July 12, 2014

बजट में रोड सेफ़्टी के लिए कुछ कहा क्या ????

( जब सड़कों को चौड़ा करने, कॉरीडोर बनाने, इंफ़्रास्ट्रक्चर बेहतर करने पर ज़ोर दिया जा रहा था, लगा कि ये सरकार कुछ ऐसे ऐलान करेगी जो इतने सालों से कांग्रेस ने नहीं किया था, रोड सेफ़्टी के लिए कुछ पैसे निकालेगी, १०० करोड़ वाले २९ प्रोजेक्ट हो ही चुके थे, ३० भी हो सकते थे !! कुछ इशारा तो करते, ज़िक्र तो करते कि जिन सड़क हादसों की वजह से कहा जाता है सालाना सवा लाख लोग मारे जाते हैं, जीडीपी का दो-ढाई फीसदी का नुक़सान करता है, उस पर भी कुछ पॉलिसी टाइप की बात करते, उस बहस में नहीं जा रहा कि महिला सुरक्षा के लिए इतना और पटेल की मूर्ति के लिए इतना...कमसेकम सोच तो दिखा देते ? थोड़े दिन पहले ये कॉलम लिख रहा था तो लग रहा था कि बजट के वक्त कुछ ऐसा सुनाई दे जाए, आख़िर एक मंत्री की मौत हुई थी, किसी आम हिंदुस्तानी की नहीं...तब तो चिंता होनी चाहिए थी ?? ) 


हाल में एक मौत ने फिर से हमारे सामने ये सवाल खड़ा कर दिया है जिसे हम बार बारे उठाने की कोशिश करते हैं लेकिन जवाब नहीं मिल रहा है। वो ये कि कब तक हिंदुस्तानी
सड़कें दुनिया की सबसे ख़ूनी सड़कें बनी रहेंगी। कब तक हम रोड सेफ़्टी को इतने हल्के में लेते रहेंगे, कब तक हिंदुस्तानियों की जान की अहमियत को इतना कम आंकते रहेंगे।
अलग अलग आंकड़ों का औसत भी लें तो देश की सड़कों पर हर साल सवा लाख से ज़्यादा लोग अपनी जान सड़क हादसे में गंवा देते हैं। और अब तक अगर सरकारों का रवैया देखें तो लगेगा कि इन जानों की फ़िक्र सरकार को नाम मात्र की ही है, कागज़ों में, ख़ानापूर्ति में। लेकिन सड़क हादसे में एक मंत्री की मौत के बाद अचानक लग रहा है कि तस्वीर शायद बदले।
अचानक सा लगने लगा है कि इस बार शायद कुछ अलग है, सवा लाख मौत पर जैसा रवैया अब तक सरकारों का देखने को मिलता रहा है,पता नहीं क्यों उम्मीद हो रही है, या कमसेकम ऐसा लग रहा है कि अब चारों ओर से चर्चा शुरू होगी, कोशिशें शुरू होंगी समाधान निकालने की और कुछ ठोस क़दम उठाए जाएंगे। लोगों की जान की क़ीमत समझी जाएगी, ट्रैफ़िक सेफ़्टी नियमों को लागू करने में कड़ाई बरती जाएगी, सड़कों के डिज़ाइन की ख़ामियां दूर की जाएंगी और सेफ़्टी को सबसे बड़ी प्राथमिकता माना जाएगा।
इस उम्मीद की वजह साफ़ है, एक तो इस बार किसी आम आदमी या नेता की हादसे का शिकार नहीं हुआ है। इस बार हादसे में मौत एक मंत्री की भी हुई है। और हादसे की तस्वीर लगभग वैसी ही, जैसी हमें हर रोज़ देखने की आदत है। क्रॉसिंग से गुज़रती दो गाड़ियां, एक की रफ़्तार ज़्यादा, कोई एक लापरवाह और कोई बेपरवाह। नतीजा मौत। इस बार दिल्ली के चौराहे पर ऐसा देखा गया है।
दूसरी वजह है सरकार का नया होना। अभी जिस तरीके से सालों बाद फिर से सरकार में आई एनडीए में जोश दिख रहा है, कई मुद्दों पर सकारात्मक ऐलान सुनने को मिले है, हालांकि कार्रवाई का इंतज़ार है, उसे देखकर लग रहा है कि गोपीनाथ मुंडे के निधन के बाद सरकार कुछ क़दम उठाए, जिससे सड़कें ज़्यादा सुरक्शित हों।
सबसे अहम तो ट्रैफ़िक नियमों का पालन ही है। ये समझते हुए कि सभी हाईवे, सड़कों या चौराहों पर ट्रैफ़िक पुलिस को तैनात करना नामुमकिन है। हर स्पॉट पर पुलिस कर्मी हों तो भी ज़रूरी नहीं कि सभी नियम तोड़ने वाले उनकी नज़र में आ जाएं, या वो सभी को पकड़ पाएं। तो इसका समाधान टेक्नॉलजी ही हो सकती है। जहां सबसे पहले स्पीड कैमरे लगाने की ज़रूरत है। सबसे पहले देश की उन ख़ूनी सड़कों को कैमरे से लैस किया जाना चाहिए, जहां पर रिकॉर्ड के मुताबिक सबसे ज़्यादा सड़क हादसे होते हैं। वहां पर कैमरे से लोगों पर एक अंकुश लगेगा कि वो स्पीड लिमिट को ना तोड़ें, या नियम ना तोड़ें। इससे चप्पे चप्पे पर पुलिसवालों की तैनाती से छुट्टी मिलेगी।
इसके बाद लाइसेंसिग की पूरी प्रक्रिया को फिर से देखने की ज़रूरत है। बिना काबिलियत के ड्राइविंग लाइसेंस देना बंद किया जाना चाहिए, जिसके लिए लाइसेंस से पहले ट्रेनिंग भी अनिवार्य की जा सकती है। इसके अलावा इस इलाक़े में भी टेक्नॉलजी का इस्तेमाल ज़रूरी है। लाइसेंस देने के मापदंड और प्रक्रिया साफ़ सुथरी, सटीक और पारदर्शी होनी चाहिए,जिसका एक एक रिकॉर्ड इंटरनेट पर होना चाहिए। किसे किस गाड़ी के लिए किस आधार पर लाइसेंस मिल रहा है।
सरकार की तरफ़ से एक और कोशिश दिखनी चाहिए। वो है पैदल यात्रियों की सुरक्शा और उन्हें मिल रही तरजीह। ना सिर्फ़ उनके लिए फ़ुटपाथ साफ़ करवाए जाने चाहिए, बल्कि उनके लिए सड़क पार करने के सेफ़ रास्ते बनाए जाने चाहिए।
और साथ में गाड़ियों के ड्राइवरों को याद दिलाया जाए कि पैदल यात्रियों के अधिकार क्या हैं। हादसों की सूरत में लागू होने वाले क़ानून को कड़ा करने की ज़रूरत भी है। ट्रैफ़िक नियमों को तोड़ने की सूरत में ज़्यादा बड़ा चालान भी, क्योंकि असल समाधान लोगों से ही आने वाला है। सड़क पर जान लेने के लिए सरकारें सड़क पर ड्राइव करने नहीं आती हैं। लोग जाते हैं, अपनी गाड़ियों के साथ, लापरवाह, बेपरवाह वो आम लोग जिनके लिए ट्रैफ़िक नियमों की कोई अहमियत नहीं है, या उन नियमों को तोड़ने में फ़ख़्र महसूस करते हैं।
वैसे लिस्ट अभी लंबी है जिनकी उम्मीद मुझे सरकार से है, और इंतज़ार भी।


Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । कुछ दिनों पहले छपी थी।

July 06, 2014

ब्रांड भी थकते हैं...


ब्रिटिश चीज़ों को लेकर हिंदुस्तानियों का लगाव कुछ ज़्यादा ही है। अब चाहे इसे ग़ुलाम मानसिकता कहें, अभिजात्य वर्ग में ट्रांज़िशन का रास्ता कहें या फिर कुछ चीज़ें होती भी लगाव लायक। ऐसे में वो ब्रिटिश ना भी हों तो हमें हो सकता है वो अच्छी लगें। जैगुआर कारों के बारे ऐसी ही दुविधा मुझे लगती है। क्या ये ब्रिटिश है इसलिए हिंदुस्तानी इतने लगाव से इस ब्रांड को देखते हैं, क्या इसलिए क्योंकि दरअसल हिंदुस्तानी कंपनी टाटा ने जैगुआर लैंडरोवर को ख़रीद रखा है या फिर इसलिए क्योंकि ये कारें वाकई इतनी ख़ास और ख़ूबसूरत दिखती हैं। हो सकता है तीनों का कांबिनेशन हो, जो मुझे देखने को मिला ग्रेटर नौएडा के पास बनती सड़क किनारे खड़े नौजवानों से बात करके। जो जानते थे कि ये जैगुआर कार है, जानते थे कि कार के बोनट पर एक शेरनुमा कुछ निशान बना रहता है। और ये भी कि ये ऑडी बीएमडब्ल्यू से अलग टाइप की कार है।
तो इन सब नौजवानों और अपने सवालों से मिलने के बाद मैं निकला देखने कि जिस जैगुआर पर इतनी चर्चा हो रही थी वो दरअसल चलाने में थी कैसी और क्या ये सफल होगी उस कोशिश में जहां पर कंपनी यानि जैगुआर की नज़र है। 
ये जैगुआर एक्स एफ़ २.२ थी। जिसे चलाने निकला था और ज़ेहन में वही सवाल था कि इस सेगमेंट में जो पैमाना तीनों जर्मन कारों ने सेट किया है, जो आदत जर्मन कारों ने ग्राहकों को डाल दी, उसमें क्या कुछ नया करने की क्षमता है जैगुआर की। जिस कार को लेकर निकला वो २.२ लीटर डीज़ल इंजिन से लैस एक ऑटोमैटिक कार थी। इससे पहले इसमें ३ लीटर वाला विकल्प तो था लेकिन जैगुआर ने कोशिश की अपनी कार को छोटे इंजिन से लैस करके और क़ीमत को कम करके उन तीनों महारथियों से टक्कर लेने की जो इस सेगमेंट में राज कर रहे थे। मर्सेडीज़, बीएमडबल्यू और ऑडी। 
एक्स एफ़ मोटे तौर पर सबसे सस्ती जैगुआर कारें हैं भारत में जहां एक्स एफ़ फ़िलहाल तीन इंजिन विकल्पों के साथ मौजूद हैं। एक तो २ लीटर पेट्रोल इंजिन विकल्प है, २.२ लीटर डीज़ल इंजिन है और तीसरा ३ लीटर डीज़ल इंजिन विकल्प। 
जहां एक्सएफ़ पेट्रोल ४८.६ लाख की है वहीं एक्सएफ़ २.२ डीज़ल ४८.९ लाख रु की है। और ३ लीटर डीज़ल विकल्प सबसे महंगी ५४.९ लाख रु की है, और एक्सएफ़ २.२ 
के ज़रिए इसी प्राइस बैंड को कम करने की कोशिश की थी जैगुआर ने।
हालांकि छोटे इंजिन के बावजूद ताक़त और प्रदर्शन में कोई कमी नहीं कह सकते हैं। काफ़ी तेज़ तर्रार है, और हैंडलिंग के मामले में अपने सेगमेंट के मुताबिक प्रदर्शन ज़रूर करती है, हां स्पोर्ट्स कार जैसी नहीं कहेंगे स्टीयरिंग और सस्पेंशन के मामले में क्योंकि इसमें ज़्यादा तरजीह आराम को ही दिया गया है। तो जर्मन कारों की हैंडलिंग की आदत में ये थोड़ा अलग लगेगा, क्योंकि उनकी हैंडलिंग का स्तर थोड़ा ज़्यादा स्पोर्टी ज़रूर लगता है। लेकिन ये अलग मूड की कार है। और कार को अंदर से भी देखें तो मौजूदा विकल्पों के मुक़ाबले थो़ड़ा पुराना डिज़ाइन लगता है, बहुत हाईटेक नहीं लगेगा। फ़िनिश में एक शाही टच है लेकिन आजकल यंग होते ग्राहकों के लिए अपटूडेट लुक नहीं कहेंगे। लेकिन एक मुद्दा ये भी है कि जिनके पास पैसे हैं वो ख़र्च करने के लिए नया विकल्प ज़रूर ढूंढ रहे हैं, जर्मन ब्रांडों से एक तरह से थकान भी कह सकते है, ब्रांड भी थकते हैं, ऐसे में उनके लिए जैगुआर एक विकल्प हो सकती है। कार जो महंगी है, लेकिन ख़ूबसूरत भी हैं और ब्रांड भी ब्रिटिश है।

(Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । कहीं ना कहीं छपी हुई है)

July 03, 2014

लाख रुपए माइनस !!!!!


अब ये एक बड़ी ख़बर है उन नौजवानों के लिए जो हैं थोड़ा हटके वाले सेगमेंट में। मोटरसाइकिलों के प्रेमी जो शौक़ीन भी हैं और जिन्हें बड़ी मोटरसाइकिलों का शौक़ है। उनके लिए ख़बर आकर्षक ही है क्योंकि अब २५० सीसी सेगमेंट की मोटरसाइकिलों में एक नई हलचल देखने को मिली है। और ये हलचल है उसी मोटरसाइकिल से जुड़ी जिसे हाल में मैंने चलाया था और आप सभी को जिसके बारे में बताया था। ये है सुज़ुकी की इनाज़ूमा । जिसके बारे में एक ही मुद्दा मुझे खटक रहा था और वो थी इसकी क़ीमत। तो सुज़ुकी ने लगता है सुनी और समझी है वो बात और कंपनी ने अपनी इनाज़ूमा की क़ीमत सीधे एक लाख रु कम कर दिया है। सोचिए एक लाख। जो मोटरसाइकिल साल की शुरूआत में ३ लाख १० हज़ार के आसपास उतारी गई थी उसे अब कंपनी ने २ लाख १० हज़ार के लगभग कर दिया है। और इस नए क़दम से अचानक मार्केट में कई समीकरण बदल सकते हैं। 
कंपनी ने देखा था कि शुरूआती महीनों में इनाज़ूमा को लेकर ज़्यादा गर्मजोशी नहीं थी और कंपनी को बिक्री नहीं मिल रही थी। उसकी सबसे बड़ी वजह उसकी क़ीमत ही थी तो कंपनी ने अपनी रणनीति बदली है। इस सेगमेंट में, जिसमें ज़रूरी नहीं कि केवल २५० सीसी इंजिन हों क़ीमत के हिसाब से भी, जिस तरीके से प्रोडक्ट आ रहे हैं और जितने विकल्प बढ़ रहे हैं, कंपनी को लगा कि इस कांपिटिशन में देरी करना ख़तरे से ख़ाली नहीं है। हालांकि ऐसा नहीं कि केवल क़ीमत कम करने से ही ग्राहक इसकी ओर आएंगे क्योंकि इससे सस्ती केटीएम ३९० ने सेगमेंट को हिला रखा है। लेकिन ये भी है कि सुज़ुकी की रिफ़ाइनमेंट और शांत राइड ख़ास तरीके के राइडरों के लिए पसंदीदा हो सकती है, और नई क़ीमत से कमसेकम ऐसे ग्राहकों पर सुज़ुकी ध्यान दे सकती है। 

सुज़ुकी मोटरसाइकिल कंपनी भारत में अब तक बहुत अाक्रामक नहीं रही है, कमसेकम जिस तरीके का आक्रामक रुख़ 
बाकी जापानी मोटरसाइकिल कंपनियों का रहा है वैसा नहीं रहा है और इस बार के क़दम से लग रहा है कि सुज़ुकी का मूड थोड़ा बदला है, कंपनी ने फ़ैसला जल्दी लिया है, जो बहुत ज़रूरी था भारत जैसे तेज़ मोटरसाइकिल बाज़ार में। कांपिटिशन को तेज़ी से समझना और तेज़ प्रतिक्रिया बताता है कि आप वाकई तैयार हैं या नहीं हैं। सुज़ुकी ऐसे ही कुछ संकेत दे रही है।


Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । कहीं ना कहीं छपी हुई है।

गर्मागर्म ड्राइव


मौसम ऐसा ही है जहां पर हममें से हर कोई नई मंज़िल की तलाश में निकलने की सोच रहे हैं, ये बात अलग है कि छुट्टी मिले या ना मिले अपनी अपनी नौकरियों से। चलिए मान कर चलते हैं कि मौसम है गर्मियों की छुट्टी का, यानि बच्चों की छुट्टियों का तो ऐसे में ज़्यादातर प्लान करके रखते हैं, और उनमें से कई का प्लान होता है पूरे परिवार के साथ ड्राइव करके घूमने जाने का। तो ऐसे ही परिवारों के लिए ख़ासतौर पर आज सोचा कुछ लिखा जाए, वो जानकारियां जो आपके पास होती हैं लेकिन फिर भी फिर से याद दिलाने में कोई नुकसान नहीं है। वैसे गर्मियों में किसी भी तरीके के ड्राइविंग के लिए टिप्स कामके होते हैं, चाहे आप लौंग ड्राइव पर हों, या स्मॉल ड्राइव पर। परिवार के साथ हों या फिर अकेले।

सबसे पहले तो आपको अपनी यात्रा का प्लान करना ज़रूरी है। कब निकलना है, दिन के किस वक्‍त निकलना है, जिससे ट्रैफ़िक कमसेकम मिले। कौन सा रूट पकड़ना है- ये अहम मुद्दा है क्योंकि भारत में सड़कों का कंस्ट्रक्शन कैसे चलता है ये हमें और आपको सबको पता है। ऐसे में कब कहां अटक जाएं ये पता नहीं। और छुट्टी पर जाने के रास्ते ऐसे जाम मज़ा किरकिरा कर देते हैं। इसके लिए सबसे पहले तो अपने दोस्तों-सहकर्मियों से बात करें। ज़्यादातर टूरिस्ट स्पॉट पर लोगों का आना जाना लगा रहता है, और रास्तों के बारे में वो लेटेस्ट जानकारी रख सकते हैं, कईयों के रिश्तेदार दोस्त उन इलाक़ों में रहते हैं। और इसके बाद रामबाण है इंटरनेट, जाइए नेट पर और सर्च कीजिए उन हाईवे और रोड के बारे में । बहुत से ऐसे वेबसाइट और फ़ोरम हैं जहां पर लोग अपनी यात्राओं का अनुभव लिखते हैं, ज़्यादातर मौक़े पर ये अनुभव काम के होते हैं। मेरा तजुर्बा भी यही रहा है कि रास्ते की जितनी जानकारी हो, आप सफ़र के लिए उतना तैयार रहते हैं। 

फिर आते हैं आपकी कार पर। यानि गाड़ी कितनी तैयार है, लंबे सफ़र, देर तक ड्राइव, गर्मी और बुरी सड़कों के लिए। लौंग ड्राइव पर कारों की असली रगड़ाई होती है तो इसके लिए उन्हें अच्छे से तैयार भी करना चाहिए। बिना कार की तैयारी के निकलना बहुत बड़ी भूल होगी। तो इसके लिए ले जाइए वर्कशॉप पर, और चेक करवाइए ट्यूनिंग, बैट्री, बेल्ट वगैरह। किसी पाइप या रबर में कोई लीकेज तो नहीं , चेक करवाइए। ज़रूरत हो तो ऑयल चेंज करवाइए और टायर भी रोटेट करवाइए। एसी की भी सर्विसिंग नहीं करवाई हो तो करवा लीजिए। काम आएगा। एक और ज़रूरी बात, वाइपर को भी चेक कीजिए और वाइपर के साथ वाले वाशिंग के लिए भी पानी भरा होना चाहिए। बारिश हो ना हो, कई बार पहाड़ी इलाक़ों में मौसम बदलता है। वैसे भी ड्राइव के दौरान भी कभी भी शीशा साफ़ करने की ज़रूरत पड़ सकती है।

लगे हाथों लाइट्स भी चेक करवा लीजिए। हाईवे पर एक भी लापरवाही जानलेवा होती है तो बिना हर लाइट का सही तरीके से काम करना ज़रूरी होता है। शहरी ट्रैफ़िक में भले हमें अहमियत पता ना चले लेकिन हाईवे पर सेफ़्टी के लिए लाइट्स का फ़िट होना बहुत ज़रूरी हैं। 

फिर टायर के बारे में तो आपको याद होगा ही। लंबे सफ़र पर टायरों की भूमिका काफ़ी अहम हो जाती है। एक तो टायर को चेक करना ज़रूरी है। अगर ज़रूरत से ज़्यादा घिसे हुए टायर हैं तो फिर वो गर्मी में फट सकते हैं। लंबी दूरी की ड्राइविंग में एक तो पहिया गर्म होता है ऊपर से मौसम की वजह से सड़कें तपी हुई होती हैं, ऐसे में टायर में भरा हुआ हवा गर्म होकर थोड़ा फैलता है, जिसका दबाव घिसे टायर कैसे झेल सकते हैं, तो गर्मियों में टायरों का फटना आम है।और इसी वजह से दूसरा प्वाइंट भी अहम है। टायर अच्छी हालत में होने चाहिए और उनका एयरप्रेशर उतना ही होना चाहिए जितना कंपनी ने निर्धारित किया है। ज़्यादा हवा भरवाएंगे तो गर्मियों में टायरों के लिए जानलेवा हो सकता है। और इन सबको चेक करने के बाद एक और चेकिंग, वो है अापकी गाड़ी की स्टेपनी की, पांचवे टायर की। उसका स्वास्थ्य कैसा है चेक करके रखिए, ज़रूरत है तो हवा भरवा के उसे भी तैयार रखिए।

फिर इससे जुड़ा एक और प्वाइंट। चाहे दो दिन के लिए जाएं या फिर चार दिनों के लिए कितना सामान ले जाना है ये भी ध्यान रखें। बिना मतलब सामान ले जाने कोई मतलब नहीं होता है। उससे ना सिर्फ़ कार में जगह भरता है, एक्सट्रा वज़न टायर पर बेवजह दबाव बढ़ाएगा और माइलेज पर भी । तो सामान पैक करने के वक्त ध्यान रखें। जो चीज़ बिल्कुल ज़रूरी हो वही साथ में ले जाएं। 

अब बात सड़क पर ड्राइविंग की करें तो ये समझना ज़रूरी है कि हाइवे पर ड्राइविंग शहरी ड्राइविंग से बिल्कुल अलग होती है, शहर में कई बार आम ट्रैफ़िक नियमों को तोड़ने पर हम बच जाते हैं तो लगता है कि इन नियमों की ज़रूरत क्या है, लेकिन उनकी असली अहमियत हाइवे पर दिखेगी, जो नियम दरअसल जान बचाने के लिए काम में आते हैं। तो शहर की तरह आड़ी तिरछी, ग़लत ओवरटेकिंग की ग़लतियां मत कीजिए। 
फिर सेफ़्टी के इंतज़ाम भी रखें। जहां हाईवे पर हमारी औसत रफ़्तार कहीं ज़्यादा होती है, ऐसे में सेफ़्टी की ज़रूरत और बढ़ जाती है। पिछली सीट पर भी सीट बेल्ट बांध कर फ़ैमिली को बिठाइए। याद होगा कि हाल में पिछली सीट पर ही बैठे हुए हमारे केंद्रीय मंत्री की दुर्घटना में मृत्यु हुई थी। तो सेफ़्टी हर सीट पर ज़रूरी है। और ये चालान से बचने के लिए नहीं जान बचाने के लिए ज़रूरी है।
और यही सलाह फ़ोन को लेकर भी देंगे, फ़ोन का इस्तेमाल आपकी ड्राइविंग को प्रभावित करता है, चाहे आप कितने भी काबिल ड्राइवर हों। ऐसे में ज़रूरी है कि आप अपनी ड्राइव को सेफ़ बनाएं, फ़ोन का इस्तेमाल ड्राइव के दौरान ना करें।
आप घंटों लगातार ड्राइव करने से बचें। कई बार थकान होने के बवाजूद हम ड्राइव करते रहते हैं, जो ख़तरनाक होता है। तो चाय कॉफ़ी का ब्रेक, हर डेढ़ दो घंटे पर हो तो बेहतर हो।
हां ध्यान रहे, केवल चाय कॉफ़ी के लिए बियर या शराब के लिए नहीं। ये विडंबना ही है कि भारत में १ लाख ३८ हज़ार लोग सड़क हादसों में मरते हैं, जिनमें से अधिकांश हाइवे पर मरते हैं लेकिन सरकारें हैं कि हाइवे पर शराब की दुकानें खोले जा रही है खोले जा रही है। तो आप कृपया इस जाल से बचिएगा, ड्राइविंग के दौरान शराब बिल्कुल मत पीजिएगा।

एक और सुझाव है, सलाह तो नहीं दे सकता क्योंकि हर इंसान की सोच अपनी अपनी होती है। लेकिन मेरे हिसाब से एक और चीज़ ध्यान रखने वाली है हाइवे पर ड्राइव करते वक्त, वो है आपके सर का तापमान। अाजकल देश के ज़्यादातर शहरों में रोडरेज आम बात है, यानि गर्ममिज़ाजी। छोटी छोटी बात पर बहस लड़ाई का रूप ले लेती है, और अंजाम बुरा होता है। शहर में माहौल दूसरा होता है, हाइवे पर दूसरा। तो सुझाव यहीं दूंगा कि कार के साथ अपने दिमाग़ को भी ठंडा रखिए और निकल जाइए मस्त छुट्टियां मनाने।





इमर्जेंसी के लिए कार में क्या ज़रूरी ? 
फ़र्स्ट एड किट
ज़रूरी दवाईयां
जंपर केबल
जैक
रिपेयर टूल
रोड मैप
टॉर्च लाइट

Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । कहीं ना कहीं छपी हुई है।

June 04, 2014

एक नए मेनिफ़ेस्टो की ज़रूरत



हर तरफ़ वादों और दावों के झंडे लहरा रहे हैं, बयानों और बहानों की बारिश हो रही है। ये मौसम है चुनावो का। जहां सभी ये जताने में लगे हैं कि आपकी फ़िक्र सबसे ज़्यादा की जा रही है, आपके एक वोट के लिए चांद तारे तोड़ कर लाने के वादे अब इतने पुराने हो गए हैं कि उन सबमें रोमांस बिल्कल ख़त्म हो गया है। अब सभी वोटर अपने अपने वोट को लेकर पहले कहीं ज़्यादा तैयार हैं, वोट के बदले में क्या मिल रहा है और क्या देना पड़ रहा है वो एक तौल रहे हैं। लेकिन अब ये कहने में भी कोई नयापन नहीं रह गया है कि अभी भी विचारधाराओं की लड़ाई के नाम पर वही स्कूली डिबेट चल रहा है जिसके पक्ष और विपक्ष में क्या क्या दलीलें देनी हैं वो युगों से नेता और जनता ने रट रखे हैं। वही आपको ट्विटर पर दिखेंग, वही फ़ेसबुक पर। तो ऐसे में, आज के वक्त में पॉलिटिक्स से अलग सोचना किसी भी उस इंसान के लिए मुश्किल है जो किसी भी तरीके के मीडिया से संपर्क में है। मास मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक। और पूरी बहस को देखते हुए मुझे लग रहा था कि कैसे इस बहस में वो मुद्दे अंट सकते हैं, जगह बना सकते हैं जो इतने सालों से नहीं बने। जिनकी वजह से एक तरफ़ तो लाख से ऊपर मरते हैं, लाखों घायल होते हैं, लाखों परिवार तबाह होते हैं और दूसरी ओर लोगों की बनावट को बदल रहा है, उन्हें आक्रामक बना रहा है और एक दूसरे के प्रति संवेदनहीन बना रहा है। 
 तो इस पूरी चर्चा के बीच लगता है कि एक और मेनिफ़ेस्टो है जिसके लिए जगह बनाने की ज़रूरत है। जिससे आने वाले वक्त मे देश की तस्वीर बेहतर हो। सड़क हादसों में हर साल जो सवा लाख से ज़्यादा लोग मारे जाते हैं, दुनिया में सबसे ज़्यादा लोग भारत में सड़कों पर दम तोड़ते हैं, एक ऐसा मेनिफ़ेस्टो जो उस कलंक को मिटाने की कोशिश करे। ये मेनिफ़ेस्टो है सड़क का मेनिफ़ेस्टो। 
लाइसेंस - सबसे पहले ज़रूरत है हमारी ड्राइविंग को ईमानदार बनाने की। देश के तमाम लाइसेंसिंग ऑथोरिटी में दलालों का कैसा साम्राज्य चलता है इसके बारे ना जाने कितनी बार लिखा-पढ़ा जा चुका है। लेकिन कैसे आसानी से बिना टेस्ट के लाइसेंस मिल जाते हैं, वो लाइसेंस जो किसी को भी सड़क पर गाड़ी लेकर जाने की इजाज़त दे देता है, चाहे वो मारुति ८०० या ऑल्टो है या फिर फ़ेरारी और लैंबोर्गिनी। चाहे ४० हॉर्सपावर की गाड़ी हो या ४०० की। चाहे स्प्लेंडर हो या हायाबूसा। और बिना ट्रेनिंग और बिना टेस्ट के मिले इस लाइसेंस का ख़तरा वैसा ही है जैसा कि बच्चे के हाथ में असल पिस्तौल देना है, बिना इसकी परवाह किए कि इससे किसी की जान जा सकती है। सोचिए कि जिस लाइसेंस के लिए कुछेक सौ रुपए एक्स्ट्रा देने के अलावा अगर और कुछ नहीं करना हो तो फिर उसकी अहमियत और ज़िम्मेदारी क्या रह जाएगा। जो सड़कों पर दिखता है, जहां ड्राइविंग की काबिलियत का कोई मापदंड नहीं है। सड़क पर नौसिखुए से लेकर एक्सपर्ट हर तरीके के ड्राइवर मिल जाते हैं। जो आम हालात में एक जैसी ड्राइविंग करते दिखेंगे, लेकिन जहां कुछ मुश्किल आई दोनों का रिएक्शन अलग होगा और नतीजा भी। चूंकि ये मामला सड़क का है तो ड्राइवर की बेवकूफ़ी का ख़ामियाज़ा केवल उस ड्राइवर को नहीं भुगतना पड़ता है। 
विदेशों में लाइसेंस मिलना एक उपलब्धि होती है, जिसके लिए बार बार फ़ेल होना भी आम बात है। यही नहीं कुछ सालों में फिर से टेस्ट लेकर लाइसेंस रिन्यू करना भी आम है। फिर ये भी होता है कि अलग अलग गाड़ियों या इंजिन क्षमता के लिए अलग लाइसेंस होते हैं। यानि ज़रूरी नहीं कि एक ही लाइसेंस से आप ऐक्टिवा भी चला सकें और डुकाटी भी। विडंबना यही है कि हमारे यहां वर्ल्ड क्लास प्रोडक्ट तो आ गए हैं लेकिन वर्ल्ड क्लास सेफ़्टी स्टैंडर्ड नहीं आए। तो ज़रूरत है हमारी लाइसेंिसंग व्यवस्था दुरूस्त हो। नए ज़माने के लिए, नई गाड़ियों के लिए बने। उन ऑफ़िसों से भ्रष्टाचार दूर हो। क्योंकि भ्रष्टाचार हमारी ज़िंदगी मुश्किल कर देता है, लेकिन लाइसेंस देने में भ्रष्टाचार ज़िंदगी मुश्किल नहीं, बल्कि ख़त्म कर देती है। तो क्या इस भ्रष्टाचार पर भी किसी पार्टी की नज़र जाएगी ?

पैदल - किसी यूरोप के शहर में टहलिए या जापानी सड़कों पर चलिए, ज़ेब्रा क्रॉसिंग से सड़क पार कीजिए। सामने से आने वाली गाड़ियों को देखिए, उनका रवैया देखिए। चलिए कई किलोमीटर तक। अगर आप गए हैं तो फिर कल्पना करने में कोई दिक़्कत नहीं, अगर नहीं गए हैं तो थोड़ा अपना तजुर्बा बता दूं। ज़्यादातर जगहों पर चलने वालों को तरजीह दी जाती है, फ़ुटपाथ का मतलब फ़ुटपाथ होता है, पैदल यात्रियों के लिए गाड़ियां रुकती हैं और अगर आप सड़क पार करे रहे हैं तो आपके लिए वो रुक जाएंगी, हम हिंदुस्तानियों के लिए आश्चर्य की एक और बात की वो ड्राइवर इशारा करेगा कि आप पहले पार कर लीजिए।  और फिर आईए वापस देश में। अब अपने अपने कॉलनी में चलिए, ऐसे ही फ़ुटपाथ पर चलने की कोशिश कीजिए, सड़क क्रॉस करने की कोशिश कीजिए और लंबी दूरी पैदल तय करने की कोशिश कीजिए। और अब अचानक लगेगा कि हमारे देश की सड़कें और ट्रैफ़िक व्यवस्था पैदल यात्रियों के बिल्कुल ख़िलाफ़ है। देश के ज़्यादातर शहरों में ज़्यादातर सड़कों के फ़ुटपाथ पर लोगों ने क़ब्ज़ा कर रखा है। बड़ी सड़कों पर ये क़ब्ज़ा ठेलेवालों और रिक्शे वालों का रहता है तो कॉलनी के अंदर अपने आप को सभ्य कहने वालों का होता है। जिनकी कोठियों के सामने की सड़क कार पार्किंग के तौर पर इस्तेमाल होती है। यानि अगर आप पैदल चलने की कोशिश करते हैं तो आपको चलती और पार्क की गई गाड़ियों के बीच रास्ता खोजना पड़ता है। तो जो टहलना आराम के लिए होता, एक संघर्ष में तब्दील हो जाती है। और इस संघर्ष का मतलब ये कि आपको केवल रास्ता नहीं ढूंढना होता है, जान भी बचानी होती है। और पैदल यात्रियों की भारत में जितनी कम इज़्ज़त है वो शायद ही कहीं हो। गाड़ी वाले उनके लिए रुकेंगे क्या, कुचल कर निकल जाते हैं। हाल में दिल्ली में एक नौजवान पैदलयात्री की कुचल कर मौत हो गई थी। जिसमें एक चौंकानेवाली दलील ये सुनने को मिल रही थी कि उस नौजवान ने कान में हेडफ़ोन लगाया हुआ था और कार की हॉर्न नहीं सुन पाया और कुचला गया। बताइए, यानि पैदल यात्री के जान की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उसकी ख़ुद की है, अगर उसने ग़लती की, हॉर्न नहीं सुना तो उसे अपनी जान गंवानी पड़ सकती है। सवाल ये है कि पैदल यात्रियों के हक़ के लिए क्या कोई क़दम उठाया जाएगा ? 


साइकिल ट्रैक- दिलचस्प बात ये है कि एक राजनीतिक पार्टी का चुनाव चिन्ह है साइकिल। एक हद तक राज्य में सरकार बनाने तक का रास्ता भी तय किया है साइकिल पर चढ़ कर ही। ये एक प्रतीक है। वहीं आम ज़िंदगी में भी साइकिल की अहमियत बहुत ज़्यादा है। ग़रीबों की सवारी के तौर पर देखें तो भी और हम सबकी ज़िंदगी में साइकिलों की इमोशनल मौजूदगी के तौर पर भी। लेकिन साइकिल चलाना आजकी तारीख़ में जान पर खेलने वाली बात है। जो आंकड़े बता रहे हैं कि देश में सड़क हादसों में मारे जाने वाले लोगों में आधी संख्या पैदल यात्रियों और साइकिल सवारों की ही होती है। और जिस तरीके से सड़कों को कारों के लिए बना सिग्नल वाले रास्ते बनाने की कोशिशें चल रही हैं ऐसे में पैदल यात्री और साइकिल सवार पर ख़तरा और बढ़ा है। हालांकि ये दोनों ही वर्ग ऐसे हैं जिसमें आम लोग होते हैं, ग़रीब होते हैं, और उनकी ज़िंदगी की क़ीमत राजनीति में कम आंकी जाती है इसलिए अब तक उनकी सेफ़्टी के लिए गंभीरता नहीं दिखाई देती है। हां ये हादसे हेडलाइन तभी बन पाते हैं जब कोई बड़ा नाम इसमें शामिल होता है, चोट पहुंचाने वाले में या फिर चोट खाने वाले में। हाल में हमने देखा था सेंटर फ़ॉर साइंस एंड इनवायरन्मेंट की सुनीता नारायण का जब साइकिल चलाते वक्‍त एक्सिडेंट हुआ था। अख़बारों में ख़बरें देखी थीं मैंने। कहने का मतलब ये नहीं आम साइकिल सवार का ऐक्सिडेंट हो तो ख़बर छपे, सवाल ये है कि क्यों नहीं इस तबके के लिए सोचा जाए कि दुर्घटनाएं कमसेकम हो।
क़ानून- मैं क़ानून का जानकार नहीं लेकिन ये ज़रूर समझ सकता हूं कि जो क़ानून हैं भी उनका पालन नहीं हो रहा है। पालन इसलिए नहीं हो रहा है कि क्योंकि उसे लागू करने में कोताही बरती जाती है। कोताही क्यों बरती जाती है ये सवाल ऐसा है जिस पर थिसीस लिखी जा सकती है। लेकिन इस कोताही से क्या कुछ हो रहा है ये अब दिख तो रहा है लेकिन इसकी गंभीरता समझी नहीं जा रही है। रेड लाइट जंप करने पर, ग़लत ओवरटेक करने पर, ओवरस्पीड करने पर इन सभी मौक़ों पर जब आराम से छूट जाते हैं, ज़्यादातर मौक़ों पर कोई देखनेवाला नहीं होता है, कुछेक मौक़ो पर १००से ४०० रु में छूट जाते हैं। या फिर किसी एक बच्ची को अपनी गाड़ी से कुचल देते हैं जिसके स्कूल का पहला दिन होता है, और उसके पिता को भी जो अपनी बेटी को स्कूल बस में पहले दिन जाते देखने की ख़्वाइश के साथ सुबह उठ कर आया था, जो गुड़गांव के एक अस्पताल में दिल का डॉक्टर भी था। और दोनों की जान लेने के बाद कुछ घंटों में अगर ड्राइवर को बेल मिल जाए, और वो ज़मानत पर छूट आए। ये सब देखकर यही लगता है कि यहां आप कुछ भी करके निकल सकते हैं, सब चलता है। 
अपनी बेटी और पति को एक साथ खोने के ग़म में जो महिला सदमे में चली जाती है, शायद हर साल सवा लाख परिवार भी ऐसे ही सदमे में चले जाते होंगे, जिनका अपना घर वापस नहीं आता होगा। लेकिन बाकी के हम लोग सदमे में नहीं जाते हैं। देश सदमे में नहीं जाता। सवाल यही है कि इस सदमे की आदत कब जाएगी ? 

Ctrl+C और Ctrl+V ना करें । कहीं ना कहीं छपी हुई है।
(published before 2014 elections I guess..)