तब सड़क बन ही रही थी, एक तरफ का ही काम पूरा हुआ था। उसी पर दोनों साइड का ट्रैफ़िक चल रहा था। और उसमें भी ट्रक ज़्यादा। और मेरे ठीक आगे चलने वाले ट्रक ने बीच सड़क ऐसी ब्रेक लगाई की कहानी ख़राब हो गई। बिना इंडीकेटर, बिना ब्रेक लाइट के ट्रक को रुका हुआ समझने में जितना वक्त लगा वो एक ऐक्सिडेंट के लिए काफ़ी था। मैंने ब्रेक किया, बाइक स्किड कर गई, कई मीटर तक घिसटती गई, साथ में मैं भी । ख़ैर । जैसा कि हर ऐक्सिडेंट के बाद होता है आप उसके हर पहलू को दिमाग़ में कई बार ध्यान दुहराते हैं, सोचते हैं। तो बहुत सारी चीज़ों में एक ख़ास चीज़ नए थंडरबर्ड ने लगा फ्रंट डिस्क ब्रेक। मेरे पास ख़ुद भी एक बुलेट ही थी और उसके ब्रेक की मुझे आदत थी, लेकिन थंडरबर्ड का डिस्क ब्रेक कहीं ज़ोरदार था। अगला पहिया तो वक्त से रुक गया, पिछला नहीं । पहली मुलाक़ात जब ऐसी रोमांचक थी तो याद तो आती ही। वैसे अब जो नई थंडरबर्ड आई है उसमें पिछले पहिए में भी डिस्क ब्रेक दिया गया है। लेकिन ये तो एक पहलू है। इसके अलावा भी कई बदलाव हैं जो नई थंडरबर्ड 500 को अहम बनाते हैं। ना सिर्फ़ ग्राहक के लिए बल्कि कंपनी के लिए भी। मोटरसाइकिल अब नए इंजिन, फीचर्स और लुक के साथ आई है। 500 सीसी का इंजिन अब लगभग 27 बीएचपी की ताक़त दे रहा है। जो इसे तेज़-तर्रार तो बनाती है। इसके अलावा छोटे मोटे ऐसे बदलाव हैं जो रॉयल एनफ़ील्ड की बदलती कहानी बयान कर रहे हैं। पिछले पहिए में डिस्क ब्रेक के बारे में तो बता दिया, लेकिन इसका असर एनफ़ील्ड की राइड पर कैसा पड़ा है वो भी बता दूं। आमतौर पर एनफ़ील्ड की मोटरसाइकिलों की ब्रेकिंग हमेशा से बड़ा मुद्दा रही है। कमसेकम वैसे ब्रेक नहीं रहे हैं जैसा आजकल हम बाकी मोटरसाइकिलों में देखते रहे हैं। लेकिन अब एनफ़ील्ड ने उस कमी को पूरा किया है। दोनों पहियों में डिस्क के बाद एक संतुलन और कांफिडेंस महसूस होता है राइडर को।  और केवल ब्रेक ही क्यों इंजिन और गियरशिफ़्ट भी अब राइड का कहीं बेहतर तजुर्बा दे रहे हैं। शहर के बाहर ही नहीं, शहरी ट्रैफ़िक में भी। लेकिन वो तो एक पहलू है। इस मोटरसाइकिल को नया बनाने के लिए और भी कई काम किया है कंपनी ने। जैसे टेक्नॉलजी को अपडेट करना। आमतौर पर देखते रहे हैं कि मोटरसाइकिल कंपनियां जो भी टेक्नॉलजी लाएं, फीचर्स लाएं, एनफ़ील्ड मोटरसाइकिलों में वो नहीं आते थे। जिसकी एक वजह थी ग्राहकों का प्यार, जो किसी भी हालत में एनफ़ील्ड ही लेना चाहते थे, फ़ीचर्स कैसे भी हों । लेकिन हाल में हार्ली डेविडसन ने एक तरह से क्रूज़र बाइक्स की दुनिया को भारत में बदला है। हालांकि एनफ़ील्ड के मुक़ाबले बहुत महंगी हैं लेकिन फिर भी ग्राहकों को नई टेक्नॉलजी और फ़ीचर्स से तो परिचित करवाया ही है। और इस नए और बदले माहौल में थंडरबर्ड एक ऐसी ही कोशिश लग रही है। डिजिटल डिस्प्ले लगा हुआ है इसके इंस्ट्रुमेंटेशन में। जिसमें फ़्यूल गेज और घड़ी के अलावा ट्रिपमीटर भी लगेगा। अब रॉयल एनफ़ील्ड की मोटरसाइकिल में एलईडी लाइट भी मिल रहा है। और ये सब दिल्ली में लगभग 1 लाख 57 हज़ार रु के एक्सशोरूम क़ीमत में मिल रहा है। 
तो लग रहा है कि कांपिटिशन का असर हो रहा है। टेक्नॉलजी बदल रही है, नज़रिया बदल रहा है। एक वक्त का आरामतलब ब्रांड ख़ुद को नए तरीके से बदलने की कोशिश कर रहा है। और इन सबके बीच ग्राहकों के लिए विकल्पों में बढ़ोत्तरी हो रही है। 

May 12, 2013

Lifestyle Biking 2013


सुपर 2013
अगर सबकुछ अपनी रफ़्तार से चला और वो लौंच देखने को मिले जिनकी योजना थी तो साल 2013 मोटरसाइकिलों के लिए भी एक ख़ास साल रहेगा। वो भी बड़ी मोटरसाइकिलों के इलाक़े में, वो मोटरसाइकिलें जिन्हें लोग शौक की वजह से ख़रीदते हैं ज़रूरत के लिए नहीं। पिछले दो-तीन सालों में, ख़ास तौर पर हार्ली डेविडसन के भारत आने के बाद हमने भारतीय लाइफ़स्टाइल बाइकिंग में ठोस तब्दीलियां देखी हैं। कंपनी ने लगभग दो साल में दो हज़ार के आसपास मोटरसाइकिलें बेची हैं। और ये संख्या केवल इस कंपनी के बारे में नहीं बता रहा है बल्कि बाज़ार के बारे में भी बता रहा है, ग्राहकों के बारे में भी । वो मोटरसाइकिलें, जिसका सबसे सस्ता मॉडल साढ़े पांच लाख रु के आसपास शुरू होता है, जो सिर्फ़ क्रूज़र बाइक्स बनाती है, उसने क्या ऐसा किया जो सही था। तो इसमें कंपनी की सभी कोशिशों को याद करना पड़ेगा, जिनमें अच्छे प्रोडक्ट, भारतीय बाज़ार के मद्देनज़र सस्ते प्रोडक्ट, आकर्षक पेमेंट स्कीम से लेकर ठोस आफ़्टर सेल्स सर्विस नेटवर्क की कवायद भी थी। इस कंपनी के अभी तक के प्रदर्शन से कुछ चीज़ें साफ़ हुई हैं, बाज़ार थोड़ा ऑर्गनाइज़्ड दिख रहा है। पहले लाखों की मोटरसाइकिलों का बाज़ार बहुत उहापोह में दिखता था। कुछेक पॉकेट्स में और चुनिंदा शहरों में। ये भी साफ़ हुआ है कि अगर भरोसा दिलाया जाए तो हिंदुस्तानी ग्राहक लाखों रुपए मोटरसाइकिल पर ख़र्च करने से नहीं डरेंगे। 2013 के बारे में बात करते हुए इस पुरानी कहानी का ज़िक्र करना इसलिए ज़रूरी था क्योंकि एक बड़ा ब्रांड जो इस साल भारत में अपने प्रोडक्ट ला सकती है, उसके लिए हार्ली का सफ़र एक बड़ी सीख हो सकता है। ये वो कंपनी है जिसने भारत में आने का ऐलान 2012 की शुरूआत में ही कर दिया था। ब्रिटिश मोटरसाइकिल कंपनी ट्रायंफ़। कंपनी ने ना सिर्फ़ ऐलान किया था भारत में एंट्री के बारे में बल्कि मोटरसाइकिलों की फ़ाइनल लिस्ट और उनकी क़ीमतों का ऐलान भी कर दिया। लेकिन 2012 के भीतर लौंच का वायदा पूरा नहीं कर पाई। जो अच्छी शुरूआत नहीं कही जा सकती है। लेकिन उम्मीद यही है कि इस साल भी आ जाए वक्त पर तो ज़्यादा नुकसान नहीं होगा। ये एंट्री मुझे इसलिए भी ख़ास लग रही है क्योंकि ट्रायंफ़ मोटरसाइकिल कंपनी हार्ली से जुदा है। केवल अमेरिकी और ब्रिटिश कंपनी की बात नहीं है। ट्रायंफ़ का पोर्टफ़ोलियो कहीं ज़्यादा विस्तृत है। जहां हार्ली केवल क्रूज़र मोटरसाइकिलें बनाती है वहीं ट्रायंफ़ के पास हर तरीके की मोटरसाइकिलें हैं जो ना सिर्फ़ ग्राहकों को विकल्प देंगी बल्कि ग्राहकों को नए कौंसेप्ट से परिचित भी करवाएगी। यानि अब तक हम हिंदुस्तानी मोटरसाइकिल प्रेमी दो तरीके की बड़ी मोटरसाइकिलों को जानते हैं सुपरबाइक्स और क्रूज़र। लेकिन ट्रायंफ़ ने अपने पत्ते सही खोले तो ग्राहक उसकी टूरिंग मोटरसाइकिलों को पहचान पाएंगे, क्लासिक सिटी स्पोर्ट्स बाइक जान पाएंगे, ऑफ़ रोड मोटरसाइकिलें भी देख पाएंगे। लेकिन उन सबके लिए ग्राहक जाएं इससे पहले कंपनी को अपनी तरफ़ से गंभीरता दिखानी पड़ेगी, ठोस रणनीति और नेटवर्क के साथ । लेकिन सवाल ये है कि क्या कंपनी कर पाएगी ये सब ? जवाब वही जानती है कि कितना आत्मविश्वास है और भारतीय बाइकरों पर विश्वास है। लेकिन केवल एक कंपनी ही साल को ख़ास नहीं बनाएगी भारतीय बाइक बाज़ार को। ये सिर्फ़ एक सिरा है। बाकी प्रोडक्ट और भी हैं। 
जिस सेगमेंट के बढ़ने का इंतज़ार मैं कई सालों से कर रहा था वो अब दिख रहा है। यानि किफ़ायती मोटरसाइकिलों और सुपरबाइक्स के बीच के सेगमेंट में इस साल कई एंट्री हम देख सकते हैं। वैसे इस सेगमेंट में हाल में जो गतिविधियां दिखी हैं वो बता रही हैं कि ये सेगमेंट काफ़ी ज़ोरों से बढ़ रहा है। और इसके अगले चैप्टर इस साल देखेंगे। जैसे हौंडा की तरफ़ से हमने ढाई सौ सीसी की मोटरसाइकिल देखी सीबीआर 250 के तौर पर, फिर 150 सीसी की स्पोर्ट्स बाइक आई। अब इस साल हौंडा की 500 सीसी वाली नई सीबीआर हम देख सकते हैं, जिसे कंपनी ने अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में पेश किया था। वहीं एक सीनियर बाइक आ सकती है केटीएम की तरफ़ से। केटीएम ने अपनी 200 सीसी की ड्यूक को काफ़ी इंतज़ार करवाने के बाद भारत में पेश किया था और अब वो लेकर आ रही है अपनी ड्यूक 390। देखते हैं कि इसकी क़ीमत क्या होती है। वैसे इनके अलावा भी कुछ मोटरसाइकिलों की फेहरिस्त है। और इनकी क़ीमत 4 लाख रु के इर्दगिर्द रह सकती है। 
तो इन सब मोटरसाइकिलों के लौंच की वजह से साल 2013 को शायद वो साल पुकारा जा सकता है जब लाइफ़स्टाइल बाइकिंग भारतीय बाइकर्स के लाइफ़स्टाइल का हिस्सा बने।
Published in jan 2013

May 11, 2013

मंद-मंद-मंदी


मंदी एक सच्चाई है और सुविधा एक अलग सच्चाई। हां लोग ख़र्च करने से बच रहे हैं। गाड़ियों की ख़रीद को या तो टाल रहे हैं या फिर बारीक तराज़ू से तौल तौल कर पैसा वसूल कार ख़रीद रहे हैं। और इनके अलावा सिर्फ़ वही गाड़ियां ख़रीद रहे हैं जो कोई एक ख़ास कार ख़रीदना ही चाहते हैं। यानि शौकीन।

तो बदले वक्त में नए पैमाने इस कार बाज़ार के उस हिस्से को भी बढ़ते देख रहे हैं जिनको कुछ साल पहले तक बहुत ही ऐहतियात से बढ़ते देखा था। जैसे ऑटोमैटिक कारें। वो वक्त चला गया है जब ग्राहक सिर्फ़ माइलेज के नाम पर ऑटोमैटिक कारों को ख़ारिज कर देते थे। आमतौर पर ऑटोमैटिक कारों की माइलेज मैन्युअल ट्रांसमिशन से कम ही होता रहा है। और भारत जैसे देश के ग्राहकों के लिए हर छोटा अंतर भी बहुत रहा है। हां साथ में ये भी ज़रूर हुआ है कि इस ट्रांसमिशन पर भरोसा भी बढ़ा है ग्राहकों के बीच।

ऑटोमैटिक कारों और ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन के मेकेनिज़्म की समझ भी अब थोड़ी बेहतर हुई है। बिना गियर और क्लच वाली गाड़ी के तौर पर। इसीलिए अब छोटी कारों में ऐसे ट्रांसमिशन पहले से कहीं ज़्यादा आ रहे हैं। पहले जहां मारुति और ह्युंडै के पास सिर्फ़ नाम के लिए ऑटोमैटिक कारें थीं, अब वो कोशिश में हैं इस सेगमेंट में बिक्री बढ़ाने की ।
तो ऐसे में अगर इन गाड़ियों पर नज़र डाली जाए तो ग़लत नहीं होगा। मारुति जो अपनी पैसा वसूल कारों के लिए जानी जाती है उसने हाल ही में ए स्टार कार को ऑटोमैटिक अवतार में उतारा था। कंपनी ने माइलेज के अंतर को कम करने की भी कोशिश की है। इसकी एक्स शो रूम क़ीमत है 4 लाख 61 हज़ार रु। मारुति की रिट्ज़ भी आ चुकी है बाज़ार में 6 लाख 15 हज़ार रु के एक्सशोरूम क़ीमत के साथ। ये भी छोटी हैचबैक कारों का सेगमेंट है। स्विफ़्ट और एस्टार के बीच।
केवल मारुति ही नहीं ह्युंडै ने भी अपने प्रोडक्ट की संख्या बढ़ाई है। आई 10 सवा पांच से सवा छह लाख रु के बीच है । साथ में आई-20 भी आती है ऑटोमैटिक अवतार में। इसमें एक और एंट्री है जो हाल में आई है। हौंडा की ब्रियो ऑटोमैटिक। यहां पर हौंडा के पास डीज़ल अवतार नहीं था तो कंपनी ने अपना पोर्टफ़ोलियो बढ़ाने के लिए ऑटोमैटिक अवतार चुना। पौने छह से छह लाख रु के बीच।
तो कुल मिलाकर बदलती अर्थव्यवस्था और लाइफ़स्टाइल में इनकी जगह बनती भी जा रही है। जहां सड़कों पर ज़्यादा ज़िंदगी गुज़र रही है, घर में कम। परिवार के साथ कम। भारत में ट्रैफ़िक व्यवस्था जैसी हो रही है, प्लानिंग जैसी देखी जा रही है उसमें स्थिति और भयावह ही होगी। तो ऐसे में ग्राहक बिना क्लच वाली कार लेकर अपने पैर और हाथ को आराम देना चाहते हैं।