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May 14, 2013

Sail Sedan सेल सेडान


शेवरले की सेल सेडान
जैसा कि बाज़ार में होता है कुछ प्रोडक्ट का इंतज़ार चल रहा होता है और अचानक से बीच में कुछ और आ जाता है और चर्चा पूरी तरह से बदल जाती है। जैसा कि एक बार फिर से हुआ। सभी बात कर रहे थे छोटी सेडान कारों के बारे में और इंतज़ार चल रहा था हौंडा अमेज़ का। जिसे हौंडा मारुति की डिज़ायर के टक्कर में लेकर आ रही है। लेकिन इससे पहले कि वो लौंच हो और उसकी क़ीमतों का ऐलान हो, बीच में अचानक आ गई शेवरले की नई सेडान कार। वो जिसकी चर्चा तो थी लेकिन सेगमेंट पर उसके असर के बारे में बहुत कुछ कहा नहीं गया था। लेकिन कंपनी ने एक ऐसी क़ीमत के साथ अपनी कार को लौंच कर दिया जिसने छोटी सेडान कार को लेकर होने वाली परिचर्चा को बदल दिया। शेवरले ने लौंच की अपनी कार सेल एक सेडान के तौर पर। यानि सेल कार एक डिक्की के साथ। उन भारतीय ग्राहकों के लिए जो चाह रहे हैं अब बड़ी गाड़ी, या कहें थोड़ी बड़ी कार। जिसमें जगह ज़्यादा हो और वक्त पड़ने पर ज़्यादा सामान के साथ लंबे सफ़र पर भी जाया जा सके। और सबसे ख़ास पहलू जिसका ज़िक्र हम कर रहे हैं वो है इस कार की इंट्रोडक्टरी क़ीमत। कंपनी ने इस कार को लौंच किया है पेट्रोल और डीज़ल इंजिन विकल्प के साथ। जहां पेट्रोल सेल सेडान की क़ीमत 4 लाख 99 हज़ार से शुरू होकर 6 लाख 41 हज़ार रु तक जाती है। वहीं डीज़ल सेल सेडान की क़ीमत शुरू होती है 6 लाख 29 हज़ार रु से और जाती है 7 लाख 1 हज़ार रु तक। फिलहाल ये इंट्रोडक्टरी क़ीमत है। लेकिन इस क़ीमत के बारे में ये ज़रूर कहा जा सकता है कि वो ग्राहकों के ज़ेहन में ज़रूर अटकेगी। कार देखने में आकर्षक है। शेवरले की क्रूज़ के लुक से जो लोग इंप्रेस हुए थे उनके लिए वैसे ही डिज़ाइन परंपरा की कार है। वहीं पिछला हिस्सा भी संतुलित और आकर्षक है, जिसके पीछे एक वजह तो ये है कि इसकी लंबाई को ज़बरदस्ती 4 मीटर से छोटा रखने की कोशिश नहीं की गई है। इसकी लंबाई लगभग सवा चार मीटर है। तो लंबाई के हिसाब से तो ये कार स्मॉल कार की कैटगरी में नहीं आती है लेकिन हां इंजिन के हिसाब से ज़रूर आती है। इसमें लगा है 1.2 लीटर पेट्रोल इंजिन और 1.3 लीटर डीज़ल इंजिन। और इन इंजिन के साथ पहला अंदाज़ा तो यही होता है कि कंपनी जल्द एक छोटा और सस्ता वर्ज़न लेकर आएगी। लेकिन अभी इसकी संभावना से कंपनी ने इंकार किया है। शेवरले की सेल के बारे में आपको पता होगा कि इस कार को शेवरले की सहयोगी चाईनीज़ कंपनीSAIC  द्वारा तैयार की गई कार है। आमतौर पर एशियन कार कंपनियां एशियन ग्राहकों की छोटी-छोटी ज़रूरतों को समझती हैं। जिनमें से एक है ज़्यादा सामान रखने के लिए एक्स्ट्रा स्पेस। सेल सेडान में बूटस्पेस के अलावा पिछली सीट के नीचे भी सामान रखने के लिए एक्सट्रा स्पेस दिया गया है। इसके अलावा शेवरले ने अपनी कार को ज़्यादा पैसा वसूल कार बनाने के लिए कार, इंजिन और ट्रांसमिशन पर अलग अलग वारंटी दी है। कुल मिलाकर कोशिश कि ग्राहकों के ज़ेहन में अमेरिकी कारों और उनके रखरखाव को लेकर जो शंका है वो दूर हो। तो इस कार का प्रदर्शन देखना भी दिलचस्प होगा, ख़ासकर तब जब एक और छोटी जापानी सेडान कार लौंच के मुहाने पर है।
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September 24, 2011

X-Y-Z Factor



ये मेरी पर्सनैलिटी का एक्सटेंशन हैये जवाब था यंगिस्तान के एक नौजवान का। जब मैंने उसकी मॉडिफ़ाइड कार के बारे में पूछा था। जो लाल और काले रंग में लिपटी चमचमा रही थी। अंदर कई गैजेट्स और बाहर में चटख़ रंग-रोगन। जिसे देखकर पहचानना मुश्किल था कि ये लांसर कार है। ये कुछ साल पहले की बात हैजब एक स्टोरी के सिलसिले में इस नौजवान से मैं मिला था जो अपनी कार के ज़रिए अपना परिचय दे रहा था।
आज के वक्त में ज़रूर कहूंगा कि हम अपनी पसंद और नापसंद को लेकर इतने साकांक्ष हो गए हैंइतनी अवेयरनेस बढ़ गई हैकि उसकी बारीकियां कई बार दिमाग़ चाट जाती हैं। कौन सा रंग पसंद हैकौन सा कूज़ीन या भोजन किस मौसम में छुट्टी के लिए कहां जाना है और किस रेस्त्रां का कौन सा आइसक्रीम पसंद है...ये सब हमें मालूम है। और बताने की चाहत भी। इनमें से थोड़ा बहुत पुराने जेनरेशन को भी पता था लेकिन इसका प्रदर्शन नहीं था।
पहले की बात और थी जब विकल्प नहीं थाएंबैसेडर और प्रिमियर पद्मिनी के साथ बहुत एक्सक्लूसिव नहीं दिख सकते थे। लेकिन हम और आप साकांक्ष हैं यानि कौनश्यस हैं गाड़ी के लुक को लेकर भी। दुनिया भर की तरह अब भारत में भी आ रही है ये सोच कि हमारी पर्सनैलिटी का एक तरह से एक्स्प्रेशन है हमारी गाड़ी।
तो पहले जहां ज़्यादा से ज़्यादा ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए न्यूट्रल किस्म के डिज़ाइन देखते थे वहीं अब कारों के लुक में ख़ास कैरेक्टर झलकने लगे हैं।

जैसे शेवरले की बीट आपको याद होगीलुक ऐसा था कि यंग लोगों को ख़ासी पसंद आई थी। और उसे डिज़ाइन भी ऐसा ही किया गया था शेवरले के कोरियन डिज़ाइनरों द्वारा। ऐसा डिज़ाइन जो कुछ को बहुत पसंद आया कुछ को बिल्कुल नहीं। ऐसा ही रहा मारुति रिट्ज़ के साथ भी। कार के पिछले हिस्से को नाम दिया गया बूमरैंग शेप। जो बीच में दबी सी नज़र आती हैइसके साथ भी वही मुद्दा । भले ही एक ख़ास लुक कार के बाज़ार को सीमित करेलेकिन उस कार को चलाते को देख ये ज़रूर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इंसान कैसा होगा।
इसी का अगला लेवल देखने को मिला ह्युंडै की नई वर्ना में। दुनिया के कई बाज़ार में ये ऐक्सेंट के नाम से बिकती है। और उसी कार के टेस्ट ड्राइव में मैं दुबई गया था तब उस कार के नाम पर फ़्लूइडिक नहीं जुड़ा था। वहां पर सिंपल ऐक्सेंट या कहें वर्ना थी।
 लेकिन भारत में लौंच के साथ ही इसे पेश किया गया फ़्लूइडिक वर्ना के तौर पर। दरअसल वर्ना को जिस कौंसेप्ट के आधार पर डिज़ाइन किया गया उसका नाम ह्युंडै ने फ़्लूइडिक डिज़ाइन रखा है। ऐसे में भारत में इसके लुक को और प्रचलित करने के लिए कंपनी ने ऐसा क़दम उठाया। जिसके साथ उस कार को एक कैरेक्टर मिला जो अब तक वर्ना में नही दिखा।
और अब लुक के मामले में एक और कार ज़िक्र करने लायक है। नई फ़ोर्ड फ़िएस्टा ।
 कार के डिज़ाइन को फ़ोर्ड ने काइनेटिक डिज़ाइन का नाम दिया है। यानि वो डिज़ाइन जो रुकी कार को भी गतिशील या रफ़्तार में दिखाए। ज़रूरी नहीं कि ये लुक सबको पसंद ही आए लेकिन ये तय है कि कार को एक पहचान मिली। पहले फ़िएस्टा बस एक कार थीबिना किसी कशिश या कहें एक्स फ़ैक्टर के साथ। अब वो इस डिज़ाइन से उसे मिला।
कुल मिलाकर लोगों के बदलते मूड को देखते हुए कंपनियां अपनी कारों को ज़्यादा से ज़्यादा आकर्षक बनाने की कोशिश में हैं। जिससे पहली नज़र में ही लोग उसे पसंद कर लें।
मेरे पसंदीदा लेखकों या कॉलमिस्ट में से एक माल्कम ग्लैडवेल का कहना है कि पहली नज़र में प्यार जैसी चीज़ शायद कुछ नहीं होती...कई मनोवैज्ञानिकों के रीसर्च की बदौलत बताते हैं कि ये दिल दा मामला नहीं होताबल्कि दिमाग़ के उस हिस्से का कमाल होता है जो किसी भी चीज़ को पहली नज़र में ही नाप लेता हैआपकी पसंद नापसंद के फाइल से मैच करता है और फिर आपको बता देता है कि वो आपको पसंद आनी चाहिए या नहींऔर ये कैल्कुलेशन इतना तेज़ होता है कि हमें भरोसा ही नहीं हो पाता कि हमारा दिमाग़ इतनी तेज़ी से कैसे सब सोच सकता हैलेखक के मुताबिक ये प्रक्रिया हमारे पलक झपकने में लेने वाले वक्त में पूरी हो जाती है। ख़ैर इस सच्चाई को अंतिम ना मानें और अपनी फ़िल्मों के सीन के रोमांस को कम ना होने दें। मैने नहीं होने दियालेकिन इस थ्योरी की अहमियत ज़रूर मानता हूं।
कहने का मतलब ये कि भले ही लुक से हम आकर्षित हों लेकिन गाड़ियों के मामले में फ़ाइनल फ़ैसले के पीछे सब कुछ कैलकुलेट होता हैमाइलेजमेंटेनेंसआफ़्टर सेल्स सर्विस...सब कुछ। यानि एक्स फ़ैक्टर के साथ वाई और ज़ेड फ़ैक्टर भी।
(*already published)