June 05, 2012

Celebrities for Common Man !!!??


बॉलीवुड का प्रेम कहें, बॉलीवुड की ताक़त पता नहीं लेकिन भारत में इससे बेहतर उपाय नहीं हैं लोगों से जुड़ने के लिए लगता है। तमाम न्यूज़ चैनल के तमाम प्रड्यूसरों के बीच अचानक रोना पीटना मच गया कि आमिर ख़ान ने हमारा आइडिया चोरी कर लिया। अब आमिर ख़ान भले ही आंसू निकालते बहुत सहज ना लगे हों लेकिन देखने वाली बात ये भी है कि वो स्टार पावर ही था जिसकी वजह से देश के तमाम कोनों में एक साथ कन्या भ्रूण हत्या पर चर्चा हो रही थी। भले ही ये चर्चा दो दिन की ही हो। कहने का मतलब ये कि पूरे देश से एक साथ जुड़ने के लिए बॉलिवुड से बढ़िया शॉर्टकट शायद ही कोई हो। और मक़सद चाहे सामाजिक हो या बाज़ारिक। जैसे अगर किसी मोटरसाइकिल कंपनी का मक़सद हो भारत में नंबर एक बनने का तो वो क्या करे ? जीहां सही जवाब। बॉलीवुड स्टार को ब्रांड एंबैसेडर बनाएगी। वही किया भी, हौंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया लिमिटेड ने। हीरो से गठजोड़ टूटने के बाद हौंडा अपने बूते पर भारत में नंबर एक टू-व्हीलर कंपनी बनना चाहती है। जिसके लिए कंपनी ने साल 2020 तक का लक्ष्य रखा है।

 और नंबर एक बनने के लिए ज़रूरी है कि हीरो के असल गढ़ में सेंध लगाई जाए, यानि सस्ती सौ सीसी बाइक। औऱ हौंडा ने यही किया भी। यही नहीं, इस बाइक को आम ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए कंपनी ने अपनाई है जानी मानी रणनीति। बॉलीवुड। हौंडा ने अपनी नई सस्ती मोटरसाइकिल उतार दी है ड्रीम युगा के नाम से, 110 सीसी की मोटरसाइकिल जिसकी शुरूआती क़ीमत साढ़े चवालिस हज़ार रु रखी गई है। और इस मोटरसाइकिल पर बैठे प्रेस के सामने आए हौंडा के नए ब्रांड एंबैसेडर। अक्षय कुमार। अब तक हौंडा स्कूटरों में नंबर एक कंपनी रही है, मोटरसाइकिल भी थोड़े मंहगे सेगमेंट वाले रहे हैं। लेकिन अब कंपनी को ज़रूरत है आम ग्राहकों तक पहुंचने की, गांव-गांव कस्बे-कस्बे तक, जिसके लिए अक्षय कुमार को कंपनी ने चुना है।

 पूरे देश से एक साथ जुड़ने के लिए बॉलिवुड से बढ़िया शॉर्टकट शायद ही कोई हो। और मक़सद चाहे सामाजिक हो या बाज़ारिक।


वैसे दिलचस्प बात ये है कि बाकी के जापानी मोटरसाइकिल महारथी भी इसी रणनीति को अपनाते देखे गए हैं। दरअसल ऐसे में सबसे पुरानी दोस्ती रही है यामाहा और जॉन अब्राहम की। जहां यामाहा ने पहली बार जॉन को तब अपनाया जब कंपनी भारत में दो नई बाइक लाकर हंगामा करना चाह रही थी। आर 15 और एफ़ज़ी के साथ। लेकिन बाद में भी हालत सुधरी नहीं और ख़र्च बचाने के  चक्कर में यामाहा ने जॉन से किनारा कर लिया। लेकिन अब दोस्ती वापस बन चुकी है। लेकिन यहां पर चर्चा करने वाली एक और दिलचस्प बात ये है कि तीसरी जापानी महारथी सुज़ुकी ने भी यही रणनीति अपनाई है। और कंपनी की आने वाली सस्ती बाइक हायाते के ब्रांड एंबैसेडर के तौर पर ला रही है दबंग सलमान ख़ान को। जिस सेगमेंट में हायाते या ड्रीमयुगा आ रही है वहां के लिए सलमान और अक्षय किसी भी कंपनी के लिए ज़रूरी भी हैं।
हौंडा ने एक दिलचस्प आंकड़ा दिया कि कंपनी के दुनिया भर की बिक्री में से 13 फीसदी भारत से फिलहाल आती है। इसी बिक्री को कंपनी 2020 तक 30 फीसदी तक ले जाना चाहती है। साफ़ है कि भारतीय बाइक बाज़ार कितना अहम है इनके लिए।  इन कंपनियों की कोशिशें इसी बात का सबूत हैं कि भारतीय बाइक बाज़ार में अपना हिस्सा बनाने और बढ़ाने के लिए वो कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती हैं। 

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May 30, 2012

वो दूसरे ग्रह नहीं...



कई मौक़ों पर इस बात को कहते हुए अलग अलग तरीके की प्रतिक्रिया पाई है। कुछ वाकई आह्लादित होते हैं, कुछ के चेहरे उत्सुकता से भरते हैं और कुछ मेरी दलील में देश के प्रति अभिमान महसूस कर सहानुभूति का भाव दिखाते हैं लेकिन कभी भी बहुत विश्वसनीय नहीं बन पाता हूं मैं। वो ये कि भारत में भी इंटरनैशनल स्टैंडर्ड की सड़कें हैं। और इस पर अविश्वास के पीछे वजहें भी हैं। समझाना बहुत जटिल भी है। सड़कों में गड्ढे या गड्ढों में सड़क के यक्ष प्रश्न पूछती जिन भारतीय सड़कों ने पिछली आधी शताब्दी से भारतीयों को बातचीत के लिए एक बहुत ही ठोस और विचारोत्तेजक टॉपिक दिया है, उनके बारे में कोई भी नई जानकारी का मतलब है इस विषय पर फिर से विचार मंथन, यानि फिर से सोच-विचार। बिना वजह की मेहनत। ख़ैर फिर भी कहूंगा। भारतीय सड़कें अंतर्राष्ट्रीय स्तर की हैं। शहर के तौर पर दिल्ली की सड़कें तो हैं ही इंटरनैशनल क्वालिटी की, देश के ढेरों हाइवे बेहतरीन क्वलिटी के हैं। और मेरी ये बातें बहस की शक्ल तब ले लेती हैं जब जब कोई नया-बड़ा लौंच होता है, तेज़ तर्रार करोड़ों की कार या फिर दमदार सुपरबाइक। या फिर कोई दुखद हादसा होता है जिनमें सैकड़ों हॉर्सपावर की ताक़त किसी की जान लेती है। हालांकि मेरी भागीदारी की ज़रूरत नहीं होती है इस बातचीत में क्योंकि करोड़ों की कार का ऐक्सिडेंट हमेशा से एक सनसनीख़ेज़ घटना होती है, एक तो आमतौर इन महंगी गाड़ियों के मालिक बड़ी हस्ती होते हैं और दूसरे ये दुर्घटनाएं बहुत ही भयावह होती हैं, जिनकी बारीकियों इतनी होती हैं कि कई दिनों की चर्चा हो जाए। हाल में दिल्ली की एक ऐसी ही दुर्घटना हुई और वैसी ही बहस भी हुई। भारत में कहां हैं सड़क ऐसी गाड़ियों के लिए, ये विदेश थोड़े ही ना है कि ऐसी गाड़ियां यहां भगाई जाएं। और देश-ग्लानि से भरे इन दलीलों पर तो जवाब देना बनता है ना। माना कि करोड़ों की कार थी लैंबोर्गिनी जिसका ऐक्सिडेंट हुआ, परखच्चे उड़ गए। एक साइकिल वाले बूढ़े भी चपेट में आ गए। और उस कार को चलाने वाला नौजवान मारा गया। तस्वीरें टीवी स्क्रीन पर सुबह से तैरने लगीं और विश्लेषण होने लगे, ये भारत के लिए बनी कार नहीं है, यहां की सड़कें ऐसी कारों के लिए ठीक नहीं।


करोड़ों की कार का ऐक्सिडेंट हमेशा से एक सनसनीख़ेज़ घटना होती है।

सबसे ज़्यादा सुपरकारों की वेराइटी मैंने हाल फिलहाल में दुबई में देखी थी, जहां पर सड़कें ज़बर्दस्त थीं और हाईवे तो और भी शानदार। वहां पर स्पीड लिमिट पता है कितनी थी 120 किमीप्रतिघंटे की। जो देश दमदार गाड़ियों के लिए नामी है और भारत में बदनाम है, जर्मनी। वहां के शहरों में स्पीड लिमिट 30 से लेकर 50 किमीप्रतिघंटे के बीच था। हां ऑटोबान ऐसा हाईवे है जिस पर स्पीड लिमिट नहीं है लेकिन वो भी लगभग आधे हिस्से में। हां लेकिन वो हाईवे भी कोई बीस-पच्चीस लेन वाला नहीं है। वैसा ही हाइवे है जैसे भारत में कई जगह दिखेंगे। टोकियो शहर के अंदर की सड़कें दिल्ली से पतली मिलेंगी । दरअसल जब से पैदा हुआ हूं भारत एक विकासशील देश ही बना हुआ है और ऐसे में विकसित देशों का एक अजीब से हौव्वा बना हुआ है विकासशीलों के ज़ेहन में, विकसित देश ना हो गए कोई अलग ग्रह ही हों। जहां पर इलेक्ट्रॉनिक सड़कें और डिजिटल गाड़ियां हों और हर सड़क पर बेशुमार रफ़्तार में गाड़ी भागती हों औऱ माहौल पूरा जादुई हो। लेकिन सच्चाई ये है कि फर्क सड़क की क्वालिटी में नहीं है, उस पर चलने वाले लोगों और चलाने वाली सरकारों में है। जहां पर एक-एक नियम को पालन किया जाता है। वहीं फेरारी और लैंबोर्गिनी 30 और 50 की स्पीड से ही उन सड़कों से गुज़रती हैं जहां पर लिमिट होता है। और जब उन्हें टॉप स्पीड चेक करनी होती है तो फिर वो रेसट्रैक पर जाते हैं। और यही फर्क है हमारे और उनके बीच। वो तेज़ रफ़्तार को पसंद करते हैं, इज़्ज़त भी और उसे कंट्रोल भी। उसके रोमांच को भी पहचानते हैं और ख़तरे को भी। लगेगी किताबी बात लेकिन विकसित देशों में आम लोगों के जान की क़ीमत हमारे यहां से ज़्यादा आंकी जाती है। इसीलिए नियम लागू किए जाते हैं, जिसकी लोग इज़्ज़त भी करते हैं, मानते भी हैं और ना मानने वाले के लिए भारी जुर्माना भी है। कुलमिलाकर ये उनके जीवन का हिस्सा है। यकीन नहीं आएगा, ओवरस्पीडिंग के लिए साइकिल का चालान होते मैंने ख़ुद देखा है जर्मनी में। जीहां एक साइकिल जो काफ़ी तेज़ जा रही थी और उसने स्पीड लिमिट पार कर ली थी।
तो इस दुनिया और उस दुनिया में फर्क बहुत महीन-बारीक और समाजशास्त्रीय विश्लेषण जटिलता लिए नहीं है। अब दोनों दुनिया की गाड़ी कमोबेश एक जैसी हो गई हैं, सड़कों में इस्तेमाल होने वाला तारकोल भी एक जैसा ही लगा। दरअसल फर्क बहुत ही बेसिक है। उन्होंने कुछ नियम बनाए हैं और ये तय कर लिया है कि इस नियम का पालन होकर रहेगा। और इस छोटे से फर्क का असर हम महसूस कर सकते हैं।
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March 25, 2012

‘क्लच’रहित क़िस्सा

ज़माना था जब समझना पड़ता था, ऑटोमैटिक यानि बिना गियर वाली कार, जिसमें बस ऐक्सिलिरेटर दबाने की ज़रूरत होती है, क्लच नहीं और ये तो मानी हुई बात थी कि ऑटोमैटिक की माइलेज कम होती है।  

भारत में विंटेज कारों के शौकीनों की कमी नहीं। बल्कि उन्हीं में से कईयों को देखकर मुझे पता चला कि हमारे देश के राजा-रजवाड़ों की कैसी रईसी थी। बचपन में हिस्ट्री में दिलचस्पी नहीं थी और थोड़ा बड़ा हुआ तो लगने लगा कि डेमोक्रेसी में रजवाड़ों की हालत कितनी दयनीय होती होगी, क्या पता मूलचंद की रेडलाइट पर बगल वाली गाड़ी में कोई युवराज बैठा हो और किसी को कोई फर्क भी नहीं पड़ रहा। ख़ैर डेमोक्रेसी के उस भावुकता के दौर से भी निकलने में ज़्यादा देर नहीं लगी और एक दिन अचानक मुझे राजा रजवाड़ों की एक अनोखी अहमियत पता चली। और वो थी विंटेज कारें, अगर वो नहीं होते तो गाड़ियों के साथ हमारा रिश्ता बहुत अलग होता, है ना ?  अगर रजवाड़ों के कारिंदे शौक और जतन से कारों को संभाल कर ना रखते तो इतनी कहानियां हम तक पहुंचती ही नहीं। जैसे बहुत साल पहले एक कार देखकर मैं अचरज में पड़ गया था, 1959 में बनी शेवरले की एक कार जो ऑटोमैटिक थी। उसे देखकर मैं अचरज में पड़ गया था। ये वो ज़माना था जब समझना पड़ता था, ऑटोमैटिक यानि बिना गियर वाली कार, जिसमें बस ऐक्सिलिरेटर दबाने की ज़रूरत होती है, क्लच नहीं और ये तो मानी हुई बात थी कि ऑटोमैटिक की माइलेज कम होती है। ज़ाहिर है ऐसी कारों का तो भारत में सामाजिक बहिष्कार होना ही था। अब स्थिति बदल गईं हैं। लोग बढ़ती ट्रैफ़िक से बचने के तरीके ढूंढ रहे हैं। केवल लग्ज़री कार ग्राहक ही नहीं। कई कार कंपनियां अब छोटी कारों में भी ऑटोमैटिक वर्ज़न भी लेकर आ चुकी हैं। ह्युंडै ने इस मामले में पहले हिम्मत दिखाई थी जब आई 10 भी ऑटोमैटिक वर्ज़न में आने लगी। छोटी कारों में मारुति के पास भी शुरूआत में वैगन आर का ऑटोमैटिक वर्ज़न थे लेकिन बहुत आसानी से मिलते नहीं थे । लेकिन अब उनकी ए स्टार जैसी छोटी गाड़ियों की लगभग 5 फीसदी बिक्री ऑटोमैटिक की होती है, जो एक ठीकठाक संख्या कही जाएगी।

अमेरिका में ऑटोमैटिक वर्ज़न की व्यवहारिकता पर कभी सवाल नहीं था क्योंकि वहां तेल की भरमार रही और तेल सस्ता। और ऑटोमैटिक कार को चलाना आरामदेह तो होता ही है। आज के वक्त में तो और भी, ख़ासकर बड़े शहरों में। जहां के ट्रैफ़िक में क्लच दबाते दबाते घुटने की हड्डी साढ़े तीन साल में ही घिस जाए। इस परेशानी ने भी लोगों को ऑटोमैटिक कारों की ओर धकेलना शुरू किया है। लेकिन साथ में कार कंपनियों के तरफ़ से कई ऐसी कोशिशें हुई हैं जो कार बाज़ार में छोटे से ही सही लेकिन ऑटोमैटिक कारों के सेगमेंट को बढ़ाने में मदद दे रही हैं। जैसे ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन के टिकाऊपन पर भारतीय ग्राहकों की शंका को ख़त्म करने के लिए फ़ोर्ड ने अपनी फ़िएस्टा का ऑटोमैटिक वर्ज़न पेश किया, जिसके ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन पर कंपनी ने दस साल या ढाई लाख किमी तक का वायदा किया है, यानि दस साल तक ट्रांसमिशन मेंटेनेंस फ्री। साथ में कंपनी ने माइलेज को भी ठीक-ठाक रखा है। लगभग 17 किमी प्रतिलीटर की माइलेज वो भी ऑटोमैटिक कार में अच्छी मानी जाएगी। और इसके अलावा कंपनी ने इसकी क़ीमत भी बहुत ज़्यादा नहीं बढ़ाई। हालांकि पहले से ही नई फ़िएस्टा काफ़ी महंगी कार रखी गई थी लेकिन आमतौर पर ऑटोमैटिक कार वेरिएंट मैन्युअल से लाख से ज़्यादा मंहगा होता है लेकिन नई फ़िएस्टा में ऐसा नहीं किया कंपनी ने। 8 लाख 99 हज़ार रु से ये शुरू हुआ है। ख़ैर इस केस में ना सही लेकिन आम तौर पर सभी कार कंपनियों की तरफ़ से ऑटोमैटिक वेरिएंट पेश किए जा रहे हैं ख़ास वर्ग के ग्राहकों के लिए। साथ में कंपनियां उन्हें ज़्यादा भरोसेमंद, सस्ता और किफ़ायती बनाने की भी कोशिश कर रही हैं। जिसे देखकर लग रहा है कि आने वाले वक्त में बहुत से ग्राहक अपने बाएं पैर को आराम देने के लिए ऑटोमैटिक कारों को ख़रीदने वाले वर्ग में शामिल होते लग रहे हैं। 

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March 23, 2012

नैनो का पुनर्जन्म ?


वक्त आ गया शायद इस सवाल का, जब आम ग्राहक भी वो सवाल पूछें जो टाटा मोटर्स दरअसल बहुत लंबे वक्त से पूछ रही है। क्या अब वापसी होगी नैनो की ?  और इस सवाल के पीछे की भूमिका हमने देख ली है। मंहगाई बढ़ी है, कई स्तर पर। लोगों ने कार-ख़रीदने के फ़ैसले को या तो टाल दिया है या कैंसिल कर दिया है। कार लोन महंगे हो गए हैं, और जिस ज़रिए से भारत की सारी कारें ख़रीदी जाती हैं, अगर उन्हीं कार लोन की ये हालत हो तो फिर क्या कीजिए...और ये सब क्या कम था कि पेट्रोल की क़ीमतों में आग लग गई। और इस पृष्ठभूमि के बाद तो दो ही रास्ते दीखते हैं, या तो कार ख़रीदें ही नहीं या फिर सस्ती ख़रीदें। क़ीमत में सस्ती और रखरखाव में भी। और इस माहौल में नैनो का याद आना लाज़िमी है। ना सिर्फ़ वो एक छोटी कार है बल्कि सस्ती और किफ़ायती भी।

और ये याद इसलिए भी आएगी क्योंकि हाल में फिर से नैनो की चर्चा शुरू हो गई है। आपने भी देखा ही होगा कि कैसे टाटा मोटर्स एक बार फिर से जान फूंकने की कोशिश में लग गई है नैनो के भीतर। जिसकी एक कड़ी है नैनो का अपग्रेड जिसके भीतर दो तीन तब्दीलियां दिखेंगी। जिनमें सबसे अहम है इंजिन का प्रदर्शन। 2012 वर्ज़न वाली नैनो आई है इंजिन में बदलाव के साथ, बदलाव का मतलब आंकड़ों से है। इंजिन तो वही 623 सीसी वाला है, लेकिन 3 बीएचपी का इज़ाफ़ा ताक़त में दिखा है और साथ में माइलेज भी बढ़ी है। एआरएआई ने एक लीटर पेट्रोल में नई नैनो की माइलेज मापी है 25.4 किमी की । हां क़ीमत में फ़िलहाल कोई बदलाव नहीं दिखा है। मोटे तौर पर देखें तो बदलाव बहुत क्रांतिकारी नहीं हैं, लेकिन हां इसी बहाने हर महीने गिरती बिक्री की जगह लोगों की नज़र इसके बदलावों पर गई है। पर इससे इस कार का पुनर्जन्म हो जाएगा, मुझे नहीं लगता है।
 
(वैसे ये नैनो के आधार पर बनी कॉंसेप्ट मेगापिक्सेल की तस्वीर है)

जिस पुनर्जन्म की संभावना मैं देख रहा हूं वो होगा एक नए इंजिन की बदौलत। नैनो बहुत जल्द आ रही है नए डीज़ल इंजिन के साथ। फ़िलहाल मैं इंतज़ार कर रहा हूं ऑटो एक्स्पो का जहां हो सकता है डीज़ल नैनो दिख जाए। अभी तक की जानकारी के मुताबिक इसमें 1.1 लीटर का इंजिन लग सकता है और इसकी माइलेज काफ़ी बढ़िया हो सकती है। अब बढ़िया तो हम 30 के ऊपर के आंकड़े को ही मानेंगे। जिसके अलावा एक और ख़ास पहलू होगा नैनो डीज़ल की क़ीमत।
हाल के वक्त में पेट्रोल से किसी भी तरीके से पिंड छुड़ाने में लगे ग्राहकों के पास डीज़ल के भी कई विकल्प आ चुके हैं। जिनमें से सबसे लेटेस्ट है शेवरले बीट डीज़ल। जिसमें लगा है हज़ार सीसी या एक लीटर का डीज़ल इंजिन और क़ीमत शुरू हुई है 4 लाख 28 हज़ार रु से । इस कार ने शेवरले की बिक्री में रफ़्तार दे रखी है।वहीं नैनो अपनी क़ीमत की बदौलत एक नए तरीके के सेगमेंट को जन्म दे सकती है। और मुझे ये लग रहा है कि जो काम पेट्रोल नैनो नहीं कर पाई, वो डीज़ल नैनो करेगी। अगले साल मार्च के आसपास की ख़बर सुन रहा हूं इसके लौंच की। और हो सकता है कि एक बार फिर से ये चर्चा में रहे ये कार, और बहस शुरू हो जाए कि पैसेंजर सेगमेंट के लिए यानि आम आदमियों के लिए डीज़ल पर सरकार की सब्सिडी कितनी जायज़ है। डीज़ल कारों औऱ एसयूवी पर टैक्स लगना चाहिए वगैरह वगैरह। लेकिन सच्चाई ये भी है कि नैनो को तो इस तरह के बहस की आदत है।
( थोड़े दिन पहले लिखी थी, *Already Published)

March 19, 2012

what is the point !! republic of public transport ............


हर बहस में एक प्वाइंट ज़रूर आता है जब सारे मुद्दे फ़ेल हो जाते हैं। बारीक तकनीकी पहलू की जगह एक मोटा सा स्थूल सवाल ले लेता है। जिसका जवाब दिए बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते हैं। ऐसे ही एक सवाल से मैं फिर रूबरू हुआ। सवाल यातायात का। मोबिलिटी, आवाजाही और ट्रांसपोर्टेशन की तमाम परतों से गुज़रते वो सवाल जो भारतीय समाजशास्त्र के सरोकारों से सरकारों तक जाते हैं। और ये बहुत ही दिलचस्प लगता है ये देखना कि जिस देश में आम-लोग सबसे आम शब्द हैं, जिनके नाम की क़समें प्यार की क़समों से ज़्यादा खाई जाती हैं, वो ट्रांसपोर्टेशन के पूरे विज़न से ग़ायब हैं।

दरअसल साल-दो साल में गांव का चक्कर काटने का रूटीन पिछले कई सालों से टूटा हुआ था। इस बार मौक़ा बना तो निकल लिए। दिल्ली से पकड़ी ट्रेन दरभंगा के लिए, वहां उतर कर मधुबनी के रास्ते पिलखवाड़। दिल्ली की कनकनाती ठंड से निकल अपने गांव की नम सर्द सुबह और बेदम धूप के बीच। दिल्ली से एसी ट्रेन में बैठकर 1200 किमी दूर दरभंगा पहुंचने में जितने रुपए लगे, उतने ही लगे 30-32 किमी दूर मेरे गांव तक पहुंचने के लिए। इंप्रूवमेंट सिर्फ़ इतना था कि पिछली बार जो सफ़र मैंने तीन घंटे में तय किया था वो इस बार डेढ़ घंटे में हो गया। बीच में ललचाने के लिए नैशनल हाइवे 57 नंबर भी आया, मुज़फ़्फ़रपुर को पूर्णिया से जोड़ने वाला। सड़क की क्वालिटी एक सर्प्राइज़ एलिमेंट था। लेकिन इससे पहले कि उस रास्ते से मोह हो जाए, बीच से रास्ता बदलना था। और फिर रास्ते के नाम पर सिंगल लेन, जहां पर गाड़ियां कम और हॉर्न ज़्यादा थे। गाड़ियां अंटी पड़ी थीं, 7 सीटर 15 सीटर बनी थी, मिनी बस में 70 लोग लटके पड़े थे, खुले जीप में ड्राइवर अपना आधी तशरीफ़ बाहर लटका कर ड्राइव कर रहा था।
ये तस्वीर बहुत अलग नहीं थी, जब दिल्ली-जयपुर हाईवे क़स्बों के बीच से गुज़रता है। जहां ना सिर्फ़ क्षमता से चार गुना ज़्यादा लोग किसी भी औसत टेंपो या विक्रम में बैठे दिेखेंगे। भैंसों को ठूस कर लॉरी में ले जाने पर प्रतिबंध लग गया लेकिन लोगों को फट्टों पर बैठ लॉरी में ठुसा हुआ देख कभी अचरज भी नहीं होता। और इस तरह से ये यात्रा एक स्थान विशेष की ना होकर पूरे भारत की हो जाती है। जिसे देखने के लिए आपको मेरी तरह अपने गांव जाने की ज़रूरत नहीं। दिल्ली का बॉर्डर क्रॉस कीजिए और देखिए कैसे ऑटो और विक्रम थ्री-व्हीलर पर दर्जनों लोग अपनी जान पर खेल कर लदे रहते हैं। सामान लेकर लोग सड़क किनारे खड़े मिलेंगे, इस इंतज़ार में कि कोई उनकी भी सुध ले, 12 किमी जाने के लिए तीन सौ रु लेकर ही सही।

इतने सालों से अनगिनत गाड़ियों को जिन पैमानों पर मैंने पत्रकार के तौर पर परखा है, वो सारे पैमाने इस जगह पर जाकर फेल हो जाते हैं। स्पीड, संतुलन और सुरक्षा की बात तो लागू ही नहीं होती। इनकी जगह दूसरे सवाल ले लेते हैं, जैसे ये कि गाड़ी में कितने लोग भरे जा सकते हैं, सस्पेंशन की मज़बूती का एक ही पैमाना ये कि 15 लोगों को भरने के बाद मेरे घर से निकल कर पक्के रास्ते पर पहुंचने से पहले ये टाटा सूमो ईंट वाले रास्ते में धंस तो नहीं जाएगी, पलट तो नहीं जाएगी। इंजिन प्रदर्शन एक बेतुका जुमला हो जाता है जब ओवरलोडेड गाड़ी की रफ़्तार को ख़राब सड़क जैसे स्पीड गवर्नर ने सीमित कर रखा था। और उस माहौल में जब शरीर आड़ा-तिरछा हो रहा था, सोच सीधी हो रही थी, कि पर्सनल मोबिलिटी और पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन को लेकर हमारे देश में सोच, विज़न और बहस कितनी एकतरफ़ा है।

भारत को भविष्य का सुपरपावर माना जा रहा है। सामरिक से ज़्यादा आर्थिक पैमाने पर। देश में कई क्रांतियां आ गईं, आईटी, मोबाइल, हरित, श्वेत, बीपीओ और ना जाने क्या-क्या। सबके लिए मोबाइल से लेकर लैपटॉप तक की कोशिश हो रही है। यहां तक कि सबके लिए कार भी। यातायात के नाम पर वाकई एक आम धारणा यही हो गई है। पर्सनल गाड़ी। फिक्र तब होती है जब आम लोगों की धारणा की तरह सरकारी महकमें में भी सारी चर्चाएं पर्सनल गाड़ियों की ही सुनने को मिलती हैं। लखटकिया, किफ़ाइती, इलेक्ट्रिक कार, डीज़ल इत्यादि। क्यों नहीं पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन को लेकर एक राष्ट्रीय बहस और पहल शुरू होती है.. जिससे हर तबके का इंसान आरामदेह तरीके से अपनी मंज़िल तक जल्दी औऱ सुरक्षित पहुंचे । ऑटो बाज़ार, स्मॉल कार, महंगाई, पेट्रोल की क़ीमत से बहस बस कॉरिडोर और पब्लिक ट्रांसपोर्टकी तरफ़ क्यों नहीं जा रही है। क्या पहले ही बहुत देर नहीं हो गई है ? क्या  ट्रांसपोर्टेशन के मास्टरप्लान में, राष्ट्रीय बहस में आम से आम हिंदुस्तानियों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। क्या इनके लिए भी रतन टाटा सपना देखेंगे। क्यों नहीं इस मुद्दे को बुनियादी तौर पर सुलझाने की कोशिश की जाए। क्यों नहीं हर हिंदुस्तानी को टाइम पर चलने वाली सुविधाजनक पब्लिक ट्रांसपोर्ट दी जाए, जिसमें थोड़ा आराम तो हो ही, सुरक्षित भी हो। , जिससे कि मैं भी अपनी गाड़ी को बंद करके रख दूं, और अगर कार नहीं ख़रीदी है तो केवल ज़रूरत के लिए ना लूं। भारत में सभी कार कंपनियों को भविष्य दीख रहा हो, ये अच्छी बात है, लेकिन कंपनियों के  भविष्य और देश के लोगों के भविष्य के बीच अंतर समझने की ज़रूरत है। सिर्फ़ कारें कभी भी हमारा समाधान नहीं हो सकती हैं, किसी की भी नहीं हुई हैं। पहले ही इतनी देरी हो चुकी है कि ख़ामियाज़ा हम भुगत ही रहे हैं। भारत, जहां पर साल में सवा लाख लोग सड़कों पर मारे जाते हैं,    भारत जहां की आबादी घटने वाली नहीं लग रही है और सड़कों का आकार बढ़ने नहीं वाला है। चीन जहां भारत से ज़्यादा आबादी और गाड़ियां हैं वहां पर लोग कम मरते हैं,और हर साल वो संख्या घट रही है, जबकि भारत नंबर एक तो है ही, ये संख्या घट भी नहीं रही। घट रहा है तो सिर्फ़ वक्त।
(ये मैंने तब लिखा था जब दिल्ली की बीआरटी पर केवल बसें चल सकती थीं, अब कोर्ट के आदेश के तहत आम गाड़ियां भी उसी पर से जाएंगी... यानि ये BRT एक्सपेरिमेंट भी फ़ेल। )
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