August 21, 2011

गाड़ियों का सोशल साइंस


आज आपको बताता हूं, हाल में हुई एक मुलाक़ात के बारे में। जिन्हें पहली बार देखा तो लगा कि किसी कॉलेज का प्रोफ़ेसर आ रहा है। लंबे उलझे बाल और बहुत ही नॉन कॉरपोरेट कपड़े। ख़ासकर यूरोप में, ऊपर से जर्मनी जैसी जगह पर तो बहुत कम ही ऐसे फ़ॉर्मल ईवेंट होते हैं जो सूट-पैंट में ना हों। और ऐसे में मिस्टर मैनकॉव्स्की बहुत ही अलग दीख रहे थे। थे भी अलग । डॉ अलेग्ज़ेंडर मैनकॉव्स्की एक सोशल साइंटिस्ट हैं। पिछले सवा सौ सालों के इतिहास और सामाजिक बदलाव को बहुत ही ध्यान से पढ़ा है इन्होंने। क्योंकि यही वो वक्त है जिसके दौरान सारे बदलावों को देख-परख कर मैनकॉव्स्की भविष्यवाणी करते हैं । ये किसी राशिफल या मौसम की भविष्यवाणी तो नहीं ही करते हैं, ये बताते हैं आने वाले कल के समाज के बारे में और उनमें इस्तेमाल होने वाली कारों के बारे में। दरअसल ये सोशल साइंटिस्ट डेमलर कंपनी के लिए काम करते हैं, यानि मर्सेडीज़ बनाने वाली कंपनी के लिए। वहीं पर ये फ़्यूचरिस्ट हैं।

अब ये जानकारी ही मेरे लिए बहुत दिलचस्प थी। इंजीनियर, डिज़ाइनर, मार्केटिंग वाले लोगों की टीम के बारे में तो बहुत सुन लिया। लेकिन ये पर सुनते ही काफ़ी ख़ास लगा कि सोशल साइंटिस्ट की टीम काम कर रही है एक ऑटोमोबील कंपनी के लिए। टीम जो लगी है दुनिया भर के बदलते सामाजिक समीकरण को रिकॉर्ड करने, समझने औऱ आने वाले दिनों के बारे में भविष्यवाणी करने में।
मैनकॉव्स्की से मेरी मुलाक़ात हुई थी स्टुटगार्ट में, मर्सेडीज़ म्यूज़ियम में । जहां पर पहले हमने दौरा किया म्यूज़ियम का, दुनिया की पहली ऑटोमोबील देखी, 1886 में बनी वो ऑटोमोबील जिसे हल्की नज़र से देखें तो लगेगा कि कोई छोटी बग्घी है, जिसमें फ़िलहाल घोड़ा नहीं लगा है। इस कार के बारे में पढ़ा था, तस्वीरें देखी थीं। म्यूज़ियम के पूरे चक्कर में पिछले सवा सौ सालों में गाड़ियों की दुनिया और दुनिया में गाड़ियां कैसे बदली हैं ये बात थोड़ी समझ में आई।
और उसके बाद हुई इस मुलक़ात ने एक नए पहलू से परिचित करवाया। मैनकॉव्स्की के पास पूरा टाइमलाइन था। बदलते सामाजिक परिवेश के साथ कैसे गाड़ियां बदलीं, दुनिया में जो भी बदलाव आए वो सभी गाड़ियों पर असर छोड़ गए। वैसे यूटोपियनिज़्म, एटॉमिक एज और न्यू यूटोपियनिज़्म जैसे फ़ॉर्मूले दिलचस्प थे। इस बारीक स्टडी से आप इंप्रेस हुए बिना नहीं रहेंगे और इसकी तुलना ज़रूर करेंगे अपने देश से। और मैंने भी किया और पाया कि समाज का असर तो फ़िलहाल गाड़ियों पर कम ही लग रहा है गाड़ियों पर। गाड़ियों का असर समाज पर ज़्यादा लग रहा है। और फिर महसूस हुआ कि क्यों नहीं देश के नेता और ब्यूरोक्रैट सोशल साइंस के ऐसे अंग को अहमियत देते हैं। की जो दिशा दे सके भारतीय ट्रांसपोर्टेंशन को।
एक तरफ़ वेस्ट में ट्रांसपोर्टेशन फ़िलॉसफ़ी का एक अंग हो चुकी है और अपने यहां बिना किसी विज़न के ट्रांसपोर्टेशन बढ़ी जा रही है। सड़कों पर मरने वाले हिंदुस्तानियों की तादाद बढ़ती जा रही है (दुनिया में नंबर एक पर हैं हम), सड़कें असुरक्षित,लोग बेचैन, मानो कोई माई-बाप नहीं। सड़क पर आक्रामकता के लिए दिल्ली बदनाम थी, लेकिन बैंगलौर और मुंबई की भी वही हालत देखी मैंने। चेन्नई का तो पूछिए मत। एक ऑटोवाला, मेरे टैक्सीवाले को ऐसे गालियां दे रहा था कि समझ में नहीं आ रहा था कि वो तमिल बोल रहा है या पंजाबी । वहीं छोटे शहर, जहां लगता है कि ज़िदगी संभल कर चलती है, लोग रिलैक्स होंगे, प्रेशर कम होगा...वहां पर तो हालत और बदतर होती जा रही है। रांची मे मैंने ड्राइव किया, पटना, भुबनेश्वर, पांडिचेरी में गाड़ी चलाई। लुधियाना, जोधपुर में भी। हर जगह गाड़ियों की तादाद ज़्यादा, सड़कें पतली, ट्रैफ़िक रूल्स और सेसं दोनों का अकाल और ऊपर से क़ानून को लागू करनेवाला कोई नहीं। और साफ़ लगता है कि इन सभी शहर की सारी ख़ूबसूरती ख़त्म हो रही है सड़कों पर जाकर। जहां पर हॉर्न और ब्रेक की आवाज़ के बीच लोगों की पहचान पिस रही है।
बिना किसी सोच, विज़न के हर तरफ़-हर तरह की गाड़ियां ठूंस दी गई हैं, रिक्शा साइकिल बसों के साथ, ऑटो को कारों के साथ, ठेलागाड़ी और पैदल को कारों के साथ। सबकुछ गड्डमड्ड। जिसका असर ये हो रहा है हर सुबह सड़कों पर उतरते ही हमारा धीरज चला जाता है तेल लेने, इंसानियत छुप जाती है गाड़ी की बैकसीट पर और हमारा लानत का मशीनगन चालू हो जाता है जो आएं-दाएं-बाएं सबको लानत  भेजना शुरू कर देता है। कुल मिलाकर देश के नेताजन एक ऐसा जेनरेशन तैयार कर रहे हैं जो पहले से कही ज़्यादा कुंठित है, डेल्ही बेली से ज़्यादा गालियां देता है और सड़क पर हर दूसरे इंसान को रेंगने वाला कीड़ा समझता है। कहने का मतलब ये कि आने वाले दिनों में हम हिंदुस्तानियों का बेसिक कैरेक्टर बदलते देख सकेंगे। सुबह शाम सड़कों पर दिखने वाला कैरेक्टर स्थाई हो जाएगा। और मैं चाहता हूं कि जब भी कोई सोशल साइंटिस्ट भारतीय ट्रांसपोर्टेशन पर अपनी पीएचडी कर रहा हो तो मुझसे एक एक दो सवाल ज़रूर पूछे और ऊपर जो मैने बाते लिखीं हैं वो अपने थीसिस में बोल्ड में टाइप करे ।

(डॉ एलैग्ज़ैंडर मैनकॉव्स्की की भूमिका डेमलर कंपनी की फ़्यूचर स्ट्रैटजी से जुड़ी है। आने वाले वक्त में समाज में क्या बदलाव हो सकते हैं, लोगों की ज़रूरतें और पसंद कैसे बदल सकती है, इसकी जानकारी वो कार डिज़ाइनरों के साथ बांटते हैं जो नए टेक्नॉलजी नए फ़ीचर्स के ऊपर काम करते हैं। और तैयार होती हैं कौंसेप्ट कारें। फ़िलहाल मैनकॉव्स्की सबसे ज़्यादा गंभीर हैं फ़्यूल सेल गाड़ियों को लेकर। वो कारें जो हाईड्रोजन जैसे ईंधन से चलेंगी। जर्मनी में सरकार ने भी इसके लिए समर्थन दिया है। कई पंप खोले जाएंगे जहां पर फ़्यूल सेल ग्राहक अपनी कारों में हाइड्रोजन भरवा सकेंगे)

(प्रभात ख़बर में छपी थी कुछ दिनों पहले)

2 comments:

naitik said...

hi if you in germany please visit the world's first petrol pump i herd lot about it, its the place from where veg. oil is bought for that first car you have scene

Ajayendra Rajan said...

पोस्ट अच्छी लगी, डॉ एलेक्जेंडर मैनकॉव्स्की के काम को जानने की प्यास बुझी नहीं अभी, कभी फुर्सत मिले तो एक पोस्ट उनके नाम कीजिएगा जरूर.