December 21, 2014

गाड़ी शाही- सर्विस नहीं


भारत में लग्ज़री कारों की बिक्री कैसे बढ़ रही है ये किसी से छुपा नहीं है। सड़कों पर मर्सेडीज़, बीएमडब्ल्यू और ऑडी की संख्या इतनी बढ़ चुकी है कि एक वक्त में इन कंपनियों की हर कार को शाही कार मानने वाली सोच भी अब जाती नज़र आ रही है। और ना सिर्फ़ आम लोगों में ये सोच झलक रही है बल्कि ग्राहकों में भी। अब इन कारों के ग्राहक भी ख़ुद वैसा शाही महसूस नहीं कर रहे हैं।

पिछले एक साल में लग्ज़री कारों की बिक्री लगभग दुगनी बढ़ी है। 2013 में लगभग 16 हज़ार कारें बिकी थीं, वहीं इस साल 35 हज़ार से ऊपर कारें, ज़ाहिर है इस बढ़ोत्तरी का दबाव कंपनियों के डीलरशिप और वर्कशॉप पर भी दबाव बढ़ा है। और इस दबाव का असर ग्राहकों की संतुष्टि पर भी पड़ा है जिसे मापने का काम करती है जे डी पावर एशिया पेसिफिक। जिसके 2014 के लग्ज़री सेगमेंट के कस्टमर सर्विस इंडेक्स स्टडी में यही बातें सामने आई हैं। 

कंपनी ने लग्ज़री कारों के 257 ऐसे ग्राहकों से बात की, जिनमें एक से दो साल पुराने मर्सेडीज़, ऑडी और बीएमडब्ल्यू ग्राहक थे। स्टडी में पूछा गया कि सर्विस की क्वालिटी, गाड़ी के पिकप, सर्विस एडवाइज़र, सर्विस फेसिलिटी और सर्विस की शुरूआत से। इन सब पैमानों के लिए अलग अलग अंक दिए गए थे और सभी कंपनियों को कुल हज़ार प्वाइंट के स्केल पर मापा गया। और इस पैमाने पर पिछले साल के मुक़ाबले ग्राहकों कम संतुष्ट हैं। सर्विसिंग की शुरूआत और फेसिलिटी को लेकर ग्राहक सबसे नाख़ुश थे। जिन रेटिंग में पिछले साल के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा गिरावट दर्ज की गई।

इन सबका मतलब ये है कि ग्राहकों को सर्विसिंग के लिए अब पहले से ज़्यादा इंतज़ार करना पड़ता है। सर्विस होकर गाड़ी तैयार होने में भी वक्त ज़्यादा लगता है। ग्राहकों को इस देरी के बारे में सही जानकारी नहीं दी जाती।

इस स्टडी में नंबर एक पर मर्सेडीज़ रही, दूसरे पर बीएमडब्लूय और तीसरे पर ऑडी रही। 

*Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । कहीं ना कहीं छपी हुई है

November 18, 2014

कौंपैक्ट सेडान में एक्सेंट

कुछ गाड़ियां ऐसी हैं जिन्हें देखकर कम लोग रुकते हैं, या देखने के लिए कम लोग रुकते हैं, उनमें से एक हैं कौंपैक्ट सेडान सेगमेंट की कारें। किसी भी टेस्ट ड्राइव के वक्त ये दिलचस्प ऑबज़र्वेशन होता है, किस नई कार या सवारी को देखकर कैसी प्रतिक्रिया देखने को मिलती है। सुपरबाइक को तो पूछिए मत, कोई एसयूवी हो तो भी काफ़ी दिलचस्पी होती है, नई छोटी हैचबैक कारों के लिए भी अक्सर बहुत उत्सुकता देखने को मिलती है सड़कों पर, लेकिन आमतौर पर छोटी सेडान कारों में शायद वो ग्लैमर या अपील नहीं कि नाहक ही कोई रुक कर उन्हें देखे। हां वो ज़रूर रुकते हैं जो इस सेगमेंट की कार के बारे में सोच रहे हैं। और ये देखकर इस सेगमेंट के बारे में छोटा सा कन्क्लूज़न तो निकाला ही जा सकता है। वो ये कि यहां पर ग्लैमर या अपील भले ही ना हो लेकिन प्रैक्टिकल ज़रूर हैं। इसीलिए हम देख रहे हैं कि इस सेगमेंट में तीस फीसदी से  थोड़ी ही कम बढ़ोत्तरी देखने को मिली थी पिछले साल, और हर महीने इस सेगमेंट में लगभग 24-25 हज़ार कारें बिक रही हैं। जहां पर एक चतुराई से शुरू हुआ सेगमेंट लगातार बढ़ता गया और ग्लोबल कंपनियों ने उसके हिसाब से अपनी स्ट्रैटजी बदली और आज भी हम नए नए प्रोडक्ट इसमें देख रहे हैं। ह्युंडै एक्सेंट उसी कड़ी में अगली कार है। जिसे ग्रैंड आई 10 के प्लैटफॉर्म पर कंपनी ने बनाया और अब जब से लौंच हुई है तब से एक महीने में 11 हज़ार बुकिंग पा गई। ये ह्युंडै के लिए तो बढ़िया ख़बर है ही, साथ में इस सेगमेंट के बारे में भी साफ़ हो रहा है कि नए प्रोडक्ट की गुंजाईश अभी भी है। नई एक्सेंट को चलाने का मौक़ा जब मिला तो इसी सबसे जुड़ा सवाल था कि जिस सेगमेंट में डिज़ायर और अमेज़ का राज है वहां पर और क्या गुंजाईश बची है किसी कार के लिए। 
एक्सेंट को पहली नज़र में देखिए और आपको ग्रैंड आई 10 की याद आएगी। बुनियाद तो है ही। चेहरा मोहरा बिल्कुल वही है। ह्युंडै की फ़्लूइडिक डिज़ाइन फ़िलॉसफ़ी के तहत जो भी कारें आई हैं, आकर्षक रही हैं। भीड़ से अलग दिखती हैं। ऐसे में एक्सेंट भी उसी परिवार का हिस्सा लगेगी। लेकिन हैचबैक से सेडान बनी कारों में हम पिछले हिस्से पर ज़्यादा ध्यान देते हैं कि डिक्की लगाते लगाते कार को बदसूरत तो नहीं बना दिया गया है, या फिर कार उटपटांग तो नहीं दिख रही है। और ऐसे में कहूंगा कि डिज़ाइनर ने अच्छे तरीके से बूट यानि डिक्की को अगले हिस्से से मिलाया है। मुझे बहुत ख़ूबसूरत तो नहीं लगी लेकिन देखने में ठीक लगती है। हां ये भी याद रखने वाली बात है कि ह्युंडै इसके बूटस्पेस के बारे में बता रही है कि ये सेगमेंट में सबसे ज़्यादा बूटस्पेस के साथ आने वाली कार है। 
और जगह के मामले में कार के अंदर भी मामला अच्छा ही है। पिछली सीट पर जगह काफ़ी अच्छी सी है, जिसे लेगरूम और नी रूम कहते हैं। छोटी कार होने के हिसाब से पैर रखने के लिए ठीक ठाक जगह। दो लोग आराम से, तीन लोग थोड़े कम आराम से बैठ सकते हैं। सीट भी ठीक ठाक आरामदेह है। जिस डीज़ल वेरिएंट को मैंने चलाया वहां पर पिछली सीट के लिए रियर एसी वेंट दिया गया था। तो ये इस सेगमेंट के हिसाब से एक्सक्लूसिव आरामदेह फ़ीचर। अगली सीट या ड्राइवर सीट पर जाकर एक्सेंट सबसे प्रभावशाली लगती है। जहां ग्रे और भूरे रंग में मिलाकर बनाए डैश के बीच में अच्छे डिज़ाइन के साथ कार के बटन, नॉब, और एसी वेंट को पेश किया गया है। म्यूज़िक के लिए ऑक्स इन और यूएसबी पोर्ट भी दिया गया है। यहां पर आपको आकर कार अपने सेगमेंट से बेहतर प्रीमियम लुक और फ़ील देगी। स्टीयरिंग पर आपके लिए म्यूज़िक के साथ मल्टीमीडिया कंट्रोल दिया गया है। तो इस फ्रंट पर कार लोडेड है। 
जब आप चलाना शुरू करते हैं कार को तब लगता है कि आप किस सेगमेंट की कार को चला रहे हैं। इसके ड्राइव में रोमांच नहीं प्रैक्टिकैलिटी महसूस होगी। ज़ाहिर है कार का मक़सद भी यही होना है। ग्राहकों की नज़र में इसमें लगे 1.1 लीटर डीज़ल इंजिन से कार की निकलने वाली साढ़े 24 किमीप्रतिलीटर की माइलेज को ज़्यादा तरजीह दी जाएगी बजाय इससे निकलने वाली बीएचपी को। या फिर टॉप स्पीड को। जो इसे फ़ैमिली कार बनाए बजाय स्पोर्ट्स कार बनाने के। तेज़ रफ़्तार पर हैंडलिंग में बेहतरी की गुंजाईश है लेकिन मोटे तौर पर आम ड्राइविंग हालात में कार की ड्राइव संतोषजनक कही जाएगी। 
तो इस व्यवहारिक पैकेज को ह्युंडै ने अमेज़ और डिज़ायर से सस्ते में पेश किया है। इसके पेट्रोल वर्ज़न में मैन्युअल और ऑटोमैटिक विकल्प भी हैं, एक्स शोरूम क़ीमत चार लाख 66 हज़ार से 7 लाख 20 हज़ार रु के बीच है। वहीं डीज़ल वर्ज़न की एक्सशोरूम क़ीमत लगभग पांच लाख 66 हज़ार से सवा सात लाख के आसपास है। इसकी शुरूआती क़ीमतें अमेज़ और डिज़ायर से कम हैं। यानि लड़ाई ने नया मोड़ ले लिया है। जंग और बढ़ेगी जब कुछ और प्रोडक्ट यहां आ जाएंगे।


((कुछ वक़्त पहले छपी..))

November 12, 2014

क्या चीज़ है ये मार्केज़ !!!


कोई बहुत ज़ोरदार फॉलोवर नहीं हूं मैं मोटरस्पोर्ट्स का। मोटरस्पोर्ट्स की दुनिया में क्या चल रहा है ये नज़र रहती है, रखनी भी पड़ती है…लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं फ़ॉर्मूला वन के एक-एक पल के बारे में पूरी जानकारी रखता हूं, रेसरों की ज़िंदगी और रेसिंग से जुड़े एक एक पल, उनकी कहानियों और किंवदंतियों के बारे में बहुत डीटेल में जाने का वक़्त नहीं मिल पाता है। लेकिन ऐसा नहीं कि इस मसरूफ़ियत के बीच मैं वो पल भूल जाऊं कि कैसे मैंने वैलेंटीनो रॉसी से मुलाक़ात की थी और कैसे उसके साथ फ़ोटो खिचाया था। कैसे इस इंटरव्यू या मीडिया की भाषा में कहें तो इंटरऐक्शन के बीच जॉन अब्राहम किनारे से हो गए थे। वो मौक़ा था यामाहा के एक ईवेंट का जब यामाहा की मोटो जीपी टीम के राइडर, मोटरसाइकिल रेसिंग के सबसे सनसनीख़ेज़ सितारे वैलेंटीनो रॉसी और भारत में यामाहा के ब्रांड एंबैसेडर जॉन अब्राहम एक साथ कुछ प्रेस टीम से मिले थे। रॉसी उससे पहले भी पसंद था और आज भी पसंद है। उसकी सफलता के ऊपर नज़र रहती है और असफलताओं से थोड़ी निराशा भी होती है। एक रेसर जिसने मोटो जीपी यानि मोटरसाइकिलों की रेसिंग की दुनिया के लिए वो किया जो शायद हमारे जेनरेशन में माइकल शूमाकर ने फ़ॉर्मूला वन के लिए और सचिन ने क्रिकेट के लिए किया। रेस सर्किट में रॉसी की दिलेरी आजकल यूट्यूब पर आराम से देखी जाती है। आप में से जो मोटो जीपी रेसिंग की दुनिया से परिचित हैं उन्हें पता ही होगा कि रॉसी फिर से यामाहा की टीम के लिए रेस करते हैं, इस बीच में वो डुकाटी की टीम से हो आए हैं। हालांकि रॉसी के इर्द गिर्द की कहानियों में अब वो चुलबुलापन, सनसनी नहीं जैसे पहले थी। हाल में वो चार साल बाद पोल पोज़ीशन ले पाए। और फिर भी रेस में और चैंपियनशिप में दूसरे नंबर पर ही रहे। और पहले नंबर पर है वो शख़्स जिसने मोटरसाइकिल रेसिंग में वो कर दिखाया है कि सब भौंचक्के हैं, रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाता ऐसा नौजवान जिससे भिड़ने के बारे में फ़िलहाल ख़ुद रॉसी भी नहीं सोच सकता है। 
वो है मार्क मार्केज़। 
ये स्पेनिश राइडर एक ऐसा अजूबा है कि रिकॉर्ड की किताबें रंग दी गई हैं, रेस के जानकार भौंचक्के हैं और रॉसी जैसा रेसर इसे अपना बैड लक कह रहा है, जो उसे चैंपियनशिप ये जीत से इतनी दूर किए हुए है कि रॉसी बेबस दूर खड़ा है। 
मार्क मार्केज़। 

जब से मैंने ये नाम सुना तब से उसके नाम के साथ लोगों को यही कहते सुना है - आख़िर ये चीज़ क्या है मार्केज़ ? जिसने 2008  से हिला के रखा हुआ है मोटरसाइकिल रेसिंग की दुनिया को। फ़िलहाल मोटोजीपी का लगातार दूसरे साल वर्ल्ड चैंपियन है। जब आप खोजने जाएं तो पता चलेगा कि ये वो राइडर है जिसने सबसे कम उम्र में जीतने के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले हैं। एक से एक नए रिकॉर्ड बना दिए हैं। 1993 में पैदा मार्केज़ ने पहली बार 125 सीसी कैटगरी में क़दम रखा, जब उसकी उम्र पंद्रह साल से थोड़ी ही ऊपर थी। और तब से लेकर अब तक इस रोमांचक दुनिया को और हिलाया हुआ है। 20120 में 125 सीसी वाले कैटगरी में वर्ल्ड चैंपियन बना। 2012 में मोटो २ का वर्ल्ड चैंपियन, अब 2013 और 2014 का मोटोजीपी वर्ल्ड चैंपियन बना हुआ है। मोटोजीपी में भी सबसे कम उम्र में जीत हासिल करने वाला राइडर बना ये। तो ये सब रिकॉर्ड काफ़ी हैं समझाने के लिए कि इसकी काबिलियत क्या है। क्या इसका टैलेंट है और क्या ये आने वाले वक्त में कर सकता है।
फ़िलहाल मार्केज़ हौंडा रेप्सॉल रेसिंग टीम का राइडर है। तो एक वक्त में अपनी तेज़ी और ड्रामा की वजह से जैसे रॉसी नामी था, वैसे ही मार्केज़ के बारे में भी दुनिया बात कर रही है लेकिन इसमें तेज़ी ज़्यादा है ड्रामा कम है। तो आपमें से  किसी की भी थोड़ी भी दिलचस्पी है मोटरसाइकिल रेसिंग में तो इस नाम को याद रखिएगा। अगले सीज़न में भी नज़र रहेगी इस नौजवान पर जिसने रफ़्तार पकड़ी हुई है। 93 नंबर की बाइक पर नज़र रखिएगा आप लोग भी।

September 30, 2014

ये दिल्ली दिलवालों की नहीं...

इस नई दिल्ली से बाहर वालों को नहीं ख़ुद यहां के बाशिंदों को अब डर लग रहा है। अमीर बाप के बिगड़े औलादों से और बिगड़े बाप के अमीर औलादों से भी। 

घटना नंबर एक। 
पिछले शनिवार को मूलचंद के पास के पेट्रोल पम्प पर गाड़ी में तेल भरवाने गया। शनिवार की शाम का वक़्त जब पेट्रोल पंपों पर रौनक़ लगी रहती है। जहाँ दिल्ली के पार्टी पीपल क़रीने से कपड़ों में इस्त्री करके, बालों को सँवार कर, सँभल कर गाड़ियों में तेल भरवाते दिखाई देते हैं। जिससे वीकेंड के उनके पार्टी प्लान पर तेल के छींटें या ग्रीज़ का दाग़ ना लगे। कौरेस्पोंडेंस कोर्स से फ़ैशन की पढ़ाई करने वालों के लिए अच्छी जगह हो सकती है, समझने के िलए कि आजकल पोलो पैंट चल रहा है कि जोधपुरी। आई शैडो के शेड पर शोध की भी गुंजाइश। लेकिन मेरे पास काम था। तो जल्दी वापस ऑफ़िस जाना था। ख़ैर, मेरी कार की बारी भी आई, तेल भराने लगा। और इसी बीच अचानक तू-तू मैं-मैं की आवाज़ सुनाई दी। मैंने भी तेल भरने वाली मशीन के मीटर से अपना ध्यान तुरंत उस कोने पर लगा दिया जिधर चिल्लपों मचा हुआ था। लेकिन किसी असली ऐक्शन नहीं दिख रहा था क्योंकि ये सब हवा भरवाने वाली लाइन में हो रहा था और वो ओट में था। और फिर हाथापाई-थप्पड़ की भी आवाज़ सुनाई दी। ऐसे में तेल भरवाने वाले सभी ड्राइवर, भरने वाले सभी कारिंदे लालायित हो गए कि जल्दी से लड़ाई देखने के लिए बढ़ा जाए। एक नए तमाशे की उम्मीद से भरे थे हम सब। लेकिन जबतक मैं आगे बढ़ा, मामला मद्धम सा लगा। देखा एक टैक्सी ड्राइवर, अपनी इनोवा की खिड़की के रास्ते उतरने की कोशिश सा करता, आधे मन से चिल्लाता-गलियाता लगा। शायद उसी को थप्पड़ पड़ा। लेकिन दूसरी पार्टी नज़र नहीं आ रही थी। कि अचानक दिल्ली का फ़ेवरेट मौलिक आध्यात्मिक प्रश्न गूँजा- "तू जानता नहीं मैं कौन हूँ " और ये उसी ड्राइवर को संबोधित लगा। घूम कर देखा तो एक स्मार्ट सा आदमी हाथ में चमकती रिवोल्वर लहराता ये उद्घोष कर रहा था, चमकती-नक्काशी की हुई रिवॉल्वर। जो उस आदमी के फ़ैशन से मेल खाता लग रहा था, डिज़ाइनर दिल्ली वाले की डिज़ाइनर रिवॉल्वर। जिसे उस शख़्स ने अपनी पैंट में पीछे खोंसा और फिर सफ़ेद ह्युंडै में बैठ गया। और मैं आधे सेकेंड के लिए सोच में पड़ा कि आख़िर टायर में हवा भरवाने को लेकर क्या ऐसा बवाल हो सकता है कि कोई रिवॉल्वर निकाले? फिर मेरे पीछे वाले लोगों ने हॉर्न बजाना शुरू किया तो मैं भी आगे निकल गया।  
घटना नंबर दो। 
फिर से मैं पेट्रोल पंप पर। और इस बार मैं कार लेकर लाइन में खड़ा हुआ, हवा भरवाने के लिए । ये ग्रेटर कैलाश का इलाक़ा, शहर का पॉश, अमीर, पढ़ा लिखा इलाक़ा, लेकिन संभ्रांत ? नहीं । वो इलाक़ा जहां पर कारें पेट्रोल डीज़ल पर नहीं अहंकार पर चलती हैं। दिल्ली के कई संपन्न इलाक़ों की तरह यहां भी पढ़े-लिखे अनपढ़ की अवधारणा को समझा जा सकता है। तो इस पेट्रोल पंप पर क़तार में मेरे से आगे एक बुज़ुर्ग थे। उम्र काफ़ी लेकिन छरहरे, फ़िट से। रिटायर्ड आर्मी टाइप के लग रहे थे। और वो बड़े करीने से कार से उतर कर, चारों टायरों में हवा भरवाने के अलावा कार की डिक्की खोलकर भी खड़े थे कि स्टेपनी में भी हवा भरवा लें। और तुरंत पीछे एक सफ़ेद बीएमडब्ल्यू कार आकर रुकी। और अपनी तेज़ आवाज़ वाली कर्कश हॉर्न को दबाया। जिसे दिल्लीवालों की आदत समझ कर नज़रअंदाज़ किया जा सकता था। यहां पर वैसे भी ब्रेक दबाते ही लोग हॉर्न बजाते हैं। लेकिन उस ड्राइवर ने फिर से बजाया। आमतौर पर ड्राइवरों को इतनी जल्दी होती है लेकिन मैंने शीशे में देखा कि अपनी गर्लफ़्रेंड के साथ बैठा नौजवान उस बुज़ुर्ग की रफ़्तार से उकता कर हॉर्न बजा रहा है। मतलब कह रहा है कि जल्दी बढ़ो आगे। उसे कहीं पहुंचने की जल्दी थी या नहीं पता नहीं। लेकिन उसे इस क़तार में नहीं खड़ा होना था। उसे इंतज़ार नहीं करना था। 
घटना नंबर तीन। 
रात के एक बजे ऑफ़िस से घर के लिए निकला और ग्रेटर कैलाश के एन ब्लॉक के बाज़ार सामने से गुज़र रहा था। आमतौर पर शुक्र शनि की रात काफ़ी रौनक होती है इस सड़क पर जब मैं निकल रहा होता हूं। और रौनक के जितने मतलब निकाले जा सकते हैं वो सब यहां देखने को मिलता है। वो वक्त जब पब और रेस्त्रां बंद होने के बाद पार्टी-पीपल निकल रहे होते हैं, कुछ सड़क पर झूम रहे होते हैं जिनसे बच कर गाड़ी निकालनी होती है साथ में उनसे भी जो अपनी कारों को झुमा रहे होते हैं। कई रात पुलिस वालों के साथ तू-तू मैं मैं भी देखने को मिलता है। ख़ैर जिस ख़ास रात के बारे में मैं ज़िक्र कर रहा था उस रात ऐसे ही गुज़रते हुए फिर से गालियों की गूंज सुनाई दी और कारों की रुकी क़तार के आगे से आ रही थी। और आगे बढ़ने पर देखा कि इस बार एक ऑडी कार की खिड़की से सर निकाले नौजवान गालियां बक रहा है और ये थी सामने उल्टी तरफ़ से आती ऑल्टो कार के लिए, जिसमें एक बुज़ुर्ग जोड़ी थी, सकपकाई सी। पता नहीं ग़लती किसकी थी कि दोनों कारें ऐसे आमने सामने फंसी थीं, लेकिन ६० से ऊपर के उस जोड़े को,इतनी देर रात ऐसी सड़क पर देखकर किसी को भी दया आ जाए। 

ये दिल्ली है। और जितना ज़्यादा वक़्त सड़कों पर ड्राइव करते गुज़र रहा है, उसके बाद यही लग रहा है कि यही दिल्ली है। जहां सड़कों पर एक मान्यता प्राप्त जंगल राज है, जो क़ानून व्यवस्था के दायरे से दूर, यहां के लोगों के मनों में है। जो ट्रेंड उन हादसों से भी ज़्यादा हिंसक लगने लगे हैं जिनमें दरअसल दो हज़ार दिल्ली वाले अपनी जान गंवा देते हैं। वैसे ही मुंबई-बैंगलोर के दोस्त दिल्ली की बेरुख़ी और अग्रेशन से डरते-मज़ाक उड़ाते हैं, अब तो हालत और ख़राब होती लग रही है।  वो उजड्डपना और लंपटपना जो मारुति-ह्युंडै, बीएमडब्ल्यू-ऑडी, प्राइवेट और टैक्सी की सीमाओं को पार करता एक जैसा पूरे शहर पर पकड़ बना रहा है। जिसे रोड रेज के नाम से जाना जा रहा है, वो रेज जो रोज़ की बात हो गई है। जहां-तहां बीच सड़क पर रुकती गाड़ियां और फिर  उनमें से आस्तीन समेटते निकलते लोगों की आपस में बहसबाज़ी और गाली गलौज होते देखना दिल्लीवालों की आदत बन गई है। कई हॉर्न दबा कर बैठ जाते हैं, और उस प्रेशर हॉर्न की आवाज़ भी कम लगने लगती है तो फिर  चिल्लाने भी लग रहे हैं। अपने दोस्तों सहकर्मियों से ज़िक्र करो तो उनका एक ही डर होता है कि पता नहीं किस बात पर लोग बंदूक निकाल लें। बुज़ुर्ग, महिला या बच्चों की मौजूदगी भी नहीं शांत करती है इन लोगों को। 'दिल्ली दिलवालों की’ जैसे जुमले पहले भी शक के घेरे में थे अब तो और भी बेमानी लगते हैं। इस बेदिली का कोई भी मोटर वेह्किल ऐक्ट हार्ट ट्रांसप्लांट नहीं कर सकता । इस नई दिल्ली से बाहर वालों को नहीं ख़ुद यहां के बाशिंदों को अब डर लग रहा है। अमीर बाप के बिगड़े औलादों से और बिगड़े बाप के अमीर औलादों से भी।